अंग्रेजी दमन से प्रथम साक्षात्कार
एक घटना जिनसे मेरी सोच को काफी प्रभावित किया वह था, अंग्रेजी शासन और दमन से साक्षात्कार। 1932 की बात है, तब मैं शायद चार साल के लगभग का रहा होऊंगा। मैं उन दिनों अपने ननिहाल बीहट में अपनी मां के साथ था। मेरे छोटे मामा चन्द्र प्रकाश नारायण जो मुझसे लगभग डेढ़ महीने बड़े थे, वहीं थे और हम दोनों प्राय: साथ होते थे। उसी समय मेरे नाना श्री रामचरित्र सिंह को गिरफ्तार करने पुलिस वाले आये। मैं और मेरे मामा चन्द्रप्रकाश एक घर की दीवार की ओट से झांक रहे थे, जब पुलिस वाले एक टमटम या तांगा के साथ मेरे नाना के बंगले पर आये और उन्हें गिरफ्तार कर टमटम पर ले गये। हमलोगों को अंग्रेजी सरकार के दमन और ताकत का थोड़ा एहसास हुआ लेकिन हम ज्यादा कुछ नहीं समझते थे। लेकिन उन दिनों गांव में प्राय: लोग लाइन बना प्रभात फेरी करते थे और गाते थे। (गाना की ये पंक्तियां आज भी मुङो याद है) ‘‘ आओ वीरों मर्द बनो अब जेल तुम्हें जाना होगा।’’ इसके साथ कुर्की-जब्ती, गिरफ्तारी आदि का जो दौर रहा होगा वह सब हमारी समझ में नहीं आता था। लेकिन, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक भावना और दमन का खौफ जरूर मालूम होता था।
गांधी जी : एक पारिवारिक विरासत
महात्मा गांधी मुङो पारिवारिक विरासत के रूप में मिले, वैसे ही जैसे अपने दादाजी। मेरे पिताजी गांधी जी के भक्त थे और 1920 में उनके आह्वान पर सरकारी स्कूल छोड़ सदाकत आश्रम में पढ़ाई करने चले गये थे। बाद में भी जब उन्होंने स्कूल में शिक्षक का काम शुरू किया तो गांधी के प्रति निष्ठा गयी नहीं और उनके कई छात्र उनके प्रभाव से आजादी के आंदोलन मे कूदे। बचपन में मैं प्राय: मुजफ्फरपुर में पिताजी के साथ रहता था, जिनसे मिलने और विचार लेने अनेक छात्र आते थे। राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध में मेरी प्रारंभिक धारणाएं पिताजी के विचारों से प्रभावित थीं। बाद में जब उन्होंने गांव में चरखा का प्रचार करना शुरू किया तो एक चरखा मास्टर मेरे घर रहते थे और मैंने भी लगभग दस-ग्यारह साल की उम्र में चरखा चलाना शुरू किया और खादी पहनना भी। मैंने अपनी काती हुई सूत की एक गड्डी महात्मा गांधी को भी भेंट की थी, जब वे रामगढ़ कांग्रेस के पहले कांग्रेस वर्किंग कमिटी की मीटिंग में भाग लेने पटना आये थे। उनसे साक्षात्कार तो नहीं हो पाया लेकिन जब वे गाड़ी में जा रहे थे तो सूत की एक लड़ी उनके गले में लटक रही थी। मैंने अंदाज किया कि वह मेरा दिया हुआ सूत ही था। मेरे पिताजी नियमित रूप से ‘हरिजन’ मंगाते थे और उसकी प्रतियों को जिन्द बंधवा कर रखते थे। लेकिन मैं उन्हें पढ़ता नहीं था। शायद मेरी समझ मे कुछ आता भी नहीं। लेकिन एक तरह का भक्तिभाव गांधीजी के प्रति जरूर था।
बचपन की कल्पनाशीलता
जीवन में प्रारंभ की कुछ घटनाएं और उससे जुड़ी प्रतिक्रियाएं शायद आदमी की मूल प्रवृत्तियों और बाद के जीवन के रुझानों को समझने में सहायक हो सकती है। इसलिए बचपन के एक अनुभव का, जो सात दशक से अधिक बीत जाने पर भी मुङो साफ-साफ याद हैं, जिक्र करना चाहता हूं।
इतने दिनों बाद ठीक-ठीक तो नहीं कह सकता, मैं सात या आठ वर्ष का रहा होऊंगा। हीरा, मोती और दूसरे जवाहिरात का विवरण तो बातचीत और किस्से-कहानियों में सुनता था लेकिन उन्हें कभी प्रत्यक्ष चमकते हुए नहीं देखा था। सिर्फ उनके संबंध में कुछ कल्पना कर सकता था। मेरे घर से लगभग आधा से एक किलोमीर की दूरी पर हमलोगों का एक आम का बगान हुआ करता था, जिसे हमलोग बड़का गाछी कहते थे। अंदाज है कि आश्विन -कार्तिक के महीने में मैं हर रोज वहां सूर्योदय के बाद बिना किसी काम के घूमने जाया करता था। सड़क की दोनों ओर घास और जंगली फूलों और उनके पत्तों पर ओस की बूंदें प्रात:कालीन सूरज की रोशनी मे चमकते रहते थे और रंग-बिरंगी आभा बिखेरते रहते थे- नीले, पीले, नारंगी, लाल- सभी रंग की। अपनी कल्पना में मैं उन चमकती बूंदों में विविध रत्नों को देखने की कल्पना किया करता था। लेकिन विशेष बात यह थी कि हर रोज मैं सोचता कि किसी दिन रंगीन आभा बिखेरती ये बूंदे वास्तव में रत्न बन जाएंगी, जिनका मैं स्पर्श कर पाऊंगा और जिन्हें हाथों में उठा पाऊंगा। अब सोचता हूं कि समाजवाद या कोई काल्पनिक आदर्श समाज बन पाएगा, इसकी आश्वस्ति का मेरे भीतर का आधार कहीं न कहीं उन प्रारंभिक अनुभवों और रूझानों में था। यह सब रुमानियत लगेगी। शायद है भी। लेकिन कुछ ऐसे ही प्रारंभिक अनुभव लोगों की गहरी आस्थाओं के पीछे होते हैं। मेरे कई परिचित लोग सामने दिखनेवाली हकीकत की पृष्ठभूमि में समाजवाद संबंधी मेरे विश्वास को महज रूमानियत समझते हैं। शायद उनका सोचना सही है। लेकिन अगर ऐसी कल्पनाओं और आशाओं को मिटा दिया जाये तो क्या मानव जीवन मानवीय रह पाएगा ?
