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आचार्य नरेन्द्र देव से शुरू होकर डा. राममनोहर लोहिया तक समाजवादी आंदोलन अपने सही दिशा में रहा लेकिन लोहिया के जीवन काल में ही पार्टी में खुली सदस्यता के कारण तमाम अवांछित तत्व संगठन पर हावी हो गए। इसका परिणाम हुआ कि 1967 में लोहिया के निधन के बाद ऐसे ही तत्व संगठन की सत्ता में अनेक प्रकार के अनैतिक और अवैध हथकंडे अपनाकर हावी होते गए। इसमें सबसे सुगम रास्ता उन्हें जाति की राजनीति लगी और चूंकि उनमें किसी नीति-सिद्धांत के प्रति कोई प्रतिबद्धता न के बराबर थी। संगठन के स्तर पर कार्यकर्ताओं को ऐसी नीतियों का पाठ पढाने का काम भी लोहिया के बाद ही समाप्त हो गया। कम्युनिस्टों में यह काम कुछ और दिनों तक चला लेकिन वर्तमान में वहां भी प्रिशक्षण शून्य ही है। जब मैंने इस बारे में अपने भाकपा माले के एक मित्र से चर्चा की तो उन्होंने माले में भी इस तरह की चर्चा न के बराबर होने की बात ही कही।
उपरोक्त विश्लेशण से तथ्य उभर कर आ रहे हैं कि आम तौर पर पूरे देश में और खासकर उत्तर में परिवर्तनवादी जनाधारित राजनीति के लिए पूरा मैदान खाली है। इस दिशा में काम करनेवाला कोई भी बड़ा या छोटा प्रभावी दल नहीं है। हां, इन छोटे और स्थानीय स्तर पर कई छोटे-संगठन और समूह सक्रिय हैं, जिनका आकार और क्षमता और स्रोत बहुत दुर्बल होने के कारण प्रभाव बहुत कम है। इस तरह के छोटे समूहों में आपसी तालमेल का अभाव रहता है। स्वच्छ और पारदर्शी राजनीति करने के कारण इनके पास साधनों और प्रिशक्षित सैद्धांतिक कार्यकर्ताओं का भी अभाव रहता है। लेकिन सिद्धांतहीनता- मूल्यहीनता और नीति विहीनता से उपजे रिक्त स्थान को भरने का क्षमता इन्हीं में हैं। इसके लिए जरूरी है ऐसे लोकतांत्रिक, नैतिक, समाजवादी- वामपंथी धारा में स्वच्छ और पारदशीZ राजनीति करनेवाले समूहों को निजी अहम से ऊपर उठकर एकजुट होने की। एकजुट होने पर इनके कर्मों और जन संघर्षों के बूत जनता के बीच इनकी विश्वसनीयता निश्चित तौर पर बढेगी और स्थापित राजनीति के बरक्श एक वैकल्पिक राजनीति को दिशा मिल सकती है।
निष्कर्ष के तौर पर हम पाते हैं कि निकट भविष्य में स्थापित राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने पर आनेवाले खाली पने को भरने के लिए देश में छोटे स्तर पर सक्रिय तमाम परिवर्तनवादी ताकतों को एकजुट होकर इससे मुकाबले को कमर कसना होगा। इसमें सभी लोकतांत्रिक वामपंथी धाराओं को भी शामिल करने की जरूरत है। इससे जातिवादी, सिद्धांतविहीन राजनीति के दलदल में फंसी जनता को निजात मिलने की उम्मीद बनेगी। तभी देश में एक सक्षम विकल्प को भी तैयार किया जा सकेगा। वर्तमान स्थिति में नीतिगत राजनीति के लिए काफी जगह है और ये परिवर्तनवादी धाराएं मिलकर जनांदोलन चलाती हैं तो देश की राजनीति की दिशा-दशा को अगले कुछ सालों में पलट कर उसे सकारात्मक दिशा में ले जाया जा सकता है।
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