Saturday, September 26, 2009

सुभाष की स्मृतियां निष्ठा और श्रद्धा से संजो रहा है जापानी परिवार 2

रेंकोजी मंदिर से लौटकर

सबसे हालिया गठित न्यायमूर्ति मनोज मुखर्जी आयोग है। मुखर्जी आयोग भी संभवत: किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है। लेकिन इतना निष्कर्ष जरूर दिया कि ताइवान में 18 अगस्त 1945 को हुए विमान दुर्घटना और उसमें सुभाष बोस के जलकर मारे जाने की थ्योरी कतई स्वीकार्य नहीं है। उधर, नेताजी के रहस्यमय ढंग से गायब होने को लेकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के पास जो दस्तावेज हैं, वह ब्रिटिश सरकार 2020 के पहले सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है। इस कारण नेताजी के बारे में संदेह के बादल लगातार गहराते ही रह गए।

रेंकोजी मंदिर में रखा सुभाष बोस का कथित अस्थि कलश (मंदिर आकार के सुनहले बक्शे में)

इस तरह के तमाम बवंडरों से बिल्कुल अप्रभावित टोक्यो से करीब 200 किलोमीटर पश्चिम स्थित सुगीनामी इलाके में स्थित छोटे से लेकिन भव्य रेंकोजी मंदिर में रखे एक अस्थि कलश को जापान को मोचीजुकी परिवार अनवरत इस विश्वास के साथ सेवता आ रहा है कि यह कलश द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की सहायता से धुरी राष्ट्रों की ओर से मित्र राष्ट्रों पर जबर्दस्त हमला बोलनेवाले महान योद्धा की अस्थियों से भरा है। इलाका बिल्कुल शांत और आवाजाही की भीड़भाड़ से अलग है। मंदिर दो तले का बना है जिसमें प्रवेश करते ही सुभाष बोस की आवक्ष प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इसके बगल में दीवार पर लगी पट्टी में प्रथम राष्ट्रपति डॉ। राजेन्द्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के संदेश खुदे हैं। अंदर मंदिर में बुद्ध की प्रतिमा है और एक तरफ सुभाष बाबू की अस्थि कलश र्षोर्षो मंदिर के रूप में पूजित है, जिसके आसपास विभिन्न मुद्राओं में इस महान नेता की कई फोटो लगी हैं।

वर्तमान में मंदिर के पुजारी 35 वर्षीय क्योजेन मोचीजुकी हैं, जिन्होंने इसी साल फरवरी में यह पद संभाला है। इसके पूर्व इनके पिताजी निचिको मोचीजुकी थे और उनसे पहले इनके दादाजी क्योई मोचीजुकी। क्योजेन ने बताया कि जब ताइवान से यह अस्थि कलश लेकर जापानी सेना आयी तो उनके दादाजी ही यहां थे। संभवत: वह अस्थि कलश के साथ ही आए थे।

जब हम भारतीय पत्रकारों के दल ने जापानी मेजबानों को इस मंदिर के बारे में बताया तो वे अनभिज्ञ थे। लेकिन उन लोगों ने तत्काल इंटरनेट से सुभाष बोस और मंदिर का पूरा प्रोफाइल निकालकर हमें रास्ता तक बता दिया। साथ ही वहां तक जाने के लिए साथ हाशीमाशा मिजोगुची को कर दिया जो हमारे जापान भ्रमण के गाइड भी थे। इस मंदिर की यात्रा के बाद यद्यपि सुभाष बोस के गुम होने के बारे में हमारी जिज्ञासा जरा भी कम नहीं हुई लेकिन मन में एक संतोष का भाव और जापान यात्रा की सार्थकता का भाव भरा हुआ था।

हिन्दुस्तान १८-०८-०९

Friday, September 25, 2009

जापान में सुभाष के स्मतियां संजो रहा है एक परिवार

रेंकोजी मंदिर से लौटकर

भारत में पिछले 60-65 वर्षों से स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को लेकर चाहे जितनी मुंह उतनी बातें होती रही हों लेकिन दूर देश जापान में उसकी राजधानी टोक्यो से भी बहुत दूर एक निहायत शांति रिहायशी इलाके के छोटे से मंदिर में एक जापानी परिवार तीन पीढ़ियों से बड़ी तन्मयत से उनकी `कथित´ स्मृतियों को बड़े जतन से संजोकर रखे हुए है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाष बाबू के अचानक गायब हो जाने को लेकर दुनिया भर में और भारत में भी अलग-अलग तरह के कयास लगाए गए हैं। यहां तक कि भारत की विभिन्न सरकारें भी उनके बारे में कुछ भी स्पष्ट कह पाने की स्थिति में कभी नहीं आयी। सुभाष बोस की गुमशुदगी के बारे में अनेक थ्योरी प्रचलित हैं। इनमें एक है कि ताइवान में 18 अगस्त 1945 को हुई एक विमान दुर्घटना में वह बुरी तरह से घायल हो गये। इसके बाद उन्हें जली अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गयी। आजाद हिन्द फौज में नेताजी के सहयोगी रहे कुछ कमांडरों ने भी इस बात पर यकीन जताया। हालांकि विभिन्न दस्तावेजों को देखने और ताइवान सरकार द्वारा उस दिन कोई विमान दुर्घटना न होने का बयान देने के बाद इस थ्योरी पर संदेह छा गया।

एक थ्योरी यह भी चली कि उन्हें सोवियत तानाशाह स्टालिन द्वारा गिरफ्तार कर साइबेरिया के यातना शिविर में रखा गया। इस बारे में तत्कालीन सोवियत संघ के एक राजनयिक ने भी संकेत दिया, मगर यह मामला भी संदेह के परे नहीं रह सका। इसके बाद उत्तर प्रदेश में मौनी बाबा का नाम आया। इसके अलावा जय गुरुदेव ने भी कानपुर की एक सभा में खुद को सुभाष बोस घोषित कर डाला। किंवदंतियों में यहां तक कहा जाता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की अंत्येष्टि के समय एक व्यक्ति चुपचाप आया और श्रद्धांजलि देकर चला गया। लोगों ने उन्हें ही सुभाष होने का दावा कर डाला। हालांकि इन सब कहानियों को कोई तरजीह नहीं मिल पाई।

उनकी वास्तविक स्थिति के बारे में जांच करने के लिए सरकार ने भी कई आयोगों का गठन किया। 1956 में शाहनवाज हुसैन के नेतृत्व में चार सदस्यीय समिति बनाई गई जो, बोस की मौत की जांच के लिए जापान गई थी। सुभाष बोस के बारे में हिन्दुस्तान टाइम्स ने भी अलग से जांच कराई और संकेत दिया था कि फैजाबाद के भगवानजी बाबा ही सुभाष बोस हैं। भगवानजी बाबा का निधन 1985 में हो गया।

हिन्दुस्तान १८-08-09 जारी

Monday, August 31, 2009

जापान में नौकरशाही, पूंजीवाद और अमेरिकावाद की भी पराजय

जापान में 1955 में अपने गठन के बाद से ही लगातार सत्ता में बनी रही लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (जिमिंग्तो) को 30 अगस्त को हुए निचले सदन स्यूगीइन (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव) के लिए हुए मतदान में पहली बार करारा झटका देते हुए कुछ ही साल पहले गठित डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान (मिंसुतो) ने लगभग दो तिहाई सीटें जीत ली। मिंसुतो ने उपभोक्ताओं पर खर्च बढ़ाने, राजनीति को नौकरशाहों और उद्योगपतियों के चंगुल से मुक्त कराने और अमेरिका के प्रभाव से मुक्त होकर चीन और दक्षिण एशिया के देशों के साथ राजनयिक संबंध बढ़ाने के वादे के साथ यह ऐतिहासिक जीत हासिल की है।

बेरोजगारी में रिकार्ड बढोतरी, आर्थिक मंदी से निपटने में जिमिंग्तो की असफलता, वृद्धों की लगातार बढती संख्या, उनपर सामाजिक सुरक्षा का व्यय बढना, चीन और उत्तर कोरिया को लेकर अमेरिका की दोहरी नीति, जापान की रक्षात्मक पहलों में अमेरिका नियंत्रित संविधान की बाधाएं आदि ऐसे मुद्दे थे, जो जापानी जनता, खासकर नयी पीढी को उद्वेलित कर रहे हैं। लोग जापानी संविधान को ही बदलने के इच्छुक हैं जिसे जापान में अमेरिका के आधिपत्य के दौरान तैयार किया गया था। इसमें जापान को सैन्य गतिविधियां, विदेश संबंध आदि के लिए अमेरिका पर आश्रित रहना पड़ता है। डीपीजे ने चुनाव में वादा किया है कि उसकी सरकार आने पर अमेरिका के इस नियंत्रण से मुक्त होकर दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंध बेहतर बनाएगी। पार्टी का मानना है कि चीन के साथ संबंध ठीक नहीं हैं लेकिन उसे भी सुधारा जा सकता है। हालांकि इस मुद्दे पर उनकी अन्य सहयोगी पार्टियों से ही तनाव बढ़ सकता है। जापान में चीन और उत्तर कोरिया विरोधी भावनाएं बहुत ही तेज हैं। पेईचिंग विश्वविद्यालय में जापानी मामलों के विशेषज्ञ लिउ जियांगउयांग ने कहा कि डीपीजे का चीन के साथ संबंधों को लेकर सकारात्मक रुख है। लेकिन द्विपक्षीय संबंधों में समस्याएं हैं और उसपर दोनों देशों को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।

डीपीजे के नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार 62 वर्षीय युकिओ हातोयामा ने कहा कि देश की जनता सत्तारूढ गठबंधन की नीतियों से सख्त नाराज थी, खासकर राजनीति में नौकरशाहों के प्रभुत्व को लेकर उनका आक्रोश बढ़ गया था। डीपीजे (मिंसुतो) ने देश में जन्म दर बढ़ाने के लिए भी लोगों को प्रोत्साहित करने की योजनाओं की घोषणा की हैं। इसके साथ ही जापानी संसद डायट के ऊपरी सदन शींगीन में डीपीजे का बहुमत होने से हमेशा गतिरोध की स्थिति बनी रहती थी। इन सबको देखते हुए जापानी मतदाताओं ने नौसिखुआ डीपीजे को सत्ता सौंपने का मन बना लिया था।

वोटिंग का रुझान इतना साफ था कि मतगणना शुरू होने के तुरंत बाद ही प्रधानमंत्री तारो आसो ने हार स्वीकार कर ली थी। जिमिंग्तों के कई मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है।
जापान चुनाव पर अन्य रिपोर्टों के लिए इसी ब्लाग पर नीचे जाएं. आठ रिपोर्टें हैं.

Sunday, August 30, 2009

भारत में शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए तत्पर हैं क्योको ओकावा

गिंजा (जापान)

जापान से भारत के बोधगया में आकर अगर कोई बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए कोई योजना बनाए तो आपके मन में सहज यह सवाल उठेगा कि आखिर जापानी की रुचि यहां किसलिए है। लेकिन इस कल्पना को हकीकत को बदला है जापान के एक धर्मगुरु की पत्नी ने। और उनका यह लगाव भगवान बुद्ध के कारण है।

पूरे जापान में खरबों की संपत्ति वाले हैप्पी साइंस नाम से व्यापक स्तर पर आध्यात्मक संस्था चलाने वाले रयूहो ओकावा की पत्नी क्योको ओकावा का भारत से, खासकर बोधगया से जबर्दस्त लगाव है। 1996 में जब वह बौद्ध परिपथ की यात्रा पर गयी तो उनका अवचेतन मन जाग्रत हो गया। उन्हें लगा कि यह इलाका उनके पूर्वजन्मों में से किसी एक का स्थान है। क्योको को यहां से इतना लगाव हुआ कि उन्होंने बोधगया में कुछ करने की योजना बना डाली। लेकिन वहां से कोई संपर्क न होने से उनकी योजना कल्पना में रही।

2001 में जब बोधगया के होटल व्यवसायी सुदामा कुमार ने वहां सूर्या भारती नाम से बच्चों का स्कूल खोला तो चार साल बाद क्योको का संपर्क उस स्कूल से हो गया। इसके बाद क्योको ओकावा ने इसी स्कूल के माध्यम से बुद्ध की ज्ञानभूमि में कुछ करने का निश्चय कर लिया। इसके बाद 2007 से उन्होंने जापानी हैपी साइंस संस्था की ओर से आंिंशक सहयोग देना शु़रू कर दिया। इस स्कूल के सुचारू संचालन के बाद अब उनकी रुचि, अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ी है। यहां हैप्पी साइंस के मुख्यालय में बातचीत में उन्होंने बताया कि जल्द ही वह बौद्ध परिपथ क्षेत्र में अन्य कल्याण कार्यक्रम शुरू करनेवाली है।

सूर्या भारती स्कूल की निदेशिका यूकी इनोए ने बताया कि क्योको ओकावा के सहयोग के बाद स्कूल को काफी मदद मिली है और बच्चों के लिए यहां काफी कुछ किया जा सकता है। इस समय क्योको ओकावा जापान के आम चुनाव में व्यस्त है और खुद भी चुनाव मैदान में है। लेकिन जल्द ही भारत के लिए योजना बनाकर वहां जानेवाली है। वह वहां फिलहाल पानी को शुद्ध कर वहां के लोगों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए कार्य करना चाहती हैं।

क्योको ने बताया कि वह न केवल बिहार बल्कि दक्षिण भारत में भी कल्याणार्थ कार्य करना चाहती हैं। महाराश्ट्र में फिलहाल इनकी संस्था काम कर रही है। क्योको चाहती हैं कि भारत और नेपाल में लोग जापानी सीखें और जापान आकर काम भी करें। वह अपने पति को भगवान बुद्ध का अवतार मानती हैं और उनका मानना है कि वह पूर्व जन्म में बुद्ध के देश में मंजूश्री के रूप में पैदा हुईं थीं। इसका अहसास उन्हें भारत जाने के बाद हुआ था। अब तक आध्यात्म से जुड़े रहने के बाद अचानक राजनीति में आने को वह नयी चुनौती मानती हैं। उनका विश्वास है कि इस चुनौती में भी वह सफल साबित होंगी।