पुराण, दर्शन, विज्ञान
जो भी कारण रहा हो, गांव के स्कूल में दाखिले के कुछ महीनों के बाद से ही मेरी स्कूली पढ़ाई बंद हो गयी और मैं या तो गांव में घर ही पर रहता या पिताजी के साथ मुजफ्फरपुर जहां वे बी़बी कॉलेजियट स्कूल में शिक्षक थे। स्कूली शिक्षा की जगह मैं घर में उपलब्ध धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने लगा। इन ग्रंथों में रामचरितमानस, जिसका गद्य अनुवाद ही समझ सकता था, कई जिल्दों में उपलब्ध महाभारत, सुखसागर, भागवत पुराण आदि पढ़ने में विशेष रुचि थी। ध्रुव, प्रहलाद आदि की कहानियां भी पढ़ी और इनकी बातों पर अंध आस्था थी। हमारे यहां कम पढ़े पर विद्या व्यसनी कुछ पंडित आया करते और उनमें शास्त्रर्थ होता। उन्हें सुनना अच्छा लगता और उन्हें समझने की कोशिश करता, इससे कई लोकों के अस्तित्व की बात मन में आयी।
मेरे पिताजी एमएससी में गणित के छात्र रहे थे और उन्हें भारतीय ज्योतिष शास्त्र का भी कुछ ज्ञान था, जिनके बीच वे कुछ संगति बैठा सकते थे। प्राय: गर्मियों में जब हम आंगन में बैठे होते तो वे सप्तर्षि और ध्रुवतारा और उसकी ओर इशारा करनेवाले दो तारों तथा मृगशिरा आदि तारा समूहों को बतलाते और फिर नक्षत्रों और आकाशगंगा आदि के संबंध में कुछ बातें बतलाते। ध्रुव और ध्रुवतारे के संबंध को मैं कभी समझ नहीं पाया लेकिन आकाश और नक्षत्रों के संबंध में जानने की जो जिज्ञासा जगी वह बनी रही और में न्यूटन, आईन्सटीन आदि के विचारों की तरफ ले गयी। इसी जिज्ञासा के कारण मुझे कान्ट का समग्रता का दर्शन सदा आकर्षित करता रहा, जिसमें “The starry heaven above and the moral sense within” दोनों को समझने और जोड़ने का आग्रह था। संसार की सभी वस्तुओं के बीच संबंध तलाशने का रुझान इसी समय पैदा हुआ।
धार्मिक आस्थाओं को धक्का लगा मेरे नानाजी के विचारों से। उन्होंने रसायन शास्त्र से एमएससी की थी और अनीश्वरवादी थे। उन्होंने भौतिक दृष्टि से संसार के विकास पर एक पुस्तक भी लिखी थी। दस-ग्यारह साल की उम्र में उसे प़न का मौका मिला और इससे पुरानी आस्थाएं अंध आस्थाएं लगने लगीं। समय के साथ इस दूसरे विचार को ही चारो तरफ से समर्थन मिलता रहा। बाद में मार्क्स के प्रति आकर्षण का यही आधार था।
अनियमित शिक्षा
मेरी नियमित रूप से पढ़ाई- लिखाई नहीं हुई थी। मैंने पहली दफे परीक्षा देकर सातवें वर्ग में उसी स्कूल में दाखिला लिया जिसमें पिताजी थे। हालांकि, इसके साल भर के भीतर ही पिताजी ने पूरा समय स्वतंत्रता आंदेालन में देने के लिए नौकरी छोड़ दी। स्कूल में जाने के बाद से मेरी दिलचस्पी भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारी नेताओं में जगी और उनकी वीरता और आत्मबलिदान से अत्यधिक प्रभावित हुआ। इसी क्रम में मन्मथनाथ गुप्त की ‘‘भारत में सशस्त्र क्रांति चेष्टा का रोमांचकारी इतिहास’’ पढ़ा और कुछ अन्य प्रकाशनों को भी देखने का मौका मिला जो प्राय: गुप्त रूप से छात्रों तक पहुंच ही जाते थे। इसके बाद हिंसक क्रांति के प्रति आकर्षण बढ़ा। ज्यादातर छात्रों का रुझान इसी तरफ था। मुङो गांधी जी और इन क्रांतिकारियों के बीच कोई विरोधाभास नजर नहीं आता था। मुङो जहां तक याद है, एक पुस्तक ‘‘ दो पहलू’’ उन्हीं स्कूली दिनों में पढ़ने का मौका मिला था जिसमें क्रांति के लिए समर्पित दोनों विचारों के लोगों की जीवन गाथा थी। लेखक का नाम याद नहीं। लेकिन मेरी राजनीतिक समझदारी ऐसी नहीं थी कि मैं इन दो दृष्टियों का विश्लेषण कर पाता। गांधीजी के प्रति भक्ति और क्रांतिकारियों के प्रति रुझान- दोनों साथ-साथ थे। लेकिन उम्र और रुचि के कारण सशस्त्र क्रांति की तरफ रुझान ज्यादा गहरा था। उस समय हथियार पाना उतना आसान नहीं था जितना आज, लेकिन यह इच्छा जरूर थी कि हमलोग स्वयं बम आदि बना क्रांतिकारियों की मदद करते। खादी के प्रति कट्टरता जरूर थी और एक एक समय जब खादी के कपड़े मिलना मुश्किल हो गया तो एक या दो फटे धोती-कमीज लगाकर रहता था पर मिल के वस्त्रों को धारण नहीं करता था। इससे सगे-संबंधियों के समारोहों में शामिल होना मुश्किल हो जाता था। इससे समारोहों में शामिल होने में उसी समय से एक झिझक हो गयी थी।
इसी काल में ज़ेपीक़ की जेल से भागने के बाद की चिट्ठियां पढ़ने का मौका मिला और उनके भूमिगत संगठनों के तानाबाना से जुड़ने का। हमलोगों के पास नियमित रूप से पर्चे- पोस्टर आदि आते और हमलोग रात में चुपचाप उन्हें मुजफ्फरपुर शहर के विभिन्न मुहल्लों में दीवारां पर चिपका देते या घरों के दरवाजों पर डाल देते।
विश्वविद्यालय में दाखिला, शिक्षा छोड़ पूर्णकालिक kaaryakarta
मैट्रिक पास कर 1945 में मैं साइंस कॉलेज पटना में पढ़ने गया। वहां छात्र आंदोलन (स्टूडेंट्स कांग्रेस) से पूरी तरह जुड़ गया। 1946 में कुछ समाजवादी कार्यकत्र्ता जेल से छुटने लगे और सोशलिस्ट sangathan को बढ़ाने के प्रयास में लग गये। वे उस सयम ‘‘सोशलिस्ट कांग्रेसमैन एसोसिएशन’’ के नाम से काम करते थे। उसमें पूरी लगन से जुट गया। इसी समय सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ ज़ेपीक़ की अपील पर लगभग एक महीने छात्रों की टीम के साथ पटना और जहानाबाद के इलाके में काम करता रहा।
पार्टी में सक्रियता से पढ़ाई-लिखाई का काम दोयम महतव का बन गया। 1947 में आई़एस़सी़ तो किसी तरह दूसरे दर्जे में पास कर गया लेकिन बी़एस़सीक़ की पढ़ाई बहुत ही बाधिक होने लगी। साइंस कॉलेज में पढ़ाई-लिखाई और प्रैक्टिकल के काम में काफी सख्ती बरती जाती थी। अब स्पष्ट हो गया कि मैं पास नहीं कर सकता। अब मेरी पढ़ाई भी कोर्स के बाहर की पुस्तकों पर केंद्रित होती गयी। इम्तहान पास करने का महत्व भी कम दिखने लगा, क्योंकि इरादा नौकरी से ज्यादा क्रांति करने का बन गया था। इस तरह मैंने तय किया कि अब पढ़ाई छोड़ पूर्णकालिक पार्टी कार्यकर्ता बन जाऊंगा। उस समय बिहार में पाटी्र के लेबर सचिव बसावन बाबू थे। मैंने उनसे इस संबंध में बात की और उन्होंने गाड़ी किराया और एक प़ के साथ अरगडा, हजारीबाग जिला भेज दिया, जहां पार्टी के अत्यंत ही सक्षम और प्रतिबद्घ नेता हरदेव जी (जिन्हें लोग गुरुजी कहते थे) संगठन चलाते थे। यूनियन के अध्यक्ष रामनन्दन मिश्र जी थे और सेक्रेटरी चुनचुन जो मजदूरों में इतना लोकप्रिय थे कि मजदूर (अधिकांश आदिवासी) सभी यूनियन कार्यकर्ताओं को चुनचुन ही कहते थे (छोटा चुनचुन, बड़ा चुनचुन)। इस तरह मैं 1948 के प्रारंभ से लगभग नौ महीने तक वहीं साउथ कर्णपुरा कोला वर्कर्स यूनियन में काम करता रहा। इसी काल में पार्टी के आदेश पर कुछ समय के लिए मूरी में अल्युमिनियम कारखाने को सफल बनाने के लिए (ज़ेपी़ उस समय रेलवेमेंस यूनियन के अध्यक्ष थे) कुछ समय के लिए बरकाकाना रेलवे जंक्शन पर रेल मजदूरों को संगठित करने के लिए गया। इस बीच, हिन्द मजदूर पंचायत के स्थापना सम्मेलन में कोयला मजदूरों के एक प्रतिनिधि के रूप में कलकत्ता गया।
बाद में पार्टी ने मुङो पटना बुला लिया। लेकिन वहां कुछ काल तक रहने के बाद ही मैं मुंबई चला गया। मैं यहां था जब 1949 में पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन पटना में हुआ था।
मुंबई सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ाव
मैं 1949 के मध्य में मुंबई गया था। मुख्य आकर्षण तो वहां के मजदूर आंदोलन की ख्याति थी और उससे जुड़ने का मन था। लेकिन यह भी वहम था कि पत्रकारिता के माध्यम से समाजवादी विचार को तेजी से फैलाया जा सकता है। उन दिनों मुंबई से निकलनेवाली पत्रिका (Blitz) में अशोक मेहता नियमित रूप से लिखते थे और हमलोग उनसे काफी प्रभावित होते। इसलिए बाजाप्ता तो मैं वहां पत्रकारिता सीखने गया था, जिसकी सुविधा अन्यत्र नहीं थी और मुंबई में Honnyman College of Journalism के नाम से एक संस्था थी, जिसके निदेशक P.G. Rao थे। वहां साल भर पढ़ने और डिप्लोमा लेने के बाद यह भ्रम तो खतम हो गया कि पत्रकारिता विचारों के विकास का माध्यम हो सकती है लेकिन सीधा-सीधा कुछ कहने का रुझान बढ़ा। स्वयं P.G. Rao जो हमसे काफी सहानुभूति रखते थ, पत्रकारिता की सीमा समझाते थे। मुंबई में मैं प्रारंभ में माहिम में स्टेशन के बगल में ही रहता था और पार्टी की दादर इकाई से जुड़ गया।
मुंबई की पार्टी के एक गुट ने (पूरी पार्टी आधिकारिक रूप से नहीं) यह फैसला किया कि जब नवम्बर 1949 को गोलवलकर मुंबई आवें तो उनके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हो। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जेल से छूटकर वह पहली बार मुंबई आ रहे थे और आऱएस़एस़ ने शिवाजी पार्क में एक भव्य स्वागत सभा का आयोजन किया था। शिवाजी पार्क दादर इकाई के तहत ही आता था और इस इकाई ने भी विरोध प्रदर्शन के पहल का स्वागत किया था। मैंने भी इसमें हिस्सा लेने का फैसला किया। योजना काले झंडे के प्रदर्शन का था। लगभग ढ़ाई-तीन सौ पार्टी कार्यकर्ता काला झंड ले प्रदर्शन के लिए आयें इन्हें दो हिस्सों में बंटकर शिवाजी पार्क की तरफ जानेवाली दो सड़कों से वहां पहुंचना था। उधर आऱएस़एसक़ के हजारों स्वयंसेवक इसकी भनक मिल जाने के कारण चौकसी बरत रहे थे। उन्होंने एक सड़क से जानेवाले जत्थे को तो बीच में ही रोक कर उनके झंडे छीन लिये और उन्हें तितर-बितर कर दिया। एक जत्था, जिसमें मैं शामिल था, शिवाजी पार्क की चहारदीवारी तक पहुंच गया और चहारदीवारी के ऊपर से (जो अधिक ऊंची नहीं थी) छलांग लगाकर मैदान में पहुंच गया। लेकिन काला झंडा दिखाते-दिखाते हमलोग आऱएस़एसक़ के स्वयंसेवकों द्वारा, जिनकी संख्या हजारों में थी, घेर लिये गये और सबों पर लात और लाठियों से हमला शुरू हुआ। एक दो लोगों को छोड़ बाकी लोगों को इल्की ही चोट आयी। पुलिसवालों से तत्परता दिखा हमलोगों को घेरे में ले लिया और गिरफ्तार कर पुलिस चौकी ले गये। प्रदर्शन तो बड़ा नहीं था लेकिन इसे काफी पब्लिसिटी मिली और मुंबईवासियों का समर्थन भी।
लेकिन मेरे लिए यह घटना अत्यंत ही महत्वपूर्ण साबित हुई। इससे मैं तुरंत मुंबई में तब उभर रहे उस कार्यकर्ता समूह से जुड़ गया जो पार्टी को अधिक क्रांतिकारी नीतियों की ओर जाना चाहता था। इसमें अन्य लोगों के अलावा वोल्शेविक लेनिनिस्ट पार्टी के भी कुछ लोग थे। इसी में प्रभाकर मोरे, लक्ष्मण जाधव, एस़आऱ राव आदि थे। इन लोगों ने बाद में मुंबई में मजदूर आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं बाद में इसी संपर्क से मैं इन्द्रसेन, तुलसी बोड़ा, टी़आऱ राव आदि के संपर्क में आया। टी़आऱ राव को नवीनतम पुस्तकों के संकलन का जुनून था और उनके संकलन का समाजवादी आंदोलन संबंधी मेरी जानकारी बढ़ाने में काफी हाथ था। इन्द्रसेन एक अत्यंत ही सुधरे हुए अर्थशास्त्री थे जो श्रंदंजं के संपादन से जुड़े थे और जिनके लेखों के हमारे समय के समाजवादी मुरीद थे। वे भी बोल्शेविक लेनिनिस्ट पार्टी से आये थे और इतने सज्जन थे कि कभी किसी प्लेटफार्म से अपने को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं करते थे। प्रभाकर मोरे और लक्ष्मण जाधव दोनों ही मजदूर वर्ग से आते थे लेकिन औपचारिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद दुनिया भर की राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी रखते थे और अगर कोई महत्वपूर्ण पुस्तक अंग्रेजी में छपती तो अंग्रेजी जानने वालों से घंटों बैठ उसका अनुवाद कराकर उसकी जानकारी ग्रहण करते थे। एच़आऱएस़ राव एक बहुत ही दक्ष स्टेनोग्राफर थे और अशोक मेहता के भाषणों को टाईप कर उनकी पुस्तक Democratic Socialism का प्रकाशन संभव बनाया था। उनके साथ तनसुख शुक्ल भी थे जिनमें समाजवादी निष्ठा और सरलता का अद्भूद मेल था। इसी संपर्क से मैं गुलाब राव गणाचार्य और बापूराव जगताप जैसे प्रभावी मजदूर नेताओं को जान पाया, जो पहले कम्युनिस्ट पार्टी में थे और 1942 में उनकी आंदोलन विरोधी नीति के कारण सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे। मुंबई पार्टी के संयुक्त मंत्री नारगोलकर जिन्हें इस प्रदर्शन का समर्थन करने के कारण अपने सपद से हटना पड़ा था, को भी जानने का मौका मिला। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि एस़ वेंकटराम को जानना हुई जिनकी बौद्घिक प्रतिभा विलक्षण थी। उनकी एक बात मुङो सदा याद रहती है। वे कहते थे कि ‘‘किसी आदमी के लिए एक अच्छा समाजवादी बनने के लिए एक अच्छा आदमी बनना भी जरूरी है।’’