हिंदुस्तान 9 . 8 . 09

Friday, August 28, 2009

जापान में विपक्ष को दो-तिहाई बहुमत की उम्मीद

राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में डीपीजे को 300 और एलडीपी को 100 सीटों के कयास

जापानी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा (स्यूगीइन) के लिए आगामी 30 अगस्त को होने जा रहे मतदान में मुख्य विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान (मिंसुतो) को 300 सीटें मिलने की उम्मीद जताई गयी है जबकि सत्ताधारी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (जिमिंग्तो) को मात्र 100 सीटें मिलती ही दिखायी गयी हैं।

आम चुनाव में जिमिंग्तो के सहयोगी घटक न्यू कोमेइतो को भी भारी नुकसान होने जा रहा है। फिलहाल इसके 31 संासद हैं। इसका मुख्य कारण अनिर्णय की स्थिति में झूल रहे लगभग 43 फीसदी मतदाताओं का झुकाव अंतिम समय में डीपीजे के पक्ष में जाना बताया जा रहा है। हालांकि अन्य विपक्षी दलों- जापानी कम्युनिस्ट पार्टी, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी, और पीपुल्स न्यू पार्टी (कोकुमिन शिंतो) को 480 सदस्यीय स्यूगीइन में उपस्थित दर्ज कराने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

यह आकलन एक एजेंसी द्वारा पिछले दिनों पूरे देश के दो लाख से अधिक घरों में टेलीफोन के जरिए किये गये सर्वेक्षण में सामने आया है। यहां के 300 एकल सीट निर्वाचन क्षेत्र के लिए 1139 उम्मीदवार मैदान में हैं जबकि आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली 180 सीटों के लिए 888 सीटें। यह पहला मौका है कि जब विपक्षी डीपीजे सत्तारूढ दल पर बढ़त बनाती दीख रही है। चुनाव में एलडीपी ने 326 और डीपीजे ने 330 उम्मीदवार उतारे हैं।

सर्वेक्षण में एकल सीटों के लिए 36 फीसदी प्रतिभागियों ने बताया कि वह अभी अपना मन बना रहे हैं जबकि आनुपातिक प्रतिनिधित्व सीटों के लिए 33 फीसदी अभी अनिर्णय की स्थिति में हैं। इनका मत मतदान के दिन ही तय होने की उम्मीद है। इनमें से करीब 43 फीसदी डीपीजे के पक्ष में मतदान कर सकते हैं जबकि 16 फीसदी एलडीपी के पक्ष में जा सकते हैं। सर्वेक्षण में हिस्सा लिये मतदाताओं में से 32 फीसदी ने कहा कि वह एलडीपी को समर्थन करेंगे। पिछले चुनाव में इस पार्टी के पक्ष में 34।7 फीसदी मतदाता थे।

उधर, 17.1 फीसदी ने डीपीजे के पक्ष में अपना मत बताया जो पिछली बार से 4.4 फीसदी अधिक है। लेकिन अनिर्णीत 43 फीसदी का डीपीजे के पक्ष में संभावित झुकाव उसे भारी बहुमत की ओर ले जा सकता है।

Tuesday, August 25, 2009

जापानी मीडिया की माने तो जिमिंग्तो की पराजय तय

शिनिगावा (जापान)
जापानी संसद के निचले सदन स्यूगीइन के चुनाव में इस बार लगता है सत्ताधारी पार्टी जिमिंग्तो यानी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी का वर्चस्व समाप्त होनेवाला है। जापानी मीडिया का आकलन तो कम से कम यही है। इसका कारण यहां की मीडिया और अन्य विश्लेशक वैश्विक मंदी और सरकार की अस्थिरता को बता रहे है।

जिमिंग्तो जापान की सबसे पुरानी पार्टी रही है और 1955 में अपने गठन के समय से ही (कुछ समय को छोड़) वह लगातार सत्ता में रही है। जापान की राजनीति में इसे मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टी माना जाता है। यह देश की सबसे बडी पार्टी रही है और 2003 में इसमें उस समय के मुख्य विपक्षी दल लिबरल पार्टी का इसी में विलय हो गया था। 2005 में हुए चुनाव में इसने जबदस्त विजय पायी और लेकिन उसने कोमाइतो पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाया। तब शिंजो अबे जापान के प्रधानमंत्री बने। उनसे पहले जुनिचिरो कोइजुमी इस पद पर थे जो पार्टी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। लेकिन 2007 में उच्च सदन शांगीन के चुनाव में इस पार्टी की करारी हार हो गयी और पहली बार उच्च सदन में पार्टी अल्पमत में आ गयी। इस हार की जिम्मेदारी लेते हुए अबे ने इस्तीफा दे दिया और यासुको फुकुदा प्रधानमंत्री बने। 1 सितम्बर 2008 को फुकुदा को भी इस्तीफा देना पडा और तब से तारो आसो जापान के प्रधानमंत्री हैं।

लेकिन सत्ताधारी पार्टी में राजनीतिक स्तर पर इस तरह की अस्थिरता का संदेश देश की जनता में अच्छा नहीं गया और पार्टी की छवि को गहरा धक्का लगा है। इसके अलावा उत्तर कोरिया द्वारा जापानी बच्चों और अन्य नागरिकों का अपहरण कर लिये जाने के बाद उन्हें छुडाने में नाकाम रहने के कारण भी सत्ताधारी पार्टी पर लोगों का गुस्सा बना हुआ है। विपक्षी पार्टियां सरकार पर आर्थिक संकट से न निपट पाने को लेकर भी आरोप लगा रही हैं और टैक्स का भार बढ़ाते जाना भी इसके लिए गले की हड्डी बन रही है। सत्ता विरोधी नुकसान अलग से है ही।

इन्हीं सब कारणों को लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी मिसिंतो ने मुद्दा बनाया है और इन मुद्दों के साथ उत्तर कोरिया का परमाणु भय दिखाकर नवगठित पार्टी कोफकू जित्सुजेन ने भी सत्ताधारी पार्टी पर दबाव बना रखा है। जनता में भी इसकी छवि बार-बार के बदलाव के कारण अच्छी नहीं रह गयी है। इन्हीं सबकों लेकर जापानी मीडिया का बड़ा वर्ग सरकारी पार्टी के इस चुनाव में भारी हार का आकलन कर रहा है। हालांकि चुनाव 30 अगस्त हो होना है और नामांकन की प्रक्रिया अपने शुरुआती चरण में है लेकिन सत्ताधारी पार्टी की हार की भविष्यवाणियां होने लगी हैं। असली परीक्षा तो 30 अगस्त को ही मतगणना के बाद होगी।

हिन्दुस्तान 07-08-09

Monday, August 24, 2009

नंद भारद्वाज बिहारी पुरस्कार से सम्मानित

जयपुर में सोमवार को के.के. बिरला फाउंडेशन का प्रतिष्ठित बिहारी पुरस्कार राजस्थान के विख्यात साहित्यकार नंद भारद्वाज को उनकी काव्यकृति `हरी दूब का सपना´ के लिए दिया गया। उन्हें पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और फ़ाउंडेशन का प्रतीक चिह्न प्रदान किया गया। श्री भारद्वाज को उनके उपन्यास ‍"साम्ही खुलतो मारग" के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है।

भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में बिहारी पुरस्कार की अपनी अहमियत है। यह पुरस्कार यों तो राजस्थानी मूल के साहित्यकारों को चाहे वे राजस्थान में रहते हों या और कहीं, उनकी सर्वश्रेष्ठ हिन्दी और राजस्थानी कृति के लिए हर साल दिया जाता है लेकिन यह पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुका है।


नंद भारद्वाज को यह पुरस्कार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदान किया। इस अवसर पर गहलोत ने कहा कि छपे हुए शब्दो का बहुत महत्व होता है। लोग उन पर विश्वास करते है। खासकर साहित्यकारों की लेखनी तो शासन, समाज और देश का मार्गदर्शन करती हैं क्योंकि वे लोग सामाजिक सरोकारों से वास्ता रखते हैं। उन्होंने स्व। के.के. बिरला को याद करते हुए कहा कि इसी सोच के चलते उन्होंने साहित्य, कला, इतिहास एवं विज्ञान के पुरोधाओं के लिए सम्मानों की स्थापना की। गहलोत ने के.के. फाउंडेशन की अध्यक्षा श्रीमती शोभना भरतिया की सराहना करते हुए कहा कि वह अपने पिता की विरासत को कायम रखे हुए हैं। उन्होंने श्रीमती भरतिया से आग्रह किया कि वह भी अपने पिता की तरह ही राजस्थान से रिश्ता कायम रखें।

इस अवसर पर श्रीमती भरतिया ने अतिथियों और साहित्यकार का स्वागत किया। श्रीमती भरतिया ने नंद भारद्वाज को बधाई देते हुए कहा कि उनकी कविताएं पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि यह हमारे मन की बात है। उनकी कविताएं करुणा और प्रेम दोनों ही मानवीय भावनाओं से भरी हैं। उन्होंने अपनी इस कृति में रेगिस्तान के कड़े जीवन को गहरी संवेदना के साथ व्यक्त किया है। साथ ही इस संग्रह की कुछ कविताएं पहली बार यह अहसास कराती हैं कि मरुभूमि के संघर्षमय जीवन के बारे में जानना अभी बाकी है।

पुरस्कार चयन समिति की अध्यक्षा प्रो। रमा सिंह ने स्व. के.के. बिरला के समाज एवं साहित्य में योगदान को सराहते हुए उन्हें राजर्षि की उपमा दी। पुरस्कार से सम्मानित भारद्वाज ने स्व. बिरला को नमन करते हुए कहा कि साहित्य जन अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट माध्यम है। वैसे तो वह हर विधा में लिखते हैं लेकिन कविता उनके चित्त के अधिक करीब है। उन्होंने बर्तमान परिवेश में साहित्य एवं कला को बचाने पर भी जोर दिया।

के.के. बिरला फाउंडेशन के पुरस्कार आज के परिदृश्य में अहमियत रखते हैं। आज के माहौल में जिन पुरस्कारो की विश्वसनीयता कायम है, बिहारी पुरस्कार उनमें प्रमुख है। इसने साहित्यकारों को सम्मानित करने के प्रतिमान कायम किया है। सबसे बड़ी बात है कि बिहारी पुरस्कार ने राजस्थानी भाषा और साहित्य को अखिल भारतीय और इसीलिए वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाने में महती भूमिका निभाई है। इस पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार की पूरे देश में कीर्ति स्थापित होती है। बिहारी पुरस्कार से पहले मुख्य पुरस्कारों में केवल साहित्य अकादमी का ही पुरस्कार था जो राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के लिए दिया जाता था। बिहारी पुरस्कार ने इस भाषा और साहित्य की गरिमा को और बढ़ाने का कार्य किया है।

Sunday, August 23, 2009

बुद्ध के देश से बहुत कुछ सीखना चाहता है जापान

पंचवर्षीय योजना, शिक्षा और नियोजित विकास दर से बहुत प्रभावित हैं यहां के लोग

टोक्यो

एशिया का एकमात्र विकसित देश होने और तकनीक व विकास में दुनिया की महाशक्तियों से मुकाबला करने में जापान भले ही अव्वल हो लेकिन वह विकास दर और पंचवर्षीय योजनाओं की नीतियों के मामले में अपने गुरु देश भारत से बहुत ही प्रभावित है। जापान न केवल भारत से इन मामलों में सीखकर इन नीतियों को क्रियान्वित करना चाहता है, बल्कि वह आर्थिक व तकनीक के मामलों में भारत का पूरा सहयोग भी करना चाहता है।

भगवान बुद्ध की मूलभूमि होने के कारण बौद्ध मताबलंबी जापान की भारत के प्रति अगाध श्रद्धा है। लेकिन अब तक भारत से प्रगाढ़ संबंध विकसित न कर पाने का उसे मलाल भी है। जापानियों की इस भावना का इजहार करते हुए कोफकू जित्सुजेन पार्टी के महासचिव सह प्रचार प्रमुख जिकिदो आइवा का कहना है कि उनकी पार्टी की नीतियों में भारत के साथ न केवल सैन्य संबंधों को जोड़ना शामिल किया गया है बल्कि विज्ञान, तकनीकी और आर्थिक स्तर पर भी एक-दूसरे के करीब आने की बात है।

उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी मानती है कि भारत ने अपनी जनता को शिक्षित करने के लिए जो विभिन्न योजनाओं को शुरू किया वह जापान के लिए मॉडल बन सकता है। भारत की शिक्षा नीति भी जापान के लिए मार्गदर्शक हो सकता है। इसके अलावा पिछले कई सालों से भारत में 8-9 फीसदी की विकास दर को भी उनकी पार्टी प्रभावित होकर देख रही है। आइवा ने कहा कि भारत ने आजादी के बाद जो पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं और इसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की हैं, उससे उनकी पार्टी काफी प्रभावित है। वह वैश्विक आर्थिक मंदी से जापान को बाहर निकालने और शून्य से नीचे जा रही विकास दर को कम से कम तीन फीसदी करने के लिए भारत से सीख लेंगे।

उन्होंने कहा कि वह न केवल भारत से सीख लेंगे बल्कि भारत को भी गरीबी, बेरोजगारी, विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में पूरा सहयोग करने को तैयार हैं। उनके अनुसार´ भारत-जापान के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करने से न केवल इन दोनों देशों की प्रगति होगी बल्कि अन्य देशों को भी मदद मिलेगी और दुनिया में शांति स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा।

हिन्दुस्तान 08-08-09

Saturday, August 22, 2009

अमेरिका नियंत्रित संविधान पर जापान में बढ़ रहा है असंतोष

चीन और उत्तर कोरिया के समानान्तर भारत-रुस-जापान गठजोड बनाना चाहती है नवगठित पार्टी जित्सुजेन