इस घटना की चर्चा करना जरूरी लगता है क्योंकि इस क्रम में जो लोग संपर्क में आये और इसके बाद पार्टी में जो वैचारिक विवाद हुए उसने बौद्घिक रूप से मुङो जागृत करने में विशेष भूमिका निभाईं
इसी संपर्क से मैं कपड़ा मजदूरों के समाजवादी नेतृत्व में चलनेवाले मिल मजदूर सभा से जुड़ा और उसका पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गया। इसी काल में सवा दो लाख मजदूरों के 62 दिनों की हड़ताल चला। इसके संचालित करने के क्रम में मुङो Preventive Detention Act में गिरफ्तार कर बाईखला जेल में डाल दिया गया, जहां लगभग दो महीना रहने ke बाद, हड़ताल खतम होने पर मुङो छोड़ दिया गया। मिtron की मदद से जेल में किताबें मिलती रहीं और इसी समय मैंने Trang Mehring द्वारा लिखी मार्क्स की जीवनी पढ़ी और Whitehead की ।Adventures of Ideas। इस दूसरी पुस्तक का नाम मेरे ध्यान में था जब मैंने वर्षों बाद मानवाधिकार पर अपनी पुस्तक का नाम ।Adventures of Liberty रखा।
यह काल सोशलिस्ट पार्टी में गहरे वैचारिक विवाद का था और मुङो पार्टी का पूर्णकालिक काम छोड़ना पड़ा। एस़आऱ राव के प्रयास से जो में यूनियन के अधिकारी थे, मुङो खलासी का काम मिल गया और मैं वडाला वर्कशॉप में काम करने लगा। वहां मैंने डेढ़ साल तक मजदूरी की। काम डब्बों की मरम्मत का था, मुख्य रूप से तेल के टैंकरों की देखभाल और मरम्मत का।
1952 के चुनाव में वर्ली-नायगांव क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी और शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की ओर से अशोक मेहता और डॉ़ अंबेडकर लोकसभा के उम्मीदवार हुए। उन दिनों कुछ क्षेत्रों में एक आम और एक आरक्षित उम्मीदवार साथ-साथ खड़ा होते थे और मतदाताओं को दो वोट डालना होता था। उस समय सोशलिस्ट पार्टी और डॉ़ अंबेडकर की पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के बीच चुनावी समझौता हुआ था और दोनों पार्टियां सम्मिलित रूप से लड़ती थी। मेरा कार्यक्षेत्र वर्ली-लोअर पटेल था, जो इस संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था। यहां काफी बड़ी संख्या में महार मतदाता थे। मुङो उनके बीच काम करने का अच्छा मौका मिला और इससे उनके प्रति आदर भी बढ़ा। हमारे दोनों उम्मीदवार हार गये। बाद में किसान मजदूर प्रजा पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी का विलय हुआ जिसका हमने विरोध किया था। (विरोध तो काफी लोगों ने किया था- एक कारण यह भी था कि यह असंवैधानिक था क्योंकि बिना सम्मेलन बुलाये जनरल काउन्सिल के फैसले से विलय हुआ था)। लेकिन, विलय के बाद चूंकि सभी बड़े नेता इसके पक्ष में थे, ज्यादातर लोगों से इसे कबूल किया। लेकिन इस निर्णय में बोल्शेविक पार्टी से आये कुछ लोगों को छोड़ बहुत थोड़े से लोगों ने हमलोगों का साथ दिया। कुछ लोग आऱएस़पी़ में चले गये। कई मजदूर नेता जो कम्युनिस्ट पार्टी से आये थे फिर कम्युनिस्ट पार्टी में चले गये।
जो थोड़े से लोग बच गये थे उनलोगों ने पत्र पत्रिकाओं के द्वारा पार्टी को पुनर्गठित करने का अभियान जारी रखा। लेकिन ये मुट्ठी भर लोग थे। मद्रास से हेक्टर अभय बर्धन, जो बोल्शेविक पार्टी से आए थे, एक पाक्षिक पत्रिका ‘‘सोसलिस्ट अपील’’ निकालने लगे जिसके संपादन मंडल में मेरा भी नाम था। मुङो पटना से एक हिन्दी पाक्षिक ‘‘समतावादी’’ निकालने को कहा गया। इस तरह मैं रेवले की नौकरी छोड़ पटना आ गया। पर यह पत्रिका कुछ महीने तक ही चल पायी और मैं फिर मुंबई चला गया। वहां कुछ दिन डॉक में काम किया और बाद मैं बी़पी़टी़ जनरल वर्कर्स यूनियन (बम्बई पोर्ट ट्रस्ट जनरल वर्कर्स यूनियन) में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगा। इसके अध्यक्ष जी़एचक़ काले थे जो कभी डांगे आदि के साथ भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को शुरू करने वालों में थे और बाद में एम़एऩ राय से जुड़ गये थे। इस यूनियन मे काम करते हुए वह भ्रम दूर हो गया कि ट्रेड यूनियनों को आधार बनाकर क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन चलाया जा सकता है जो अंतत: समाजवादी क्रांति का जनक होगा। विशेषकर संगठित क्षेत्रों के औद्योगिक मजदूरों की स्थिति और व्यवस्था से जुड़ी सुविधाएं भी ऐसी होती हैं कि सशस्त्र व्यापक क्रांति में वे भागीदार नहीं हो सकते। इस तरह मजदूर क्रांति की कल्पना जो हम मार्क्सवादी सिद्घांतों के कारण पाले हुए थे, खतम हो गयी। इसके थोड़े ही दिनों बाद 1955 में मैं पटना आ गया। हमारे बहुत से साथियों ने बोल्शेविक-लेनिनिस्ट पार्टी से आये लोगों ने भी, प्रजा सोसलिस्ट पार्टी को यह मानकर फिर कबूल कर लिया कि कोई विकल्प नहीं है। मैंने कभी इस पार्टी को विश्वसनीय नहीं पाया और न इसका सदस्य बना। इसी बीच आपसी विरोध के कारण डॉ़ लोहिया ने प्रजा सोसलिस्ट पार्टी से बाहर सोसलिस्ट पार्टी का गठन करना शुरू कर किया। हमारे जैसे अनेक लोग जो अलग-थलग पड़ गये थे, इससे जुड़ गये। इसके बाद के घटनाक्रम में सोसलिस्ट पार्टी और प्रजा सोसलिस्ट पार्टी के विलय से संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी का गठन हुआ और गैर कांग्रेसवाद के नारे के तहत एक वैकल्पिक सरकार बनाने का सपना साकार होता दिखाई दिया। लेकिन समाजवाद का लक्ष्य अभी ओझल ही था। यह एक नयी तलाश की शुरुआत थी। इसके बैनर तले 1965-1967 में बड़े आंदोलन हुए और पहली दफे कुछ राज्यों में गैर कांग्रेस और गैर कम्युनिस्ट पार्टियां सत्ता में आईं। हालांकि अब इस गठजोड़ से कम्युनिस्ट भी वर्जित नहीं थे। इसी प्रक्रिया में 1965 में बिहार में एक बड़ा जन आंदोलन हुआ जिसमें नेतृत्व मूलत: संसोपा के हाथ में था पर कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल थीं। मुजफ्फरपुर में नजरबंदी की स्थितियों के खिलाफ मैंने एक आवेदन दिया था, जिसमें व्यक्त विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
समाजवादी सत्ता के समीप तो आये लेकिन सत्ता पाने की जद्दोजहद में समाजवाद का लक्ष्य कहीं लुप्त होता गया। 1967 में ही गैर कांग्रेसवाद को सफलता मिली और इसी साल डॉक्टर लोहिया की मृत्यु हो गयी। अब सत्ता के लक्ष्य और सत्ता में रहने की कुछ शर्तें जो डॉ़ लोहिया गैर-कांग्रेसवाद के साथ जोड़ते थे किसी की chinta के विषय नहीं रहे। पार्टी के भीतर ही राज नारायण और मधु लिमये, जो लोहिया की विरासत को लेकर चल सकते थे, आपसी द्वंद्व में उलझ गये। ऐसा लग रहा था कि समाज की समझ धूमिल हो गयी थी और यह सब वैयक्तिक स्खलन उसी का परिणाम था। कम से कम मुङो ऐसा ही लग रहा था। मुङो ऐसा लग रहा था कि हमें फिर अपने वैचारिक जड़ों को तलाशने की जरूरत है। 1968 से आज तक मै। मूलत: इस उद्देश्य को लेकर चलने का प्रयास करता रहा हूं। लेकिन यह तलाश बिल्कुल वैयक्तिक नहीं हो सकती और इसमें नये और नयी पीढ़ी के सहयोगियों की तलाश जरूरी है। पिछले दिनों मेरी ऐसा ही कोशिश रही है। लिखने का मुख्य उद्देश्य रहा है- अपने अनुभवों को उन सबों को बांटना, जो हमराही हो सकते हैं।
जेल के अधिकारियों के माध्यम से भेजे गये इस आवेदन और इसकी पृष्ठभूमि के संबंध में कुछ जानकारियां देना जरूरी लगता है। 1965 का मध्य काल बिहार में घोर उथल-पुथल का काल था। यह समय बिहार में घोर दमन और शोषण का काल था। इसी समय पाकिस्तान के साथ एक अल्पकालिक युद्घ छिड़ा था। इधर, कांग्रेसी शासन के खिलाफ लोगों में गहरा रोष था। ‘‘पैडी लेवी’’ जैसे किसान विरोधी नीतियों से, जिसके तहत किसानों पर मनमाना धान वसूली का लक्ष्य तय किया जाता और उसकी हैसियत का ख्याल किये वगैर वसूला जाता, देने से इनकार करने पर गिरफ्तारी तथा अन्य तरह की ज्यादतियां की जातीं- किसानों में भीषण असंतोष था। महंगाई और व्यवस्था के खिलाफ अन्य नागरिकों एवं विद्यार्थियों में भी घोर असंतोष था। नतीजा था बिहार में प्रदर्शनों और बंदों का एक सिलसिला। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और बीच में गोलीबारी आम बात हो गयी थी। इसी पृष्ठभूमि में सरकार के खिलाफ संघर्ष चलाने के लिए, संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी की पहल पर एक संयुक्त संघर्ष समिति बनी थी, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी और हाल मे पार्टी से अलग होनेवाले लोगों की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भी शामिल थी। उस समय, बाद में स्वतंत्र अस्तित्व में आनेवाले जिले वैशाली और सीतामढ़ी जिले भी मुजफ्फरपुर जिला के ही हिस्से थे। मुङो इस संघर्ष समिति का संयोजक बनाया गया।
कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन उस समय मुजफ्फरपुर के नगर क्षेत्र और सीतामढ़ी के कुछ हिस्से में काफी चुस्त था। संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी का तो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के काल से ही जिले में विशेषकर सीतामढ़ी और वैशाली वाले इलाके में व्यापक संगठन था। वैशाली क्षेत्र से ही योगेन्द्र शुक्ल सशस्त्र क्रांति व भगत सिंह के समय के क्रांतिकारी आंदोलन के नेता सीताराम सिंह एवं अमीर गुरु (दोनों ही आजाद दस्ता के नेता जिन्होंने ज़ेपी़ लोहिया आदि को नेपाल की जेल से मुक्त कराया था) आते थे। प्रसिद्घ समाजवादी नेता अक्षयवट राय भी इसी जिले से थे। सीतामढ़ी नेपाल की सीमा पर होने के कारण न सिर्फ आजाद दस्ता के कार्यकर्ताओं का क्षेत्र था बल्कि व्यापक किसान आंदोलन का क्षेत्र था और यहीं पर बाबा राम बहादुर लाल के नेतृत्व में भूमि सेना ने सड़क और बांध का निर्माण बड़े पैमाने पर किया था। इन आंदोलनों से जुड़े अनेक कार्यकर्ता जो बीच में निष्क्रिय हो ये इस आंदोलन के क्रम में फिर सक्रिय हो गये। मुजफ्फरपुर का क्षेत्र भी 1942 के आंदोलन के काल से ही राष्ट्रीय आंदोलन और इसके सामजवादी धड़े के प्रभाव का क्षेत्र था। 1965 में ये सारे लोग सक्रिय हो गये और इन्हें समर्थन मिला विश्वविद्यालय और स्कूलों के छात्रों और शिक्षकों से। इससे आंदोलन को व्यापक जन समर्थन मिला। इसी अनुपात में दमन शुरू हुआ। आंदोलन समर्थकों के लिए एक पर्चा निकालना तक कठिन हो गया। प्रेसवाले इतने आतंकित थे कि प्रेस का नाम दे कोई पर्चा निकालने तक से इनकार कर देते। पर्चा बांटनेवाले को गिरफ्तार कर लिया जाता। लेकिन इस दमन के बावजूद और शायद इस दमन के कारण ही लोगों का समर्थन बढ़ता गया। सैकड़ों वैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को जो कभी भी सोसलिस्ट या कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्घ रहे हो उन्हें उनके घरों से पकड़कर जेलों में बन्द कर दिया गया।