टोक्यो

लगभग 60 बरसों से अमेरिका निर्देशित संविधान के तहत चल रहे जापानी जनता के एक वर्ग में इसके खिलाफ सुगबुहाहट सुनाई देने लगी है। यह वर्ग न सिर्फ इस संविधान को बदलकर पूरी तरह से जापानी संविधान लिखना चाहता है बल्कि इसमें सेना को सशक्त बनाने और अपने बूते रक्षा व आक्रमण की नीति को स्वीकार करना और परंपरागत राजशाही व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म भी करना चाहता है। इस समूह का मानना है कि चीन और उत्तर कोरिया जैसी ताकतों के गठजोड़ से निपटने के लिए एशिया में भारत- रुस- जापान का सैन्य गठबंधन बनना चाहिए।

इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाली संस्था कोफकू जित्सुजेन या हैपी साइंस जैसे संगठन ने राजनीतिक हस्तक्षेप करते हुए पार्टी का गठन किया है और अपने घोषणापत्र में इसे प्रमुखता से शामिल किया है। इस संगठन के चुनाव अभियान के प्रमुख जिकिदो आइबा ने 4 अगस्त को टोक्यो में विदेशी पत्रकार के साथ एक भेंटवार्ता में बताया कि वर्तमान के संविधान में कई तरह की खामियां भरी हुई हैं, क्योंकि यह संविधान अमेरिका के नियंत्रण में रहते हुए निर्मित हुआ था। अब हम ऐसा संविधान नये सिरे से लिखना चाहते हैं जो जापान के नये परिवेश और वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में व्यावहारिक, राष्ट्रवादी व संप्रभुता संपन्न हो। उन्होंने बताया कि जापान का वर्तमान संविधान न केवल अमेरिका नियंत्रित है बल्कि इसमें राजशाही और लोकतंत्र में भी घालमेल किया हुआ है।

इस पार्टी का घोषणापत्र जारी करते हुए आइबा ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में पिछले विश्वयुद्ध के बारे में भ्रामक बातें स्वीकार की गई हैं। इसमें प्रत्यक्ष तौर पर तो संप्रभुता की बातें की गई हैं लेकिन दस्तावेज में मूलत: राजशाही व्यवस्था के प्रावधानों को ही दोहराया गया है। इसमें मानवाधिकारों के लिए कोई जगह नहीं है और न ही लोकतंत्र और तानाशाही के बीच अंतर किया गया है। कोफकू पार्टी ऐसा संविधान बनाना चाहती है जिसमें इन भूलों के अलावा भी विद्यमान अन्य भूलों को सुधारा जा सके।

चुनाव अभियान प्रमुख ने बताया कि एशिया में चीन और उत्तर कोरिया का गठबंधन विश्व शांति और क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा बना हुआ है इसलिए इस गठबंधन के समानान्तर क्षेत्र में रुस -जापान-भारत को मिलकर काम करना होगा और एक रक्षात्मक सैन्य गठबंधन तैयार करना होगा।

जब उनसे पूछा गया कि संविधान बदलने और उसमें सैन्य स्वतंत्रता की बात करते समय अमेरिका से जापान का टकराव संभावित है तो उन्होंने कहा कि जापान अमेरिका को इस बात के लिए समझाएगा और सहमत करेगा कि सशक्त जापान अमेरिका के भी फायदे में है। वैसे उन्होंने कहा कि अमेरिका की वर्तमान नीति अंतर्मुखी होती जा रही है। वह अपने ही आंतरिक समस्याओं से उलझा हुआ है और आगे उसकी समस्या और बढ़नेवाली है। ऐसे में वह अपने बाहरी मित्रों की ओर ध्यान नहीं दे पाएगा। ऐसे में जापान को आत्मनिर्भर और रक्षात्मक सुरक्षा के लिए खुद की पहल करनी होगी।

इस दल का मानना है कि जापान के नख-दंत विहीन संविधान के कारण ही उत्तर कोरियाई सेना ने लगभग 100 जापानियों का अपहरण कर रखा है और जापान के आसमान में अपने मिसाइलों को छोड़ता रहता है। जापान के सशक्त और सक्षम होने पर न केवल उत्तर कोरिया इस तरह की गुस्ताखी नहीं करेगा बल्कि अमेरिका को भी इस ताकत से मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि एशिया के लोकतांत्रिक देशों के सशक्त बनने से विश्व शांति के सिद्धांतों को बल मिलेगा और विश्व व क्षेत्रीय शांति स्थापित हो पाएगी।

हिन्दुस्तान ०५-०८-०९

Tuesday, August 18, 2009

शिक्षा और स्वास्थ्य और क्षेत्रीय स्वायत्तता पर जोर है मुख्य विपक्ष का

लेकिन उत्तर कोरिया का आक्रामक रुख कोई मुद्दा नहीं है मिसुतो पार्टी के लिए

क्योटो

मिंसुतो पार्टी (लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी) इस चुनाव में पिछले 60 सालों से लगातार (बीच में एक बार दूसरी पार्टी की सरकार बनी थी) सत्ताधारी जिमिंगतो पार्टी ( डेमोक्रेेटिक पार्टी ऑफ जापान) को सत्ता से उखाड फेंकने के लिए प्रचार अभियान में केाई कोर-कसर नहीं छोड रखना चाहती है। इस बार के चुनाव प्रचार अभियान में मिंसुतो ने कई लोक लुभावन मुद्दों को उठाया है। इनमें फिजुलखर्जी खत्म करना, बच्चों और उनकी शिक्षा की बेेहतर व्यवस्था, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाएं, क्षेत्रीय स्वायत्तता और रोजगार और अर्थव्यवस्था में सुधार आदि मुद्दे शामिल है। हालांकि यह पार्टी उत्तर कोरिया से संभावित खतरों और उसके, द्वारा जब तब जापानी क्षेत्राधिकार के अतिक्रमण को कोई खतरा नहीं मानती है।

मिंसुतो ने घोषणा की है कि वह सरकार के 2070 खरब (207 ट्लियन येन) येन के बजट पर पुनर्विचार करेगी और इसमें जारी अनेक फिजुलखर्चियों को रोकेगी। वह जापान में चल रही गोल्डेन पैराशुटिंग और टैक्स के से आनेवाले जनता के धन की बर्बादी को भी रोकेगी। विपक्षी पार्टी इस बात के लिए जनता से समर्थन मांग रही है कि डायट (जापानी संसद) में परंपरागत रूप से निर्धारित वंशानुगत सीटों को समाप्त करेगी और कॉरपोरेट घरानों द्वारा राजनीतिक चंदों को पारदर्शी बनाएगी तथा प्रतिनिधि सभा (स्यूगीइन) में 80 सीटें कम करेगी। पार्टी ने कहा है कि सत्ता में आने पर प्रत्येक बच्चों को प्रतिवर्ष 312,000 येन (लगभग 156,000 रुपये) की सहायता तब तक देती रहेगी जब तक वह जूनियर हाईस्कूल न पास कर ले। इसके अलावा हाईस्कूल की शिक्षा को भी मुफ्त किया जाएगा। विश्वविद्यालयी शिक्षा को आम बनाया जाएगा। एकीकृत पेंशन प्रणाली लागू करनाद्व पेंशन पासबुक जारी करना और प्रतिमाह कम से कम 70000 येन पेंशन सुनिश्चित करना इस मिंसुतो के प्रमुख चुनावी और लोक लुभावन मुद्दे हैं। क्षेत्रीय स्वायत्तता को और मजबूत और बेहतर बनाने के लिए स्थानीय सरकारों को अधिक से अधिक कोश मुहैया कराना कृशि के लिए व्यक्तिगत आय सहायता प्रणाली को और बेहतर करना इस पार्टी का लक्ष्य है। मिसुंतो छोटे एवं मझोले उद्यमों के लिए कॉरपोरेट टैक्स रेट को कम करेगी और बेरोगारों को रोजगार में सहायता के तौर पर एक लाख येन प्रतिमाह देकर प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करेगी। वह नये उद्योगों की स्थापना के समय ग्लोबल वार्मिंग को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण मानकों के आधार पर ढांचा कराएगी।

इन तमाम मुद्दों पर व्यापक जोर देने के बावजदू मिसिंतो उत्तर कोरियाई परमाणु कार्यक्रम पर मौन है। इसका कारण इसके विरोधी पार्टी के वाम रूझान को बतलाते हैं। उनका मानना है कि मिंसितों कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होने के कारण दूसरे कम्युनिस्ट शासित देश उत्तर कोरिया की गतिविधियों को नजरंदाज कर रही है। वह चीन के प्रति भी नरम रुख रखती है जो देश के लिए खतरा है। कॉफकू जित्सुजेन पार्टी के नेताओं ने क्योटो में अपने प्रचार अभियान के दौरान इसी कारण मिंसुतो की आलोचना की। वे मिंसुतो के मुद्दों को केवल सत्ता प्राप्ति का हथकंडा भर मानती है।

(हिंदुस्तान 04। 08। 09)

Monday, August 17, 2009

चीन और उत्तर कोरिया बड़ी चिंता हैं जापान चुनाव में

मित्रों! पिछले दिनों मुझे जापान जाने और वहां के आम चुनाव की रिपोर्टिंग करने का सुअवसर मिला. इस काम के लिए मैं 1 अगस्त से 8 अगस्त तक जापान के विभिन्न शहरों में था और वहां की राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा भी लिया। अपने अनुभवों के आधार पर मैंने रिपोर्टें लिखीं जो नीचे दिए संदर्भ के अनुसार हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुईं हैं। देर से ही सही लेकिन मैं इसे अपने ब्लॉग पर दे रहा हूं। कुछ अन्य सामाजिक, सांस्कृतिक रिपोर्ट भी यहां लिखने का प्रयास करूंगा।

योक्काइची (जापान)

जापान में संसद के निचले सदन स्यूगीइन (भारत में लोकसभा के समान) के आगामी 30 अगस्त होनेवाले मतदान में अन्य मुद्दों के अलावा कुछ जो बड़े मुद्दे उछल रहे हैं, उनमें महत्वपूर्ण उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम, उसे मिल रहा चीन का समर्थन और इस बीच अमेरिका के चीन से बेहतर हो रहा संबंध महत्वपूर्ण है। इसपर लगभग सभी दल अपना रुख जनता को बता रहे हैं लेकिन नवगठित कोफकू जित्सुजेन पार्टी (हैपीनेस रियलाइजेशन पार्टी) का रुख इसपर बहुत ही आक्रामक है।

२ अगस्त को मीए प्रीफेक्चर (जापान में कुल 48 प्रीफेक्चर हैं) के योक्काइची में कोफकू जित्सुजेन पार्टी के प्रमुख और हैपी साइंस समुदाय के आध्यात्मिक गुरु मास्टर रयूहो ओकावा ने इस क्षेत्र के 5 उम्मीदवारों की घोषणा के अवसर पर आयोजित एक विशाल जनसभा में कहा कि उत्तर कोरिया इस समय जापान के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है और उसकी मिसाइलें जापान की ओर तनी हुई हैं। तुर्रा यह कि चीन जैसी शक्तिशाली ताकत का हाथ उसकी पीठ पर है। उन्होंने जापान की वर्तमान जिमिंतो पार्टी अर्थात डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान की सरकार की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि वर्तमान सरकार उत्तर केरियाई परमाणु मिसाइलों के तने होने के बावजूद चैन की बंशी बजा रही है।

उन्होंने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि जब देश की वायुसेना के प्रमुख मिस्टर तमोगामी ने सेना को मजबूत करने और अमेरिका पर निर्भरता छोड़ खुद को सक्षम बनाने की बात कही तो उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने इस संबंध में जापानी अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर छपी खबर भी सभा में दिखाई। उन्होंने कहा कि जापान को खुद में सक्षम होने की जरूरत है। और उत्तर कोरिया के आक्रमण से पहले उससे सुरक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।

जापानी जनता के बड़े वर्ग का मानना हैं कि वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का झुकाव पूरी तरह चीन की ओर है। ओबामा तो जापान का नाम भी नहीं जानते। वह चीन से संबंध सुधारने के लिए जापान पर होनेवाले उत्तर कोरियाई हमले के समय भी चुप रह जाएंगे। इस पार्टी के रणनीतिकार वर्तमान सरकार की आलोचना करते हुए कहते हैं कि जब उत्तर कोरिया अहंकार में डूबकर बात कर रहा है और धमकियां दे रहा है तो जिमिंतो सरकार और उसके प्रघानमंत्री तारो आसो उत्तर कोरिया के साथ संबंध सुधारने और मित्रता की बात कर रहे है। यह बहुत ही गैर जिम्मेदारीपूर्ण रवैया है।

जापानियों की आशंका इस बात से और बढ़ गयी है कि पिछले दो-एक सालों में कई बार उत्तर कोरिया ने जापानी आकाश के ऊपर से होते हुए अपने कई परमाणु मिसाइलों को समुद्र में गिराया है। इस चिंता को पूरे जापान में देखी जा सकती है।

(हिन्दुस्तान 03. 08. 09)

Sunday, August 16, 2009

जापानी स्युगीइन के चुनाव में उभर रहा है नया विकल्प

ओसाका

जापानी संसद डायट के निचले सदन स्युगीइन के आगामी 30 अगस्त को हो रहे चुनाव में परंपरागत तौर पर अबतक मैदान में उतर रही दो पार्टियों- विपक्षी मिंसुतो पार्टी अर्थात लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी और सत्ताधारी जिमिंतो पार्टी अर्थात डेमोक्रेटिक पार्टी आफ़ जापान के अलावा एक नयी कोफुकू जित्सुजेन पार्टी ने जोरदार तरीके से दस्तक दे दी है। 1 अगस्त को ओसाका के विशाल कंवेशनल हॉल में जब इस नवगठित पार्टी के नेताओं ने सभा का आयोजन किया और ओसाका, ओसाकायामा और नारा परिक्षेत्र के 26 उम्मीदवारों की घोषणा की गयी तो वहां जमा 5000 से अधिक प्रतिनिधियों ने जोरदार ढंग से इसका स्वागत किया। उल्लेखनीय है कि जापान जैसे कम आबादी वाले और व्यस्ततम जीवन जीने के आदी समाज में इस तरह की राजनीति गतिविधियों के लिए इतनी भीड़ जमा होना अस्वाभाविक बात है।

अमेरिका की परंपरागत पार्टियों की ही तरह यह नवगठित पार्टी भी अमेरिका से संबंधों को मजबूत बनाने की ही पक्षधर है लेकिन इसके प्रशासन परिषद के प्रमुख मसातोशी हयाशी ने इस पार्टी के गठन के उद्देश्यों को साफ करते हुए बताया कि स्थापित पार्टियां कई मुद्दों को अमेरिका के सामने उठा भी नहीं पातीं लेकिन उनकी पार्टी उन्हें उचित तरीके से उठाएगी और नीतियों में परिवर्तन करेगी।

जित्सुजेन पार्टी वैश्विक मंदी के दौर में जापान की आर्थिक दुर्गति दूर करने, जापान का भविष्य बदलने, देश के सकल घरेलू उत्पाद को दोगुना कर 20000 येन से अधिक पर ले जाने और एक से भी नीचे चली गयी विकास दर को 3 प्रतिशत तक करने की बात करती है। इस पार्टी के सर्वोच्च नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मास्टर रियूहो ओकावा विश्व शांति और भारत जैसे एशियाई देशों के साथ व्यापक स्तर पर आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की बात भी बड़े जोर-शोर से कर रहे हैं।

भगवान बुद्ध को प्रेरणास्रोत मानकर हैपी साइंस नाम से अभियान चलानेवाली संस्था के अगली राजनीतिक पहल के तौर पर गठित कोफकू जित्सुजेन पार्टी जापानी बौद्ध धर्म से जुड़ी हुई है। हालांकि यह पार्टी स्यूगीइन के 347 सीटों के लिए चुनाव लड़ रही है लेकिन कितनी सीटों पर जीत मिलेगी इसके प्रति आश्वस्त नहीं है। क्योटो-साइन परिक्षेत्र की प्रमुख मिस फुकूसीमा कहती हैं, `हम पहली बार चुनाव में उतरे हैं। अभी हमने पार्टी बनाने का फेसला किया है। लेकिन चुनाव परिणामों से हम निराश नहीं होंगे और आगे भी राजनीति और जापान को मजबूत करने के लिए काम करते रहेंगे।
(हिन्दुस्तान ०२-०८-०९)

Saturday, May 30, 2009

आम चुनाव के नतीजों से मिले संकेत - अंतिम

पहला भाग दूसरा भाग तीसरा भाग चौथा भाग पांचवा भाग

आचार्य नरेन्द्र देव से शुरू होकर डा. राममनोहर लोहिया तक समाजवादी आंदोलन अपने सही दिशा में रहा लेकिन लोहिया के जीवन काल में ही पार्टी में खुली सदस्यता के कारण तमाम अवांछित तत्व संगठन पर हावी हो गए। इसका परिणाम हुआ कि 1967 में लोहिया के निधन के बाद ऐसे ही तत्व संगठन की सत्ता में अनेक प्रकार के अनैतिक और अवैध हथकंडे अपनाकर हावी होते गए। इसमें सबसे सुगम रास्ता उन्हें जाति की राजनीति लगी और चूंकि उनमें किसी नीति-सिद्धांत के प्रति कोई प्रतिबद्धता न के बराबर थी। संगठन के स्तर पर कार्यकर्ताओं को ऐसी नीतियों का पाठ पढाने का काम भी लोहिया के बाद ही समाप्त हो गया। कम्युनिस्टों में यह काम कुछ और दिनों तक चला लेकिन वर्तमान में वहां भी प्रिशक्षण शून्य ही है। जब मैंने इस बारे में अपने भाकपा माले के एक मित्र से चर्चा की तो उन्होंने माले में भी इस तरह की चर्चा न के बराबर होने की बात ही कही।

उपरोक्त विश्लेशण से तथ्य उभर कर आ रहे हैं कि आम तौर पर पूरे देश में और खासकर उत्तर में परिवर्तनवादी जनाधारित राजनीति के लिए पूरा मैदान खाली है। इस दिशा में काम करनेवाला कोई भी बड़ा या छोटा प्रभावी दल नहीं है। हां, इन छोटे और स्थानीय स्तर पर कई छोटे-संगठन और समूह सक्रिय हैं, जिनका आकार और क्षमता और स्रोत बहुत दुर्बल होने के कारण प्रभाव बहुत कम है। इस तरह के छोटे समूहों में आपसी तालमेल का अभाव रहता है। स्वच्छ और पारदर्शी राजनीति करने के कारण इनके पास साधनों और प्रिशक्षित सैद्धांतिक कार्यकर्ताओं का भी अभाव रहता है। लेकिन सिद्धांतहीनता- मूल्यहीनता और नीति विहीनता से उपजे रिक्त स्थान को भरने का क्षमता इन्हीं में हैं। इसके लिए जरूरी है ऐसे लोकतांत्रिक, नैतिक, समाजवादी- वामपंथी धारा में स्वच्छ और पारदशीZ राजनीति करनेवाले समूहों को निजी अहम से ऊपर उठकर एकजुट होने की। एकजुट होने पर इनके कर्मों और जन संघर्षों के बूत जनता के बीच इनकी विश्वसनीयता निश्चित तौर पर बढेगी और स्थापित राजनीति के बरक्श एक वैकल्पिक राजनीति को दिशा मिल सकती है।

निष्कर्ष के तौर पर हम पाते हैं कि निकट भविष्य में स्थापित राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने पर आनेवाले खाली पने को भरने के लिए देश में छोटे स्तर पर सक्रिय तमाम परिवर्तनवादी ताकतों को एकजुट होकर इससे मुकाबले को कमर कसना होगा। इसमें सभी लोकतांत्रिक वामपंथी धाराओं को भी शामिल करने की जरूरत है। इससे जातिवादी, सिद्धांतविहीन राजनीति के दलदल में फंसी जनता को निजात मिलने की उम्मीद बनेगी। तभी देश में एक सक्षम विकल्प को भी तैयार किया जा सकेगा। वर्तमान स्थिति में नीतिगत राजनीति के लिए काफी जगह है और ये परिवर्तनवादी धाराएं मिलकर जनांदोलन चलाती हैं तो देश की राजनीति की दिशा-दशा को अगले कुछ सालों में पलट कर उसे सकारात्मक दिशा में ले जाया जा सकता है।
समाप्त

Friday, May 29, 2009

आम चुनाव से मिले संकेत- पांच

पहला भाग दूसरा भाग तीसरा भाग चौथा भाग

लेकिन इन प्रदेशों में सबसे चिंतित करनेवाली बात जो दिखाई दे रही है, वह परिवर्तनवादी -प्रगतिशील धारा का अंत है। यह कोई जनता की इच्छा के कारण नहीं बल्कि इन धाराओं की आपसी नालायकी की वजह से हुआ है। बिहार में शुद्ध रूप से जातिवाद की राजनीति पर आधारित लालू को 15 साल तक समर्थन देकर वहां की जनाधार वाली भाकपा ने अपने को मटियामेट कर लिया तो उत्तर प्रदेश में भी उसकी बची-खुची ताकत का अंत उसी तरह की राजनीति करनेवाले मुलायम सिंह को समर्थन के कारण हुआ। बिहार में वामपंथ के नाम पर भाकपा-माले है लेकिन उसकी पहचान एक क्षेत्रीय तौर पर ही है और उसकी विश्वसनीयता न के बराबर है। उधर लोहिया के समाजवाद और जयप्रकाश आंदोलन के गर्भ से निकले लालू- मुलायम की पार्टियां पूरी तरह जातिवाद और भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी हैं। इन पार्टियों पर कारपोरेट घरानों, उद्योगपतियों, उनके एजेंटों और सत्ता के शुद्ध दलालों का कब्जा हैं।

इसके साथ ही इस चुनाव में दूसरी चिंता की बात यह रही कि पूरे प्रचार अभियान के दौरान शासन-प्रशासन में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार, कुशासन, देश में बढ़ती महंगाई, गरीबी, किसानों की बदहाली, मजदूरों का विभिन्न स्तरों पर होनेवाला शोषण, मंदी के कारण नौकरियों से हो रही छंटनी और बेरोजगारी कोई मुद्दा नहीं बना। न तो राजनीतिक दलों के स्तर पर और न ही जनता के स्तर पर। जनता से दबाव न बनने के कारण ही विपक्षी दलों ने भी इन मुद्दों को उठाने की जहमत नहीं दिखाई।

जानने वाले जानते होंगे कि कभी उत्तर भारत में कम्युनिस्ट-सोसलिस्ट आंदोलन की आंधी थी। इस आंदोलन के मूल में जनता के मुद्दे जैसे महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय और भ्रष्टाचार हुआ करते थे। `दाम बांधो काम दो´, संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ´ जैसे लोकप्रिय नारों की गूंज चुनावों में आम थीं। 1967 में इसी आंधी की चपेट में कई राज्यों में कांग्रेस की जड़ उखड़ी और संविद सरकारें सत्ता में आयी। लेकिन यह धारा चिरस्थायी नहीं रह सकी। इसका कारण भी इसी आंदोलन की जड़ में विद्यमान है। तब की सोशलिस्ट पार्टी ने हिन्दी प्रदेशों में पिछड़े- दलितों को राजनीतिक अधिकार दिलाने, उन्हें सत्ता के मुख्य केंन्द्र तक पहुंचने और सामाजिक बराबरी के लिए प्रेरित किया और संघर्षशील तो बनाया लेकिन इस क्रम में उन्हें सिद्धांतों की कसौटी पर कसने और उसकी धार देने का कोई प्रयास नहीं किया।
.... जारी

Thursday, May 28, 2009

आम चुनाव से मिले संकेत- चार

उत्तर प्रदेश में चमत्कार के स्तर पर जाकर कांग्रेस ने अपनी जड़ फिर से जमाई है। राहुल गांधी की करिश्माई छवि का जो सर्वाधिक चारणगान हो रहा है, वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सतही पुनर्वापसी को ही देखकर ही हो रहा है। कांग्रेसी नक्कारखाने में इस झूठ का इतना शोर है कि सच्चाई यहां तूती की आवाज साबित हो रही है। सच्चाई जब खुलेगी तब सामने आएगा कि जिन क्षेत्रों में कांग्रेस का वोट बढ़ा है और सपा या बसपा का वोट घटा है, उन सबके पीछे राज्य की एक शख्सियत - पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह रहे हैं।

कल्याण सिंह को साथ लेकर समाजवादी पार्टी ने अपनी परंपरागत मुस्लिम वोट खोया तो वरुण गांधी के मुस्लिम विरोधी भाषणों के कारण भी मुसलमानों को सपा से अधिक सुरक्षित जगह कांग्रेस में ही दिखी। यही कारण रहा कि बिना मांगे ही कई क्षेत्रों में कांग्रेस को वोट मिल गए। यह वोट स्थायी न होकर क्षणिक भय से उपजा और नकारात्मक रहा है। भाजपा को यहां वरुण और नरेन्द्र मोदी अपने जहरीले भाषणों से कोई मदद नहीं कर पाए और न ही भाजपा की अपनी राम मंदिर की रणनीति काम कर पायी। हरियाणा, पंजाब में भी कांग्रेस का मुकाबला क्षेत्रीय दलों अकाली दल और इंडियन नेशनल लोकदल से रहा और यहां कांग्रेस ने अपनी शक्ति को बढ़ाया है। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जिस तरह से दो ध्रुवीय राजनीति है उसमें अलग से किसी ताकत के अनायास उभरने की कोई संभावना पहले भी नहीं थी।

कुल मिलाकर इस बार मतदान में जनता ने जातिवादी, सांप्रदायिक, ब्लैकमेंल करनेवाले और क्षेत्रवाद पर राजनीति करने वालों को नकारा है। बिहार में इसी बूते पिछले दो दशकों से सत्ता पर छाए लालू प्रसाद यादव का पराभव हुआ तो राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी पूरी तरह से नेस्तनाबूद हो गयी। उत्तर प्रदेश में सर्वजन की होने का दम भरनेवाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी केवल तीन साल पूर्व ही खुद को प्राप्त 210 विधानसभा सीटों के आंकड़े के आधे को भी इस लोकसभा में नहीं प्राप्त कर सकी। उसे मात्र 20 सीटें मिली हैं। इसी तरह समाजवादी पार्टी की सीटें पिछले लोकसभा चुनाव मे मिली 40 सीटों के मुकाबले आधे के करीब ही रह गयीं। सपा ने 23 सीटें जीतीं। (उत्तर प्रदेश में एक लोकसभा सीट के दायरे में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं)। भाजपा किसी तरह सांप्रदायिक आग भड़काकर अपनी पिछली संख्या को कायम रख सकीं।

प्रदेश में कांग्रेस की अप्रत्याशित वापसी हुई है, जिसका कारण हम ऊपर बता आए हैं कि यह वोट नकारात्मक, बाबरी मिस्जद के विध्वंसक कल्याण सिंह की सपा से दोस्ती और वरुण-नरेन्द्र मोदी के आग उगलने की प्रतिक्रिया में था। बिहार-उड़ीसा में नीतीश कुमार और नवीन पटनायक को मिला जनसमर्थन विकास और उनकी व्यक्तिगत सौम्य छवि पर है। भाजपा की सहयोगी होने के बावजूद नीतीश को वामपंथी पार्टियां तक धर्मनिरपेक्ष कह चुकी हैं तो कंधमाल कांड के बाद भाजपा से पल्ला झाड़ चुके नवीन को वामपंथी पार्टियों ने समर्थन भी दिया था। कुल मिलाकर जनता ने साफ कर दिया है कि वह अब ऐसे उल जलूल की ओछी राजनीति के नाम पर झांसे में आने से रही। बिहार- उत्तर प्रदेश में लालू- राम विलास- मुलायम की जाति आधारित और देश भर में भाजपा के राम मंदिर बनाने के संकल्प वाली राजनीति बुरी तरह पिट गयी।

.... जारी

Tuesday, May 26, 2009

आम चुनाव के नतीजों से मिले संकेत- तीन

पहला भाग दूसरा भाग

उत्तर प्रदेश में चमत्कार के स्तर पर जाकर कांग्रेस ने अपनी जड़ फिर से जमाई है। राहुल गांधी की करिश्माई छवि का जो सर्वाधिक चारणगान हो रहा है, वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सतही पुनर्वापसी को ही देखकर ही हो रहा है। कांग्रेसी नक्कारखाने में इस झूठ का इतना शोर है कि सच्चाई यहां तूती की आवाज साबित हो रही है। सच्चाई जब खुलेगी तब सामने आएगा कि जिन क्षेत्रों में कांग्रेस का वोट बढ़ा है और सपा या बसपा का वोट घटा है, उन सबके पीछे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह रहे हैं।

कल्याण सिंह को साथ लेकर समाजवादी पार्टी ने अपनी परंपरागत मुस्लिम वोट खोया तो वरुण गांधी के मुस्लिम विरोधी भाषणों के कारण भी मुसलमानों को सपा से अधिक सुरक्षित जगह कांग्रेस में ही दिखी। यही कारण रहा कि बिना मांगे ही कई क्षेत्रों में कांग्रेस को वोट मिल गए। यह वोट स्थायी न होकर क्षणिक भय से उपजा और नकारात्मक है। भाजपा को यहां न तो वरुण और नरेन्द्र मोदी अपने जहरीले भाषणों से कोई मदद कर पाए और न ही भाजपा की अपनी राम मंदिर की रणनीति काम कर पायी।

हरियाणा, पंजाब में भी कांग्रेस का मुकाबला क्षेत्रीय दलों अकाली दल और इंडियन नेशनल लोकदल से रहा और यहां कांग्रेस ने अपनी शक्ति को बढ़ाया है। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जिस तरह से दो धु्रवीय राजनीति है उसमें अलग से किसी ताकत के अनायास उभरने की कोई संभावना पहले भी नहीं थी। दक्षिण में केरल और आंध्र में कांग्रेस बेहतर रही। लेकिन कर्नाटक में पिटी और तमिलनाडु में तो वह क्षेत्रीय शक्ति की ही बैशाखी पर टिकी है.