मुङो चूंकि इसमें सक्रिय कार्यकर्ताओं से संपर्क बनाये रखना था इसलिए मैंने गिरफ्तार होने से बचने की कोशिश की। पुलिसवालों को, जो मुजफ्फरपुर जिले के आंदोलनों की पृष्ठभूमि से अनभिज्ञ थे, यह भ्रम था कि गिरफ्तारी से बचकर मैं इस आंदेालन में विशेष भूमिका निभा रहा हूं। उन्होंने मुङो गिरफ्तार करने के लिए जगह-जगह छापेमारी की और पहचान के लिए गांव के चौकीदार को जीप पर जहां-तहां घुमाया। लेकिन चूंकि मैं कोई ऐसा जाना-माना नेता नहीं था, जिसे बहुत लोग जानते हों, मेरी पहचान मुश्किल थी। अंत में karpoori ठाकुर की सलाह पर, जो पटना गांधी मैदान की पुलिस द्वारा सामूहिक पिटाई के कारण पुलिस हिरासत में ही पटना अस्पताल में थे और मैं वहीं उनसे मिला था, गिरफ्तार हो गया। काफी दिनों तक गिरफ्तार नहीं कर पाने की चिढ़ और आंदेालन में मेरी भूमिका को बढ़ा-चढ़ा कर देखने के कारण, गिरफ्तार करने के बाद पुलिस प्रशासन मुङो अधिक से अधिक यातनापूर्ण स्थिति में रखना चाहता था और उसका उपाय नजरबन्दी के साथ ैलउइसव श्ब्श् लगाना था, जिससे नजरबन्दी में जो कुछ खाने-पीने, रहने और मुलाकात की सुविधाएं मिलती हैं, उन्हें खतम किया जा सके। वैसे जेल के अधिकारियों को मैं कुछ खास खौफनाक नहीं लगता था और नियमों के बावजूद मुङो बाकी नजरबन्द कैदियों के साथ ही रखा जा रहा था और हम सब अपनी सम्मिलित गाष्ठियां चलाते रहते थे। लेकिन Symbol “C” लगाने के प्रावधान के खिलाफ विरोध प्रकट करना जरूरी था। इसीलिए मैंने आमरण अनशन पर जाने की नोटिस दी थी।पता नहीं अधिकारियों के बीच क्या मंत्रणा हुई। जिस दिन से मेरा अनशन शुरू होना था, उससे एक दिन पहले शाम को मुझे कैद से रिहा कर दिया गया। एक कारण तो शायद यह था कि धीरे-धीरे सैकड़ों की संख्या में बन्द दूसरे नजरबन्द कैदियों को छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया था। कुल मिलाकर इस आंदोलन का यह असर जरूर हुआ कि 1967 के विधानसभा चुनावों में मुजफ्फरपुर जिले संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी 9 स्थानों पर विजयी हुए, जितना पहले कभी नहीं हुए थे।
इसके बाद बिहार में संविद सरकार बनी। पर बिन्देश्वरी मंडल के दल-बदल के कारण यह सरकार गिर गयी और विधानसभा भंग हो गयी। इसके बाद 1969 में फिर चुनाव हुए और संसोपा और इसकी सहयोगी पार्टियां फिर सत्ता में आ गयी। लेकिन धीरे-धीरे समाज परिवर्तन का लक्ष्य गौण हो गया। समाजवादी विचारों को फिर से परीक्षित करने का विचार मेरे ऊपर हावी होने लगा। इसी दबाव में सक्रिय राजनीति से अलग हो 1969 के अक्टूबर में मैं दिल्ली चला गया। अठारह साल तक मैं ज्यादा समय पढ़ने-लिखने में ही लगा रहा। ज़ेपी़ आंदोलन के काल में और फिर आपातकाल में समय-समय पर आंदोलनकारियों से सहयोग भी करता था। लेकिन यह न्यूनतम था। 1980 में समता संगठन खड़ा करने के पहल में जरूर सक्रिय था और इसका नीति-वक्तव्य तैयार करने की जबावदेही मुङो दी गयी। इसके बाद से समाजवादी जन परिषद बनने तक और उसके बाद तक इस संगठन से जुड़ा रहा लेकिन मेरी सक्रियता मुख्य रूप से बौद्घिक क्षेत्र में ही रही। इसके बाद की स्थिति और मेरे लेखन के संबंध में तो आप सब लोग परिचित हैं।
(अपने 80वें जन्मदिन पर 28 मार्च 2009 को मुजफ्फरपुर के लंगट ंिसंह कॉलेज के हॉल में आयोजित ‘‘आधुनिक सभ्यता का संकट और सच्चिदानन्द सिन्हा का लेखन।’’ शीर्षक संगोष्ठी के अवसर वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानन्द सिन्हा का अपने जीवन और कर्म पर संक्षिप्त नोट)
Monday, August 15, 2011
कदम-दर-कदम अस्सी साल, बकलम खुद : सच्चिदानन्द सिन्हा
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
12:03 PM
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Sunday, August 14, 2011
समाजवादी चिन्तक संच्चिदानंद सिन्हा का पत्र जेल प्रशासन के नाम
नीचे दिया गया पत्र समाजवादी चिन्तक संच्चिदानंद सिन्हा ने 1965 में गिरफ़्तारी के दौरान मुजफ्फरपुर जेल में उत्पीडन के खिलाफ अनशन के लिए लिखा था। हालाँकि उस अनशन की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि जेल प्रशासन ने अनशन से एक दिन पहले ही उनकी जायज़ मांगो कों मान लिया था।
Prisoner’s Petition
From (Name number and class)- Sachchidanand Sinha s/o Brajnandan pd singh Division (b) and class X (symbol c)
16.9.65
From Muzaffarpur Jail
To
The District Magistrate
Muzaffarpur
Sheweth
That this petitioner had put up a petition on 10th Sept. 1965 through the jail authorities for immediate removal of symbol ‘c’. However, no action has been taken in this respect till now. That five days is not normally a long duration for those who are free. But for a man under confinement for an indefinite period every day might appear an eternity. This delay is made all the more oppressive when one has to live under the inhuman condition imposed by the diabolical symbol ‘c’. The provisions of the Rules for those stigmatized under this symbol are unjustified even for the worst of criminals. Such a prisoner is shut out from all light both physical and intellectual Denial of books and paper, virtual denial of all intercourse with the friendly world and denial of air and comforts, makes the life of such a prisoner a living entombment. Even Criminals are human beings and imprisonment by an enlightened government is a means towards prevention of crimes or reformation. Any attempt to subject them to conditions of beastly indignity smacks of sadism and can have only a brutalizing effect on the administration. It may be instructive to remember that a man like Oscar Wilde could be imprisoned for criminal offences and the great novelist Costoyevsky had a reprieve and to be exiled in Siberia after living for a long time under orders of execution It is true that your are powerless in remedying these evils in the law. But this has been pointed out because it lies within your power to classify the prisoners and you can take a more charitable view of their crimes.
Taming to my own case and that of other political prisoners who have been favored with this symbol ‘c’, the issue takes on a wider significance when political prisoners like us are classified ‘ habitual criminal’ of ‘goonda’, the words simply lose their meaning. George Orwell pointed out just this condition of thought process when he elaborated the theme of ‘double talk’. In an essay, ‘Politics and English Literature he set forth the view that the corruption of language through misuse paves the way for dictatorship. He was then concerned about the fate of British democracy. Our Indian democracy is much too fragile to stand such corruption of thought.
Thus what has been done to us is a threat to democracy itself. If we read recent European history, we must be aware that Hitler came to power in Germany through the Waimer constitution, which was considered one of the most democratic constitutions in the world. But though while the framework of the constitution remained intact, through persecution of the opposition parties, its vitals had been eroded away and it finally collapsed. Your decision to penalize the opponents of the ruling party for their political conviction, by treating them as criminals is a repetition of much the same process. As a democrat I am bound to protest against this decision both on personal as well as on political ground.
I have, therefore, decided to undertake a fast unto death from the morning of 18.9.1965 against your decision to treat me as a habitual criminal or a goonda.
Yours faithfully
P.S. I was released from the jail one day before my fast was to begin.
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
12:45 PM
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Sunday, June 26, 2011
एक कानून का बेअसर हो जाना
सीएसई मीडिया फेलोशिप के तहत 22 जून 2011 कों हिंदुस्तान में प्रकाशित
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
11:11 AM
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Monday, June 6, 2011
Saturday, May 28, 2011
Thursday, May 26, 2011
Thursday, April 7, 2011
Tuesday, March 29, 2011
मैं अब वह शास्त्री नहीं रहा
जब मैं न रहूं तब जग में मेरी एक कहानी हो,
जग उंगली उठा कहे-कोई ऐसा अभिमानी हो।
उत्तर बिहार की राजनीतिक, साहित्यिक राजधानी के रूप में विख्यात मुजफ्फरपुर के सबसे बदनाम रेडलाइट एरिया ‘चतुर्भुज स्थान’ के एक छोर पर वीरानी के बीच करीब एक एकड़ के प्लॉट पर बने पुरानी कोठीनुमा दो मंजिले मकान में हिन्दी साहित्यकारों में अब सबसे बुजुर्ग और कविताओं के माध्यम से लोगों के दिल- दिमाग को उत्तेजित कर देनेवाले अपने युग के प्रसिद्ध गायक 95 वर्षीय कवि श्री आचार्य (प्रो।) जानकी वल्लभ शास्त्री अपने गौरवशाली स्वाभिमानपूर्ण और स्वर्णिम अतीत में विचरण करते हुए अपनी दूसरी पत्नी श्रीमती छाया देवी, चार- पांच गायें और चार-छह कुत्तों के साथ जल-कमलवत निवास करते हैं। पशु-पक्षी ही क्या, मधुमक्खियों आदि के प्रति भी असीम प्रेम रखनेवाले शास्त्री जी की वयोवृद्ध अवस्था और कुछ अन्य कारणों से इन दिनों यहां अन्य पशु-पक्षियों के दर्शन दुर्लभ से हो गए हैं। शास्त्री जी के मकान के सामने ही एक खंडहरनुमा मंदिर अवस्थित है। उनके परिसर के चारों ओर चहारदीवारी की गयी है। मुख्य दरवाजे पर पुराने किस्म का दरवाजा लगा है, जो इस परिसर की अतीत की गौरवशाली गाथा का परिचायक है। इसके ऊपर ही लंबा बोर्ड लगा है- ‘निराला निकेतन’। यह इस इलाके की भी पहचान बन चुका है और शास्त्री जी के आवास का भी। शहर में कहीं भी उनका पता पूछिए, आपको घूमा फिरा कर ‘निराला निकेतन’ पहचान की अंतिम कड़ी के रूप में बताया जाएगा।
परिसर में प्रवेश से ठीक पहले शास्त्री जी की एकमात्र संतान पुत्री शैलाबाला जी का अपेक्षाकृत छोटा मकान है, जिसमें वह और उनके पति प्रताप चन्द्र मिश्र रहते हैं। इनकी दो बेटियां हैं लेकिन दोनों नौकरी में हैं और अपने पति के साथ रहती हैं। मिश्र जी 80 के हो चुके हैं। शैलबाला जी शास्त्री जी की पहली पत्नी की संतान हैं। उनकी भी उम्र 70 से ऊपर होगी। शास्त्री जी के परिसर में इनका आना-जाना बहुत ही कम होता है। मिश्र राजस्व विभाग से सेवानिवृत्त हैं लेकिन उनकी रुचि रंगमंच में रही है। आकाशवाणी के पटना केंद्र से बहुप्रसारित लोकप्रिय हास्य नाटक ‘लोहा सिंह’ में वह ‘फाटक बाबा’ की भूमिका निभाते रहे हैं। साथ ही फिल्मों में भी इनकी रुचि रही है। वह मुजफ्फरपुर में कई सिनेमा हॉलों के मालिक और भोजपुरी फिल्मों के निर्माता स्वर्गीय राम उदार झा के सान्निध्य में रहे।
शास्त्री जी के परिसर में प्रवेश करते ही दोनों ओर गायों को खिलाने के लिए नांदें लंबी कतार में बनी हैं। हालांकि, अब 5-6 गायें ही बची हैं, जो दोपहर का समय होने के कारण छाया में बंधी हैं। नांद श्रंखला के बीच से होकर रास्ता कोठीनुमा मकान के बरामदे तक जाता है। नांदों की कतार के पीछे टीन की छत वाला सहन बना है जो अब गायों को बांधने के लिए उपयोग होता है। शुरुआत में शास्त्री जी का यही आवास हुआ करता था। तब मुख्य भवन बना नहीं था। बरामदे से पहले ही मीनारनुमा एक मंदिर है, जिसे शास्त्री जी ने पिता के नाम पर बनवाया है। मंदिर में पिता की प्रतिमा भी लगी है। बरामदे में प्रवेश करते ही बायीं ओर तख्त पर शास्त्री जी इस उम्र में भी पूरे आत्म विश्वास से साथ विराजमान हैं। खुला बदन, कमर से नीचे एक धोती डाल रखी है। पैर में मोच के कारण बैठे ही रहते हैं। तख्त पर छोटी संदूकची है, जिसके ऊपर और आसपास कई किताबें बिखरी पड़ी हैं। इन्हीं किताबों में शास्त्री जी की हाल में प्रकाशित विशालकाय महाकाव्य ‘राधा’ है, जिसका जिक्र वे बीच- बीच में करते रहते हैं। एक या दो शीशे रखे हैं, जिनमें कुछ-कुछ देर पर वह अपनी छवि निहार लेते हैं।