कुल मिलाकर इस बार मतदान में जनता ने जातिवादी, सांप्रदायिक, ब्लैकमेंल करनेवाले और क्षेत्रवाद पर राजनीति करने वालों को नकारा है। बिहार में इसी बूते पिछले दो दशकों से सत्ता पर छाए लालू प्रसाद यादव का पराभव हुआ तो राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी पूरी तरह से नेस्तनाबूद हो गयी। उत्तर प्रदेश में सर्वजन की होने का दम भरनेवाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी केवल तीन साल पूर्व ही खुद को प्राप्त 210 विधानसभा सीटों के आंकड़े के आधे को भी इस लोकसभा में नहीं प्राप्त कर सकी। उसे मात्र 20 सीटें मिली हैं। इसी तरह समाजवादी पार्टी की सीटें पिछले लोकसभा चुनाव मे मिली 40 सीटों के मुकाबले आधे के करीब ही रह गयीं। सपा ने 23 सीटें जीतीं। (उत्तर प्रदेश में एक लोकसभा सीट के दायरे में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं)। भाजपा किसी तरह सांप्रदायिक आग भड़काकर अपनी पिछली संख्या को कायम रख सकीं। प्रदेश में कांग्रेस की अप्रत्याशित वापसी हुई है, जिसका कारण हम ऊपर बता आए हैं कि यह वोट नकारात्मक, बाबरी मस्जिद के विध्वंसक कल्याण सिंह की सपा से दोस्ती और वरुण-नरेन्द्र मोदी के आग उगलने की प्रतिक्रिया में था। बिहार-उड़ीसा में नीतीश कुमार और नवीन पटनायक को मिला जनसमर्थन विकास और उनकी व्यक्तिगत सौम्य छवि पर है। भाजपा की सहयोगी होने के बावजूद नीतीश को वामपंथी पार्टियां तक धर्मनिरपेक्ष कह चुकी हैं तो कंधमाल कांड के बाद भाजपा से पल्ला झाड़ चुके नवीन को वामपंथी पार्टियों ने समर्थन भी दिया था। कुल मिलाकर जनता ने साफ कर दिया है कि वह अब ऐसे उल जलूल की ओछी राजनीति के नाम पर झांसे में आने से रही। बिहार- उत्तर प्रदेश में लालू- रामविलास के जाति आधारित और देश भर में भाजपा के राम मंदिर बनाने के संकल्प वाली राजनीति बुरी तरह पिट गयी।

लेकिन इन प्रदेशों में सबसे चिंतित करनेवाली बात जो दिखाई दे रही है, वह परिवर्तनवादी -प्रगतिशील धारा का अंत है। यह कोई जनता की इच्छा के कारण नहीं बल्कि इन धाराओं की आपसी नालायकी की वजह से हुआ है। बिहार में शुद्ध रूप से जातिवाद की राजनीति पर आधारित लालू को 15 साल तक समर्थन देकर वहां की जनाधार वाली भाकपा ने अपने को धराशायी कर लिया तो उत्तर प्रदेश में भी उसकी बची-खुची ताकत का अंत उसी तरह की राजनीति करनेवाले मुलायम सिंह को समर्थन के कारण हुआ। बिहार में वामपंथ के नाम पर भाकपा-माले है लेकिन उसकी पहचान एक क्षेत्रीय तौर पर ही है और उसकी विश्वसनीयता न के बराबर है। उधर लोहिया के समाजवाद और जयप्रकाश आंदोलन की गर्भ से निकले लालू- मुलायम की पार्टियां पूरी तरह जातिवाद और भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी हैं। इन पार्टियों पर कारपोरेट घरानों, उद्योगपतियों, उनके एजेंटों और सत्ता के शुद्ध दलालों का कब्जा हैं।
.... जारी

Monday, May 25, 2009

आम चुनाव नतीजों से मेले संकेत - दो

पहला भाग

अगर पिछली सरकार में वामदलों का प्रभावी हस्तक्षेप न रहता तो बैंकों का निजीकरण, बीमा कंपनियों का निजीकरण, पीएफ फंड का शेयर बाजार में निवेश आदि कई कानून पारित हो जाते। ऐसे में आज जो वैश्विश्वक मंदी आयी है, उसका जितना भयंकर दुश्प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। खुद मनमोहन सिंह ने ही यह स्वीकार किया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने हमे मंदी में भी मजबूती प्रदान की है। दूसरी ओर वामदलों के लिए निराशाजनक बात यह रही कि खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी तमाम राजनीतिक और वैचारिक पूंजी को नंदीग्राम और सिंगूर में बड़े पैमाने पर जनसंहार कर और किसानों को तबाह कर नष्ट कर लिया। यहां तक कि उसने टाटा और सलेम समूह के लठैत का काम करते हुए अपने सहयोगियों -भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, फारवर्ड ब्लॉक और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी तक को नहीं बख्शा। उनके विरोध और उनकी आपत्तियों को तो नहीं ही सुना उल्टे उनपर हमले भी किये। इसका असर हुआ कि बंगाल में वामपंथी बुदि्धजीवी भी उससे अलग होते गये।

कभी देश भर में विपक्षी राजनीति के एक मजबूत स्तंभ के रूप में विश्वसनीयता हासिल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बंगाल और केरल के अंतर्कलह और नंदीग्राम-सिंगुर के पाप से उबरने में ही उलझी रही। माकपा ने हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे मोर्चे के पिटे-पिटाए प्रयोग को अपने स्तर पर करने की कवायद शुरू की लेकिन यह एक तो काफी देर से उठाया गया कदम था और दूसरे इसमें जिन ताकतों पर भरोसा किया गया वे पहले से ही अविश्वसनीय हैं। इसका परिणाम सामने है।

लेकिन बंगाल से लेकर पूरे उत्तर और मध्य भारत पर नजर दौड़ायें तो हम पाते हैं कि इसका फायदा जनता ने कहीं भी भाजपा या कांग्रेस को नहीं दिया है। पश्चिम बंगाल में माकपा की हार का फायदा क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस को मिला है। तृणमूल के साथ गठबंधन के कारण ही कांग्रेस को यहां वाम विरोधी मत मिले हैं। बिहार में कांग्रेस अपने ही घटकों से बुरी तरह उलझी। यहां उसे पहले की तीन सीटें भी नहीं मिल पायीं। यहां पर भी फायदा जदयू और उसके साथ होने के कारण भाजपा ने उठाया। बिहार की राजनीति को देखें तो साफ है कि जनता ने इस बार नीतीश कुमार की सरकार को विकास के नाम पर जितना वोट दिया है उससे कहीं ज्यादा उस लंपट और बकवासी राजनीति के खिलाफ मतदान किया है जिसके साए में राज्य की जनता 1990 से 2005 तक की लालू-राबड़ी राज में रहती आयी थी। बिहार में लोगों की बातों में और उनके जेहन में उस आतंकी और जंगल राज की याददाश्त साफ देखी जा सकती है। अभी नीतीश कुमार के शासन में जो कुछ सकारात्मक काम हुए हैं, उनमें अपराध पर अंकुश लगा है। लूटपाट की प्रवृत्ति रुकी है और कुछ हद तक विकासात्मक काम भी आगे बढ़े हैं।

लालू प्रसाद यादव के मुकाबले नीतीश की सौम्य भाषा और छवि ने भी जदयू-भाजपा गठजोड़ को काफी मदद की है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान भाकपा महासचिव ए.बी. बर्धन भी नीतीश को धर्मनिरपेक्ष घो्षित कर चुके हैं। यहां भाजपा के वोट में बेतहाशा वृदि्ध धर्मनिरपेक्ष राजनीति करनेवालों के लिए चिंता की बात है। लेकिन बिहार-उड़ीसा में दूषित ताकतों के निषेध भाव पर टिका यह जनमत ज्यादा दिनों तक बना नहीं रह पाएगा। लोग स्थिर होने पर विभिन्न जन समस्याओं पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि इन जनपक्षीय मुद्दों पर ये पूंजीवादी, बाजारवादी सरकारें भी ढोल की पोल साबित हो रही हैं। ऐसे में एक बड़ा राजनीतिक खालीपन उभरेगा।
..... जारी

Sunday, May 24, 2009

आम चुनाव से मिले संकेत - एक

लोकसभा चुनाव के परिणाम में कांग्रेस को 205 सीटें मिलने के बाद पार्टी की चापलूसी परंपरा का निर्वाह करते हुए राहुल गांधी और सोनिया गांधी की जो जयकार हो रही है, वह तो संभावित ही थी, लेकिन इस बार आश्चर्यचकित कर देनेवाली बात यह है कि देश का पूरा मीडिया भी इस झूठी जय-जयकार में शामिल हो गया है। इस मामले में मीडिया ने अपने वाम-दक्षिण होने के सारे भेद को खत्म कर लिया है।

वस्तुस्थिति पर नजर डालें तो कांग्रेस को मिली सीटें 1991 के चुनाव में मिली सीटों से कम ही हैं। इसके बाद कांग्रेस को हमेशा 150 से कम ही सीटें मिलती रही हैं। इस बार अंतर सिर्फ इतना है कि मुख्य विपक्ष का खम ठोकने वाली भारतीय जनता पार्टी सीटों के मामले में पिछले चुनाव से और नीचे चली गयी है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर लड़ाई के दो मुख्य ध्रुव कांग्रेस-भाजपा ही बने रहे। साथ ही सरकारों पर राजनीतिक दबाव बनाए रखनेवाले वामदलों की ताकत बुरी तरह से क्षीण हुई है। बाकी क्षेत्रीय दलों के उभार में कहीं कोई कमी नहीं आयी है और न ही लोग इन छोटे दलों से निराश हुए हैं।

चुनाव के परिणाम बताते हैं कि देश में क्षेत्रीय अस्मिताएं तमाम कमियों और क्षुद्र राजनीति का अड्डा होने के बावजूद न केवल बरकरार है बल्कि लगातार बढ़ रही हैं। लगता है कि मीडिया जिस तरह से राहत और खुशी का इजहार कर रहा है वह केवल इन वामपंथी दलों के ध्वस्त होने की ही खुशी है न कि देश में किसी कथित दो दलीय व्यवस्था कायम होने या राजनीति को अस्थिर करने वाली ताकतों के क्षय की। यह मीडिया के उच्चवर्गीय चरित्र को ही दिखलाता है जो अपने ख्यालों में ही आकाश कुसुम खिला रहा है। यह खुशी इसलिए भी है कि वामपंथी पार्टियां जिस तरह से बाजारवाद को उद्धत मनमोहन-चिदबंरम-मोंटेक की तिकड़ी पर तलवार लटकाए रखती थी, उससे मीडिया के कर्ताधर्ताओं और विज्ञापनदाताओं का हित ही प्रभावित हो रहा था और सरकार को खुले खेल की कभी पूरी छूट नहीं मिल पाती थी। कांग्रेस का जो थोड़ा उभार इस बार दिखा वह मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के अंदर आडवाणी बनाम शेखावत-मोदी के अंतर्कलह, भाजपा द्वारा चुनावी लड़ाई को व्यक्तिगत बनाकर मनमोहन सिंह पर कमजोर होने का निजी आक्षेप और वरुण गांधी- नरेन्द्र मोदी द्वारा मुस्लिम विरोधी भड़काऊ भाशणों के कारण है। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह से दोस्ती के कारण मुसलमानों का विश्वास सपा से उठना भी एक कारण रहा है।

जो लोग इस चुनाव से निकले नतीजों में देश में दो दलीय प्रणाली की स्थापना देख रहे हैं उनके लिए निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आंकड़े आईना का काम करेंगे। उल्टे कांग्रेस-भाजपा जैसे कथित राश्ट्रीय पार्टियों की मिले वोटों से कहीं अधिक वोट बाकी शक्तियों को मिली है। निर्वाचन आयोग के अनुसार ही, इस बार कांग्रेस को 28.52 फीसदी वोट मिले जबकि भाजपा को केवल 18.83 फीसदी, बसपा को 6.18 फीसदी, माकपा को 5.34 फीसदी, राकांपा को 2.04 फीसदी, भाकपा को 1.43 फीसदी, राजद को 1.27 फीसदी और अन्य पार्टियों व निर्दलीयों को 36.4 फीसदी वोट मिले हैं। यहां साफ है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों को सम्मिलित रूप से मिले वोट का प्रतिशत केवल 47.35 फीसदी ही रहा जबकि 2004 में दोनों को मिलाकर 49.5 फीसदी वोट मिले थे। यानी, दोनों राश्ट्रीय दलों को मिलाकर भी 50 फीसदी वोट नहीं मिले। यह आंकड़ा उन विश्लेशकों के मुंह पर तमाचा जैसा है जो देश को दो दलीय व्यवस्था की ओर बढ़ते देख रहे हैं। ....

जारी

Thursday, April 9, 2009

जूते गुजरात पर भी चले और इस नजीर को सलाम भी करें

अहमदाबाद के निकट कोहा गांव के धूराजी और बाबूबेन ठाकुर को शायद आपमें से कोई नहीं जानता हो। लेकिन इन दोनों ने आजाद भारत के सबसे दुखद दिनों में मानवता को बचाकर एक मिशाल पेश की है। गुजरात में 2002 में हुए एकतरफा जनसंहार के हालात पर अंग्रेजी में पुस्तक ‍"फीयर एंड फोरगिवनेस" में पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर ने इस दंपति के सर्वोत्तम मानवीय कार्य को याद किया है, जो इतिहास में नजीर के रूप में दर्ज हो चुका है।

पुस्तक के मुताबिक, दंगाइयों ने 110 लोगों के घरों से सारा सामान लूटने के बाद उनके घरों को आग लगा दी थी और उन्हें पनाह देनेवाला कोई नहीं था। सारा दिन खेत में छिपे रहने के बाद उन्होंने एक रात गुजारने के लिए धूराजी के घर पर दस्तक दी। धूराजी और बाबूबेन ने एक भी पल सोचे बिना अपने घर के दरवाजे इन मुसीबतजदा मेहमानों के लिए खोल दिए। समूचा गुजरात जल रहा था, लिहाजा इस परिवार ने अगले 10 दिनों तक इन सबको घर में रखा और जब हालात कुछ ठीक हुए तो इन्हें ट्रैक्टरों से कैंप तक पहुंचाया। इतने ही दिनों में इस परिवार का साल भर का अनाज खत्म हो गया। लेकिन इस परिवार को इसका मलाल नहीं। उन्होंने कहा कि उन सबकी दुआ से मेरा भंडार फिर भर गया और खेतों में फसल लहलहा रही हैं।

पुस्तक के अनुसार, 2002 का दंगा कोई साधारण दंगा नहीं, बल्कि सरकार की देखरेख में कराया गया जनसंहार था। इसकी योजना पहले से ही तैयार की गई थी। पुस्तक में मंदर लिखते हैं कि पूरी तरह से तबाह लोगों की मदद करनेवाला कोई नहीं था। अपनी जायदाद की हिफाजत करने के लिए साबरमती आश्रम ने भी दरवाजे बंद कर लिये थे।

भय और नफरत के माहौल में मानवता की उम्मीद की किरण धूराजी और बाबूबेन ही नहीं थे। ऐसे सैंकड़ों लोग हैं, जिन्होंने बेगुनाह लोगों और बच्चों को बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। साबरकांठा जिले के नानापोशिना गांव में बूढे वली भाई अपने जले हुए घर के सामने बैठे रात भर रोते रहे। सुबह उनके पास शौच जाने के लिए लोटा तक नहीं था। एक ठाकुर लड़के ने दबे पांव आकर उसके बगल में एक लोटा रख दिया और चुपचाप चला गया। इस मूक संवाद में कुछ ऐसा था कि वली भाई की जिंदगी चल पड़ी। गांव की ही एक महिला ने अपने समुदाय के विरोध के बावजूद उन्हें आठ दिन तक खाना दिया और एक दोस्त ने उनके मकान के लिए टिन की छत बनवा दी।

आज जब सिख दंगों पर एक पत्रकार का जूता निशाने पर सटीक बैठा है और 25 साल पुराना दर्द हरा हो गया है और इसपर बहस शुरू हो गई है, गुजरात की उस भयावह तस्वीर पर भी बहस तेज होनी चाहिए। गुजरात ने जिस तरह का भयानक दौर देखा है, उसमें टिकाऊ शांति के लिए पश्चाताप, सहानुभूति और न्याय जरूरी है। लेकिन सात साल गुजर जाने के बावजूद फिलहाल तो ये चीजें कहीं दिखाई नहीं देती।

Saturday, January 10, 2009

आजाद भारत में भी प्रताड़ित होते रहे आजाद हिन्द फौज के सिपाही

कांग्रेस की पहली अंतरिम सरकार के कार्यकाल मे अंग्रेजों ने कइयों को चढ़ा दिया फांसी

देश के लोगों को आज इतना भर पता है कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति और इसमें धूरी राष्ट्रों की पराजय के बाद उनके साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रही सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज के केवल तीन युद्धबंदियों - जनरल शाहनवाज खां, कैप्टन प्रेम कुमार सहगल और कैप्टन जी।एस. ढिल्लन को ही भारत में ब्रिटिश शासन के कोर्ट मार्शल का दंश झेलना पड़ा था। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे हजारों सिपाहियों के खिलाफ देश की विभिन्न जेलों में कोर्ट मा्र्शल की कार्रवाई की गयी थी। आजाद हिन्द फौज के ऐसे ही एक सेनानी रहे हैं कैप्टन अब्बास अली, जिन्हें उस समय फांसी की सजा सुनायी गयी थी और 1945 में कांग्रेस की अंतरिम सरकार ने उन्हें राहत दी थी। अब्बास अली ने हाल में ही अपनी आत्मकथा `न रहूं किसी का दस्तनिगर´ लिखी है और उसमें पंडित नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली अंतरिम सरकार द्वारा आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के साथ किये गये बर्ताव का बेबाकी से वर्णन किया है।

इस पुस्तक के अनुसार, स्वतंत्र भारत के पहले सेनाध्यक्ष जनरल के।एम. करियप्पा की नजर में आजाद हिन्द फौज के सिपाही अनुशासनहीन थे और इसीलिए उन्हें आजादी मिलने के बाद भी देश की सेना में शामिल नहीं किया गया। वैसे देशवासियों की नजर में आजादी के लिए अपने तरीके से प्रयास करने की मुहिम में आजाद हिन्द फौज और उसके संस्थापक सुभाष चन्द्र बोस के योगदान को किसी भी कीमत पर कम करके नहीं आंका जा सकता है। लेकिन तथ्य तो यही बताते हैं कि आजाद भारत की पहली ही सरकार ने उनके साथ न्याय नहीं किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना से विद्रोह करने के आरोप में कोर्ट मार्शल के बाद फांसी की सजा सुनाये गये अब्बास अली आजादी के बाद देश में समाजवादी आंदोलन से जुड़ गये। जनता पार्टी के सदस्य के रूप में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे कैप्टन अली लिखते हैं कि विश्वयुद्ध में आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को ब्रिटिश सरकार से बगावत कर जापान का साथ देने के आरोप में कोर्ट मार्शल के दौरान फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद 1946 में बनी अंतरिम सरकार ने अधिकांश सैनिकों की सजा को मुल्तवी कर दिया लेकिन कुछ एक सिपाहियों को ब्रिटिश अधिकारियों ने फिर भी सजा-ए-मौत दे दी और भारत सरकार कुछ न कर सकी। इतना ही नहीं, कोर्ट मा्र्शल की कार्रवाई के दौरान भी उन लोगों के साथ जेलों में बुरा बर्ताव किया गया। कैप्टन अली के मुताबिक, देश की आजादी के लिए आईएनए (आजाद हिंद फौज) में भर्ती हुए सैनिकों को उम्मीद थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन सभी को भारतीय सेना में शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन हमारी ही सरकार ने हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और वह भी नाकाबिल बताकर। पुस्तक में खुलासा किया गया है कि आजाद हिन्द फौज में एक लाख से ज्यादा सैनिक थे और इनमें से 60,000 से अधिक पहले ब्रिटिश फौज में थे।

कैप्टन अली ने पुस्तक में बयां किया है, `बड़े अफसोस के साथ मुझे लिखना पड़ रहा है कि हम बागियों को यह कहकर आजाद भारत की सेना में शामिल नहीं किया गया कि ऐ फौजी अनुशासित नहीं हैं। मुझे याद पड़ता है कि देश के पहले सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा ने बयान दिया था कि चूंकि आईएनए के सिपाही अनुशासित नहीं हैं, इसलिए उन्हें दोबारा सेना में शामिल नहीं किया जाएगा और हमारी सरकार ने उनकी यह बात मान ली। अली की किताब के मुताबिक, आईएनए के इन सिपाहियों को सम्मान दिलाने के लिए देश के नेताओं में सिर्फ डॉ. राम मनोहर लोहिया ने बार-बार आवाज उठायी थी।
उन्होंने लिखा है कि आजादी के बाद आजाद हिन्द के फौजियों को भारतीय सेना में शामिल करने या न करने का सवाल उठाना ही निरर्थक था। खैर, अगर यह सवाल उठाया भी गया तो फिर उन्हें बगावती बताकर सेना में शामिल करने से अयोग्य ठहराये जाते वक्त यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया कि देश की आजादी के इन दीवानों आखिरकार बगावत किसके खिलाफ की थी। अपने देश के खिलाफ या फिर देश के दुश्मनों के खिलाफ ?

पुस्तक में बड़े अफसोस के साथ लिखा गया है कि एक सैनिक के लिए उसके फौजी होने से अयोग्य बताने से बड़ी पीड़ा और कुछ नहीं हो सकती और इस पीड़ा का अंत यहीं नहीं हुआ बल्कि कांग्रेसी सरकार ने इन सिपाहियों और अफसरों को 1972 तक न तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना और न ही पेंशन और कोई सुविधा दी। विपक्षी दलों के संसद से सड़क तक संघर्ष और जद्दोजहद के बाद 1972 में इंदिरा गांधी की सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी माना और पेंशन दी। लेकिन इस समय तक तमाम सिपाही मर चुके थे और जो बचे थे, उनमें से अधिकांश को सरकार ने दस्तावेजी सबूतों के अभाव में आईएनए का सिपाही ही नहीं माना।

Wednesday, December 31, 2008

बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत गाता जाए बनजारा

15 करोड़ खानाबदोश व अर्ध खानाबदोश जनजातियों के बारे में आयोग की रिपोर्ट खटाई में

छठी सदी के संस्कृत के महाकवि दंडी ने अपनी रचना दशकुमार चरित्र में एक जाति का उल्लेख किया है। यह जाति और कोई नहीं आज के युग में भी तंबू-कनात लिए हुए एक जगह से दूसरी जगह अपना आशियाना बदलतीं बनजारा जातियां हैं। भारत सरकार द्वारा गठित खानाबदोश एवं अर्ध खानाबदोश जनजाति राष्ट्रीय आयोग ने जुलाई २००८ के पहले सप्ताह में सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस समय देश में करीब 12 करोड़ ऐसी आबादी है। कुछ अन्य स्रोतों से यह संख्या 15 करोड़ बतायी गयी है। यानि पूरा उत्तर प्रदेश जितनी बड़ी आबादी या यूरोप के कई देशों के बराबर की आबादी भारत में बेघरबार इधर-उधर भटक रही है। इनकी न तो कोई नागरिकता होती है और न ही कोई पहचान। आयोग के अनुसार देश का नागरिक होते हुए भी व्यवहार से बंजारा जातियां न किसी देश का नागरिक है और न ही उसे नागरिक जैसे अधिकार प्राप्त हैं।

बालकृष्ण रेणके की अध्यक्षता में गठित आयोग ने बंजारों की स्थिति में सुधार के लिए 38 अंतरिम सिफारिशें की और उन्हें आवश्यक नीति एवं योजना निर्माण के लिए सामाजिक न्याय मंत्रालय को सौंपा। लेकिन न तो संसद को और न ही इन बनजारों को ही सरकार की ओर से यह बताया गया है कि उनके हालात में बेहतरी के लिए इन सिफारिशों की रोशनी में क्या कुछ किया जा रहा है। आयोग ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की है कि विभिन्न राज्यों में इन जातियों को दलित-आदिवासी या पिछड़ा- किसी वर्ग में शामिल नहीं किया गया है। आयोग ने इन जातियों के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय खोलने तथा उन्हें आवश्यक तकनीकी प्रिशक्षण देने पर बल दिया है और इनके लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया है।

बंजारा मुख्य रूप से देश के दक्षिण और पश्चिम में बसे हैं। वैसे ऐसी घूमन्तु जातियां देश भर में हैं। उत्तर प्रदेश में ये बावरिया और बिहार में करोर, नट, बक्खो आदि कहलाते हैं। दक्षिण के बनजारे अपना उत्स उत्तर भारत की ब्राह्मण और राजपूत जातियों से मानते हैं, तो राजस्थान मूल की गड़िया लोहार नामक बनजारा जाति चित्तौड़ की राजपूत जाति से। इतिहास में इस जाति का पहला उल्लेख 1612 की तारीखे-खाने-जहान लोदी में मिलता है। ग्रियर्सन के अनुसार, बंजारा नाम संभवत: संस्कृत के वाणिज्यकार से आया है। बंजारा जाति को और भी कई नामों से जाना जाता है। इनमें बनजारी, ब्रिजपरी, लभानी, लाबांकी, लबाना, लभाणी, लंबानी, बोइपारी, सुगाली आदि शामिल है।

अंग्रेंजों ने 1871 में अपराधी जनजाति कानून बनाकर सभी बंजारा जातियों को चोर-लूटेरे के रूप में चित्रित किया। यह काला कानून 1952 में रद्द हो गया लेकिन उसकी जगह `आदतन अपराधी कानून 1952´ स्वतंत्र भारत की संसद ने बना दिया, जो आज भी लागू है। इसके अलावा भिक्षा प्रथा निषेध कानून के तहत भी इन जातियों को प्रताड़ित करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति, वर्तमान में राज्यसभा सांसद और उर्दू के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित डॉ। जाबिर हुसैन द्वारा संपादित अर्धवार्षिक पत्रिका `दोआबा´ का दिसंबर 2008 का अंक खानाबदोशों पर ही केंद्रित है।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1930 में लिखा था, ` अपराधी जनजाति कानून के विनाशकारी प्रावधान को लेकर मैं चिंतित हूं। यह नागरिक स्वतंत्रता का निषेध करता है। इसकी कार्यप्रणाली पर व्यापक रूप से विचार किया जाना चाहिए और को्शिश की जानी चाहिए कि उसे संविधान से हटाया जाए। किसी भी जनजाति को अपराधी करार नहीं दिया जा सकता।´ लेकिन लगता है नेहरू के वारिश ही उनकी भावना नहीं समझ पा रहे है या समझ कर भी अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं।

दोआबा में खानाबदोशों पर रिपोर्ट को अगली पोस्टों में जारी रखने की कोशिश करूंगा।

Tuesday, December 30, 2008

इन सैनिकों की भी सुनिए

पूर्व सैनिकों का एक समूह इन दिनों जंतर मंतर पर अनिश्चतकालीन भूख-हड़ताल पर बैठा है। 2008 में सैन्य बलों की छवि जितनी धूमिल हुई उतनी पहले कभी नहीं। पूरे साल भर सैन्य दुनिया की फिजाओं में संकट के बादल उमड़ते रहे हैं।

जंतर-मंतर पर सड़क के किनारे पूर्व सैनिक भूख हड़ताल पर बैठे हैं। एक महिला डॉक्टर इन हड़तालियों के ब्लड प्रेशर, नाड़ी आदि चेक करती हैं। वहां के रजिस्टर में हड़तालियों का ब्लड प्रेशर सामान्य है, नाड़ी भी सामान्य। समूह में सिपाही सुलेमान खान हैं तो पूर्व उप सेना प्रमुख ले। जन. राज कदयान भी हैं।

बरेली का एक रिटायर जेसीओ अपने रिटायर साथियों को 10 मिनट तक फोन पर कांग्रेस और भाजपा दोनों का विरोध करने की सलाह देता है। वहां जो उचित हो वही करने की सलाह भी देता है पर राजनीतिक समझ के साथ। एक कारगिल शहीद की विधवा वहां उपस्थित लोगों से आंसू भरी आंखों से अपील करती हैं कि आशा न छोड़ें, संघषZ कभी न छोड़ें। यहां कोई तमाशा नहीं है। यहां न तो शोर शराबा है और न ही आने पर रोक। लेकिन यह एक ऐसी कहानी है जिससे हर देशवासी को अवगत होना चाहिए। आप इन पूर्व सैनिकों की मांग से सहमत हों या न हों लेकिन आप अन्याय की कटू पीड़ा का अनुभव तो करते ही होंगे। इससे सरकार से इनका भरोसा भी उठ गया है।

याद रखें कि यह ऐसे समय में हो रहा है जब मुंबई हमले से पूरा देश उद्वेलित हो रहा है। इनका नुकसान यह हुआ है कि छठे वेतन आयोग ने सशस्त्र बलों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।
आजकल राजनेताओं को सीधे तौर पर स्वार्थी और बेइमान मान लिया जाता है। नौकरशाह तो पहले से ही भ्रष्ट हैं। पिछले छह दशकों में बलों ने केवल बाबुओं के लिए काम किया है और पिछले कुछ महीनों से यही पानी सिर से ऊपर बहने लगा है।

सैन्य बलों के अधिकांश अधिकारियों का मत है कि संप्रग सरकार ने मालेगांव विस्फोट की जांच के द्वारा देश के लोगों में सेना की यह छवि बनायी है कि लोग जितना ईमानदार सेना को समझते हैं, वह उतनी है नहीं और इसलिए उसक मांगें भी मानने लायक नहीं है। मालेगांव विस्फोट में एक ले। कर्नल आरोपी है।

वह तो भला हो प्रधानमंत्री का, जिन्होंने छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों में सुधार कर सेना में कुछ खुशी आयी है। आगामी साल 2009 भी सेनाओं के लिए संभवत: बहुत खुशी का साल न रहे लेकिन इस साल मे चुनाव और बदलाव की संभावना है जो सेना के लिए खुशखबरी ला सकती है।


(निवेदिता खांडेकर के सहयोग से िशव अरूर की रिपोर्ट पर आधारित)

Thursday, December 11, 2008

भारत गरीब, एम् एल ऐ अमीर

जो यह जानना चाहते हैं कि भारत कितनी तेजी से तरक्की कर रहा है, उनको यह देखना चाहिए कि इस देश के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की संपत्ति कितनी तेजी से बढ़ती जा रही है।

दिल्ली स्थित लाइब्रेरी इंस्टीट्यूट की `सशक्त भारत´ परियोजना के तहत जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उतरे उम्मीदवारों की औसत संंपत्ति 2003 की अपेक्षा 47 फीसदी सालाना के हिसाब से बढ़ी है। इनकी औसत संपत्ति 2003 में 24 लाख थी जो 2008 में बढ़कर 167 लाख हो गई।
हालांकि इस औसत आय से बहुत कुछ साफ नहीं होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली में 2003 में चुनाव लड़े 817 उम्मीदवारों में से 146 ने अपनी संपत्ति शून्य घोषित की थी।

कांग्रेस के उम्मीदवारों की औसत संपत्ति इस दौरान 92 लाख से बढ़कर 321 लाख हो गई जबकि भाजपा उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 56 लाख से बढ़कर 300 लाख।

कर्नाटक विधानसभा के लिए उतरे उम्मीदवारों की औसत आय दो चुनावों के बीच 53 लाख से बढ़कर 204 लाख पर पहुंच गई। इनमें कांग्रेस उम्मीदवारों की संपत्ति 120 लाख से बढ़कर 875 लाख हो गई तो भाजपा उम्मीदवारों की 88 लाख से बढ़कर 384 लाख।

इसमें भी दिलचस्प बात यह रही कि विपक्षी उम्मीदवारों की औसत संपत्ति सत्तारूढ दल के उम्मीदवारों की अपेक्षा तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के तौर दिल्ली में कांग्रेस उम्मीदवारों की संपत्ति की तुलना में भाजपा उम्मीदवारो की संपत्ति अधिक तेजी से बढ़ी, तो वहीं मध्य प्रदेश में भाजपा उम्मीदवारों के मुकाबले कांग्रेस उम्मीदवारों की।

Sunday, November 30, 2008

चोरी जा रहा है नर्मदा का पानी

गुजरात में बहनेवाली नर्मदा नदी के पानी की चोरी गुजरात में ही हो रही है। इस कारण राजस्थान के बड़े इलाके में खेती सूख रही है। राजस्थान के सांचौर इलाके में नहरें सूखने लगी हैं। पुष्ट खबरों के अनुसार गुजरात के रीड़का गांव में लोग राजस्थान आ रही नहर से पंप लगाकर पानी चुरा रहे है और अपने खेतों की सिंचाई कर रहे हैं।

उधर, राजस्थान में नर्मदा नहर की वांक, जैसला और माणकी उपनहरों के सिंचाई क्षेत्र में किसानों ने अपने खेतों में फसलें बो दी हैं। लेकिन इन उपनहरों में पानी नहीं है क्योंकि गुजरात में ही इस पानी की चोरी हो जा रही है।

इस बीच राजस्थान के इन इलाकों के किसानों ने कर्ज लेकर फव्वारा सेट व बीज खरीदा लेकिन पानी न होने के कारण ये सब बेकार पड़े हैं और कर्ज चुकाना भी मुिश्कल हो रहा है।

राजस्थान के किसानों का आरोप है कि गुजरात में पानी चोरी रोकने के कोई उपाय नहीं किए जा रहे हैं। वहां के किसान पाइपों से 10-10 किलोमीटर तक पानी ले जा रहे हैं।

यहां सबसे बड़ी बाधा है कि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। इसलिए एक ओर तो राजस्थान सरकार गुजरात सरकार के खिलाफ कुछ खुलकर बोलना नहीं चाहती तो दूसरी चुनाव की अग्निपरीक्षा दे रही राजस्थान सरकार के लिए किसानों को पानी दिलाना एक चुनौती बन गया है। हालांकि वसुंधरा सरकार इस जुगत में है कि 4 दिसंबर को मतदान हो जाए तो नििश्चंत हो जाएं।

Saturday, November 29, 2008

टला नही है समुद्री खतरा

मुंबई के ताज, ओबेराय-ट्राईडेंट होटल और नरीमन हाउस में पिछले 60 घंटों से आंतकिंयों के साथ तीनों सेनाओं, एनएसजी, नौसेना के मार्कोस कमांडों और मुंबई पुलिस की संयुक्त मुठभेड़ का अंत हो गया। लेकिन यह मुठभेड़ इससे भी बड़े खतरे का संकेत दे गया है। करीब 7000 किलोमीटर की समुद्री सीमा से घिरे भारत पर समुद्र से होनेवाले हमले का खतरा भविष्य में और मजबूत हुआ है। इस आतंकी हमले की प्रारंभिक जांच में ही पता चल गया कि आतंकी समुद्र के रास्ते आए। अवांछित गतिविधियों के लिए समुद्री रास्ते के उपयोग की बात वैसे नई नहीं है। १९९३ में इसी रास्ते दाउद हथियार लाने में सफ़ल रहा था। पेट्रोलियम की तस्करी के लिए यह मार्ग पहले से काफी मुफीद रहा ही है, सोने, ड्रग्स और हथियारों की भी भारी मात्रा में इस रास्ते तस्करी होती रही हैं।

भारत का समुद्री किनारा गुजरात के कांडला पोर्ट से लेकर पश्चिम बंगाल में हल्दिया तक फैला है। यहां बंगाल की खाड़ी और अरब सागर हैं, जहां बड़ी संख्या में आतंकी, उग्रवादी व डाकू समुद्री हमले की क्षमता के साथ सक्रिय हैं। समुद्री मार्ग से भारत पर कौन-कौन कर सकते हैं हमले, कितने सक्षम हैं हमलावर और अन्य गुट या व्यक्ति किस तरह से कर सकते हैं हमले में सहयोग इसपर एक नजर :

- विभिन्न देशों की नौसैनिक गश्त के बावजूद 2004 में समुद्री डाकुओं ने तेल और गैस के 67 जहाजों पर हमले किए।

- 2004 में मालवाहक जहाजों पर 52 हमले। डाकू जहाजों को मलक्का की खाड़ी में ले गए। यह खाडी डाकुओं के लिए स्वर्ग है।

- आतंकी हथियार या जैविक हथियार से भरे जहाजों को तट पर पहुंचाने के बाद सेल्युलर फोन से विस्फोट कर सकते हैं।

- समुद्र में स्थित तेलशोधक संयंत्रों और तटवर्ती परमाणु संयंत्रों पर हमला किया जा सकता है।

- श्रीलंकाई तमिल उग्रवादी संगठन लिट्टे के पास समुद्री युद्ध की परंपरागत और गैर परंपरागत दोनों प्रकार की क्षमता के साथ वाणििज्यक जहाजरानी की क्षमता भी है। इसका उपयोग वह नारकोटिक्स और अस्त्र-शस्त्रों की तस्करी में कर सकता है।

- फिलीपींस का अबु सय्याफ आतंकी संगठन जमीन से समुद्र में मार करने की क्षमता से लैस है।

- भारतीय समुद्री क्षेत्र में अलकायदा का सघन नेटवर्क है। उसके सहयोगी अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक फ्रंट भी यहां सक्रिय है। इसी संगठन ने अक्टूबर 2002 में इंडोनेिशया के बाली द्वीप पर हमला कर 200 से अधिक लोगों को मार डाला था।

- अपना समुद्री क्षेत्र हेरोइन की तस्करी का स्वर्ण त्रिकोण और स्वर्ण अर्धचंद्र के नाम से कुख्यात है। अब यहां सिंथेटिक ड्रग्स का उत्पादन और इसका व्यापार होने लगा है।

- इस समुद्र में सक्रिय आतंकी-उग्रवादी गुटों में हमास, हिजबुल्ला, अलकायदा, पाकिस्तान के विभिन्न जिहादी गुट, लिट्टे, बर्मा की यूनाइटेड वे स्टेट आर्मी और दक्षिणी फिलीपींस के जिहादी शामिल हैं।

- थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस में उग्रवादी गुटों के पास भारी मात्रा में हथियार मौजूद हैं। ये आतंकी संगठन सोने व ड्रग्स की तस्करी में लिप्त हैं।

- इस समुद्र में ट्रांस नेशनल माफिया सक्रिय है। इसमें दाउद इब्राहिम की डी कंपनी प्रमुख है। इसके तार अलकायदा और अन्य जिहादी नेटवर्क से जुड़े हैं।

- पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिकों के तार अलकायदा से। ए।क्यू. खान का तो खुलासा हो गया लेकिन बहुत अब भी छिपे रुस्तम हैं। मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात के अनेक वैज्ञानिक भी यहां सक्रिय हैं।

- पाकिस्तान इसी समुद्र के रास्ते एशियाई और दक्षिणी अफ्रीकी देशों में परमाणु उपकरणों की सप्लाई करता है। इससे ऐसे घातक हथियार हमेशा इस समुद्र में मौजूद हैं।

- अरब सागर में सोमालिया के समुद्री डाकुओं के अलावा हिन्द महासागर में दक्षिण चीन और इंडोनेशिया के ड्रग तस्कर व डाकू सक्रिय हैं। इनका अभी आतंकी संगठनों से संपर्क की सूचना नहीं लेकिन भविष्य में जुड़ सकते हैं तार।

- इस समुद्री इलाके में बड़ी संख्या में अज्ञात और अनाम द्वीप मौजूद हैं जिनपर किसी देश का नियंत्रण नहीं है। ये द्वीप वर्तमान में डाकुओं के अड्डे हैं। भविष्य में यहां आतंकियों के ठिकाने हो सकते हैं, जहां से भारतीय तटों पर हमले की आशंका है।

क्या इतने सारे खतरों से निपटने की तैयारी है। क्या इनसे निपटने की सक्षमता हासिल किए बिना हमारा समुद्र तट सुरक्षित माना जाएगा ?

२९ नवंबर को हिन्दुस्तान में प्रकाशित

Friday, November 28, 2008

कितना उचित होगी महिला वाहन सेवा

दिल्ली को सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर का शहर बना दिये जाने का प्रचार जोर-शोर से हुआ है। अगले दो साल में यहां राष्ट्रमंडल खेल होने जा रहे हैं। लेकिन क्या वाकई में दिल्ली सुरक्षित है। आम लोगों की तो जो स्थिति है वह है हीं, सरकारी एजेंसियों और तंत्र के महिलाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होने के दावे भी यहां केवल डपोरशंखी ही साबित हो रहे हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स की संवाददाता निवेदिता खांडेकर ने दिल्ली में सुरक्षित यात्रा के प्रति महिलाओं की धारणा पर एक रिपोर्ट तैयार की है। सरकार चाहे जो कहे, दिल्ली की महिलाओं को महिला मुख्यमंत्री वाली सरकार के दावों पर भरोसा नहीं है। तभी तो वह शाम ढलते ही अकेले ऑटो या टैक्सी में सफर करने से कतराती हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो लड़कियों और महिलाओं को यहां तक नसीहत दे चुकी हैं कि दिल्ली सुरक्षित नहीं इसलिए वह रात को घर से न निकला करें।

ऐसे हालात में पढी-लिखीं और सामाजिक तौर पर सक्रिय महिलाएं दिल्ली में महिलाओं द्वारा पूर्ण रूप से संचालित एक टैक्सी सेवा की वकालत कर रही हैं। लेकिन क्या यह समाज की हार नहीं होगी ? क्या यह इस डर से मुंह चुराना नहीं होगा या यह स्वीकार करने जैसा नहीं होगा कि महिलाओं की दिल्ली में पुरुष संचालित सेवाओं में सुरक्षित रहने के प्रति आश्वस्त नहीं किया जा सकता है।

कुछ महिला एनजीओ तो सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को ही महिलाओं के मुफीद नहीं मानते हैं। दिल्ली का एक एनजीओ आजाद फाउंडेशन कुछ लड़कियों को टैक्सी-ऑटो ड्राइवर की ट्रेनिंग दे रहा है। फाउंडेशन दिल्ली में ऐसी 50-60 महिला ड्राइवरों को तैयार करने की योजना बना रहा है। लेकिन इतना ही क्या काम चल जाएगा। यह तो और उल्टी बात हुई। एक ओर तो हमारे समाज की उपरोक्त नाकामयाबी को स्वीकार करना और दूसरे ऐसी व्यवस्था केवल उन महिलाओं के लिए वहनीय हो पाएंगी जो उच्च वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग की हैं। एनजीओ द्वारा तैयार ऐसे ड्राइवरों की संख्या भी सीमित मुठ्ठी भर महिलाओं को ही सुरक्षित पहुंचा पाएंगी, जो खुद की सुरक्षा के लिए पहले से ही सक्षम होंगी।
क्या इस तरह की महिला यातायात सेवा दिल्ली की लगभग 75 लाख महिलाओं को मुहैया करायी जा सकती है। अगर नहीं तो इसका क्या औचित्य है। क्या इसके बदले इस दिशा मे काम नहीं होना चाहिए कि हमारी सार्वजनिक यातायात प्रणाली ही या्त्रियों की सुरक्षा के लिए सक्षम हो जाए। अगर नहीं तो दो-चार धनी महिलाओं को सुरक्षित करना महिलाओं की सुरक्षा नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा की ढोल पीटने भर माना जाएगा। सार्वजनिक यातायात को संवेदनशील बनाने के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक वाहनों की तादाद बढाकर निजी वाहनों को दिल्ली की सड़कों से विदा कर दिया जाए। नागरिकों को इस बारे में संवेदनशील बनाना और संस्कारित करना इसके अन्य पहलू होंने चाहिए।

Saturday, November 22, 2008

महाराष्ट् क्यों जा रहे हैं बिहारी

शुक्रवार 21 नवंबर को हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरिशप समिट में रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के भाषण का सत्र चल रहा था। एक श्रोता ने सवाल किया बिहार का विकास क्यों नहीं हुआ। लालू ने हल्के ढंग से कह दिया कि आजादी के बाद केंद्र से सौतेला व्यवहार हुआ और बिहार का विकास नहीं हो पाया। यह गलत सरासर गलत जवाब था। जानने वाले जानते होंगे कि आजादी के बाद बिहार देश के अग्रणी और विकासशील राज्यों में शुमार होता था। देश में औद्योगिककरण की प्रक्रिया जब शुरू हुई तो बिहार में कई उद्योग लगे। अब ये उद्योग झारखंड में हैं। दामोदर घाटी परियोजना का निर्माण हुआ। बरौनी में तेलशोधक कारखाना खुला। सिंदरी में खाद, तो दर्जन भर स्थानों पर छोटे उद्योग और चीनी मिलें लगीं।

लेकिन 80 के दशक से बिहार के दुर्दिन शुरू हो गए। इस दुर्दिन की शुरूआत जगन्नाथ मिश्र ने की जिसको अंतिम अंजाम तक खुद लालू ने अपने 15 वर्षों के काले राज में पहुंचा दिया। जब लालू ने कहा कि लोगों के लिए रोजगार नहीं है तो तत्काल हस्तक्षेप करते हुए सत्र के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने कहा कि आपके राज्य के लोग तो पलायन कर हमारे महाराष्ट्र में आ रहे हैं। आपने रोजगार की कोई व्यवस्था ही नहीं की है। लालू का जवाब फिर गैर जिम्मेदाराना रहा। उन्होंने मसखरापन दिखाकर सवाल की धार को ही कुंद कर दिया। कह दिया कि महाराष्ट्र हमारा राज्य है। दिल्ली हमारा राज्य है। हम सब भारतीय हैं। यह कोई जवाब नहीं है। यह बात को टालना है।

बिहार से लोग काम की तलाश में इसलिए मुंबई या महाराष्ट्र में कहीं जाते हैं कि बिहार में उद्योग धंधों को इन राजनेताओं की नीतियों ने चौपट कर दिया है। अगर बिहार के उद्योग बने रहते तो लोग कहीं नहीं जाते और न ही मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों पर भार बढता। इसके लिए राष्ट्रीय नीतियां भी जिम्मेदार हैं, जो उद्योगों का सेज बनाती हैं और देशभर के उद्योग धंधों को खत्म करती हैं।

Thursday, November 20, 2008

पानी पर हिन्दी में पोर्टल, जरूर देखें

अगर आप किसी सुदूर इलाके में बैठे हों और जल संरक्षण व देश में जल की उपलब्धता के बारे में हिन्दी में कुछ जानना चाहते हों तो आपको अब परेशान होने की जरूरत नहीं है। अब जल प्रबंधन के मुद्दे पर हिन्दी में पोर्टल शुरू हो गया है, जिसमें न केवल जल संबंधी सरकार द्वारा रखे गये आंकड़े और विचार ही होंगे बल्कि जन संगठनों एवं समूहों के विचारों को भी स्थान दिया जाएगा।

मंगलवार 18 तारीख को नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में हिन्दी वाटर पोर्टल का शुभारंभ हुआ। यह पोर्टल राष्ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा 2005 में जल, ऊर्जा और िशक्षण-प्रिशक्षण आदि क्षेत्रों में मुक्त सार्वजनिक ज्ञान वाले पोर्टल के विचार के अनुरूप शुरू किया गया है। जनवरी 2007 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अंग्रेजी में इंडिया वाटर पोर्टल का आरंभ एक समारोह में किया था। इसके बाद इसके देशी संस्करणों की मांग होने लगी और सबसे पहले कन्नड में फरवरी 2008 में इसकी शुरुआत हुई।

हिन्दी में इस पोर्टल को तैयार करने का काम वाटर कम्युनिटी इंडिया ने जन संगठन अघ्र्यम के साथ मिलकर अपने हाथ मे लिया और इसमें सफलता हासिल की। कम्युनिटी पानी के मुद्दे पर काम करनेवाला एक ऐसा संगठन है जो सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल सूझ-बूझ के साथ करने की बात करता है। इसका वेब पता है : www.hindi.indiawaterportal.org

वर्तमान में शुरू किये गये हिन्दी पोर्टल का प्रारूप अंग्रेजी पोर्टल की तर्ज पर ही है। फिर भी यह अपन स्वयं का एक अलग स्वरूप लिये हुए हैं इसमें मौसम विज्ञान, डाटा और संगठन अनुप्रयोगों को हिन्दी उपयोगकर्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध कराने की पूरी व्यवस्था की गयी है।

इस पोर्टल में देश में विभिन्न भागों में पानी को लेकर विशेष गतिविधियों और किये गये उपायों पर जोर दिया गया है। पानी को लेकर अच्छी कहानियों को जानने और अधिक से अधिक लोगों तक इसे पहुंचाने के लिए यह पोर्टल प्रयासरत रहेगा।

इसमें `प्रश्न पूछें´ सेवा भी है जिसमें कोई भी व्यक्ति पानी संबंधी किसी भी समस्या के बारे में प्रश्न पूछ सकता है। जैसे, पानी की कमी, प्रदूषण अथवा वर्षा जल संचयन आदि को लागू करने संबंधी सवाल। विशेषज्ञों के पैनल इन सवालों के जवाब देंगे।

Thursday, November 6, 2008

ओबामा का ऐतिहासिक भाषण

इस बार के चुनावों में कई बातें ऐसी हुई हैं, जो इससे पहले कभी नहीं हुई। इससे कई ऐसी कहानियां जुड़ी हैं, जो आनेवाली पीढ़ियों को सुनाई जाती रहेंगी।

इस समय मेरे दिमाग मे एक महिला की छवि कौंध रही है जो एटलांटा में वोट देने के लिए लाइन में खड़ी थीं। 106 वर्षीय एन. निक्सन कूपर एक सदी का समय देख चुकी हैं। वह तब पैदा हुई थीं, जब बहुत अधिक कारें नहीं थीं, न आकाश में बहुत अधिक विमान हुआ करते थे। उस समय दो वजहों से निक्सन जैसे लोगे वोट नहीं डाल पाते थे- एक, उनका महिला होना और दूसरा, उनकी त्वचा का रंग। इस रात मैं सोचता हूं कि इस महिला ने एक सदी में काफी कुछ देख लिया है। दिल में उम्मीद की किरण से लेकर पीड़ा के नासूर तक, संघर्ष से लेकर प्रगति तक।

उसने वह समय भी देखा जब महिलाओं की आवाज दबाई जाती थी औ यह समय भी जब महिलाएं अपनी आवाज बुलंद कर सकती हैं, वोट दे सकती हैं। इतने सालों मे उसने अमेरिका का सर्वश्रेष्ठ समय भी देखा और बदतर समय भी। वह जानती है कि कैसे अमेरिका बदल सकता है। जी हां, हम अमेरिका को बदल सकते हैं।

(बुधवार की सुबह शिकागों में दिया बराक ओबामा के ऐतिहासिक भाषाण का एक अंश। यह भाषण ओबामा ने मार्टिन लूथर किंग को समर्पित किया है।)

Friday, September 19, 2008

दबगों को दाल-भात-सब्जी, दलितों को माड़-नमक-भात

बिहार के पूर्वी-उत्तरी हिस्से में बहनेवाली कोसी नदी में पिछले एक डेढ महीने से आयी भयंकर बाढ़ से बड़े इलाके में तांडव मचा हुआ है। लेकिन इस विषम परिस्थिति में भी वहां छूआछूत और जातीय व्यवस्था मजबूती से अपने निर्ममतम रूप में जमी हुई है। अखबारों में खबरें आ रही हैं कि दलित जाति के लोगों व बच्चों को न केवल यहां ठीक से खाना नहीं दिया जा रहा है बल्कि दलितों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार भी हो रहा है। उन्हें मारापीटा तक जा रहा है। दलितों के साथ दुव्र्यवहार करनेवाले सरकारी अमले तो हैं ही, वे भी हैं जो खुद इस बाढ का कहर झेल रहे हैं।

दलित वाच नामक संगठन के लोग सुपौल के राहत शिविरों में व्यवस्था देखने गए थे। इसके बाद उन्होंने गुरुवार 18 सितम्बर को पटना में संवाददाता सम्मेलन किया। इसमें इन्होंने यह खुलासा किया है कि राहत शिविरों में जाति के आधार पर भोजन परोसा जा रहा है। दबंग जाति के लोगों को दाल-भात और सब्जी तथा दलितों को माड़-भात व नमक खाने को दिया जा रहा है। सभी प्रकार के राहत कार्यों में दलितों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। दलित परिवारों के साथ दुर्व्यवहार की भी अनेक घटनाएं सामने आईं हैं।

दलित वाच की ओर से पद्मश्री सुधा वर्गीज ने बताया कि सुपौल जिले के प्रतापगंज प्रखंड के बांसचौक शिविर में दलित समुदाय के भोकूराम ने अपने बच्चों के लिए भोजन की मांग की तो बीडीओ के सुरक्षा गार्ड ने उसकी पिटाई कर दी। इसी प्रकार मधेपुरा के शंकरपुर प्रखंड के मौरा भारती गांव के एक शिविर में दलितों को माड़-भात व नमक दिया गया, जबकि दबंग समुदाय के लोगों को दाल-भात व सब्जी दी गई। इसी जिले के बिहारीगंज में स्थित 43 नंबर शिविर में मुसहर जाति की सोनी कुमारी को चापाकल से पानी भरने के दौरान छेड़छाड़ का सामना करना पड़ा। सहरसा जिले के सौरबाजार मध्य विद्यालय में चल रहे शिविर में नंदकिशोर पासवान से दबंगों ने 2200 रुपये लूट लिए।

दलित वाच के 110 कार्यकर्ताओं ने 204 राहत शिविरों में जाकर दो सप्ताह तक सघन निगरानी की है।