दीवार पर छायावाद के चतुष्टय- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा और सुमित्रनन्दन पंत एक ही फोटो में विराजमान हैं। दूसरी फोटो में महाप्राण निराला की ‘आमने-सामने’ मुद्रा में दो भावप्रवण छवि एक ही फ्रेम में मढ़ी गयी है। इसके अतिरिक्त शास्त्री जी की उम्र के विभिन्न पड़ावों पर खींची गयी कई तस्वीरें दीवारों पर टंगी हैं। लंबे-लंबे बाल, उन्नत ललाट, क्लीन शेव, कुरता। यद्यपि अब शास्त्री जी ने अपने बाल बहुत ही छोटे करवा लिये हैं, उनके सामने पड़ते ही उनकी जो छवि अब तक मनो मस्तिष्क पर अंकित थी, एक झटके में क्षत-विक्षत हो गयी। स्कूल और कॉलेज के दिनों में पाठय़-पुस्तकों में शास्त्री जी की कविताओं को पढ़ते हुए और शिक्षकों से सुनते हुए शास्त्री जी की जो छवि बनी थी , उसमें उनके लंबे बालों का खासा स्थान था। इसी से उनकी छवि जो मन में अंकित हुई थी, वह सुमित्रानंदन पंत और फणीश्वरनाथ रेणु के लंबे बालों से अक्सर टकरा जाती थी।
मैं जब शास्त्री जी प्रोफाइलनुमा इंटरव्यू लेने पहुंचा, वह तारीख थी 2010 की 7 जुलाई। दिन के करीब तीन बजे वहां पहुंचा। उस समय वहां कुर्सी पर शास्त्री जी के एक रिश्तेदार उदय शंकर दीप बैठे थे, जो पूरे परिवार के साथ तुर्की से यहां मिलने आए थे। वे शास्त्री जी की पत्नी छायादेवी के भतीजे हैं। दायीं ओर एक बड़ा सा कमरा है जिसमें छाया जी उदय जी की पत्नी और बच्चों के साथ हैं। गर्मी काफी है। पंखा धीमी गति से चल रहा है। मैंने शास्त्री जी से मिलने और उनसे बातचीत के लिए पहले शहर के कई गणमान्य लोगों से चर्चा की और उनके मिलने के समय आदि के बारे में जानकारी प्राप्त की, ताकि वहां पहुंचकर निराश न होने पड़े और लौटना न पड़े। चाहता था कि उनका कोई निकटस्थ व्यक्ति मेरे साथ चले ताकि शास्त्री जी के स्वभाव के अनुकूल मेरी बातचीत को सुगम बनाए। शास्त्री जी की दिनचर्या आदि के बारे में भी कुछ पता तो था नहीं। रामदयालु सिंह कॉलेज में शास्त्री के सहकर्मी रह चुके हिन्दी के पूर्व प्रोफेसर उदय शंकर जी से इस बारे में काफी दिशा-निर्देश मिले। वे कॉलेज से रिटायर होने के बाद भी शास्त्री जी से जुड़े रहे हैं। उदय शंकर जी ने शास्त्री पर कुछ जानकारी के लिए उनका एक परिचयात्मक नोट दिया जो ‘मुजफ्फरपुर’ शीर्षक से प्रकाशित पुस्तिका में है। शहर के कई ऐसे प्रोफेसरों के नाम भी उन्होंने ही बताए जो शास्त्री जी पर कुछ लिखने-पढ़ने का काम करते आए हैं। इनमें प्रो। राम प्रवेश सिंह, अवधेश्वर अरुण और आस नारायण शर्मा के नाम शामिल हैं। अभी हाल में ‘जनपथ’ पत्रिका में शास्त्री जी पर एक लेख पढ़ने को मिला जो संयोग से मुजफ्फरपुर के ही निवासी प्रो. विजेन्द्र नारायण सिंह का है। उन्हें फोन किया तो उन्होंने शास्त्री जी के मुख्य संपादन में निकल रही साहित्यिक पत्रिका ‘बेला’ का काम इन दिनों देख रहे विजय शंकर मिश्र का नाम सुझाया और उनका नंबर भी दिया। फोन पर बात कर मिश्र से मिला। उन्होंने शास्त्री जी के स्वभाव को बताकर उनसे सीधे मिलने का सुझाव दिया कि बातचीत हो पाएगी या नहीं, यह उनके मूड पर निर्भर करता है। शास्त्री जी के यहां हमेशा आते-जाते ‘हिन्दुस्तान’ मुजफ्फरपुर के फोटोग्राफर उत्तम कुमार जी को फोटों के लिए संपर्क किया तो वह सहर्ष तैयार हो गए। हालांकि वे कुछ देर बाद पहुंचे। इस तरह से तैयार होकर शास्त्री के पास पहुंचा। शास्त्री जी की याददाशत बहुत कमजोर हो चली है। घटनाओं को बेतरतीब बताते हैं। कई बार भूल जाते हैं। कहीं का कहीं से जोड़ देते हैं। ऐसे में उदय जी छाया जी से पूछकर उन्हें ठीक करते हैं। शास्त्री जी को प्रणाम किया। बैठने का आदेश मिला। आने का प्रयोजन पूछा। लेकिन जो मैंने बताया, वह सुन नहीं पाए। उदय जी से बताने को कहा। उदय जी ने मेरा परिचय और आने का प्रयोजन नजदीक से बताया। फिर शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला जो करीब ढाई घंटे तक चला। शास्त्री जी बोलते-बोलते बीच में चुप हो जाते हैं। काफी देर बाद फिर बोलते हैं। बीच-बीच में अचानक झल्ला पड़ते हैं। कुछ गुस्से में भी आ जाते हैं। उदय जी ने पहले ही कह दिया है कि जो बोलें सो सुनिये। बीच में टोकिए नहीं। वे जब चुप हो जाएं तो कोई सवाल पूछिए। मैंने साक्षात्कार का श्रीगणेश किया।
आप साहित्य की दुनिया की ओर कैसे आकर्षित हुए?
शास्त्री सुन नहीं पाए। मेरे सवाल को उदय जी दोहराते हैं। तब शास्त्री जी ने समझा और आगे बात शुरू की। लेकिन उत्तर की जगह प्रतिप्रश्न। यहां क्यों आए। शहर में बड़े-बड़े विद्धान हैं, उन्हीं से जाकर पूछिए। वही सब कुछ बता पाएंगे। मेरे यहां कुछ भी नहीं मिलेगा आपको। किसी ने आपको यहां भेजकर बेवकूफ बना दिया है। लगा, शायद आने का प्रयोजन सिद्ध होने से रहा। लेकिन यह उनका आरंभ करने का स्वाभाविक ढंग था। शास्त्री जी ने सुदीर्घ जीवन में साधना, सिद्धि के साथ-साथ अनेक आघात भी सहे हैं। उनका तिक्त-कटु अनुभव दैनंदिन का सहज हिस्सा हो गया है। शिकवा- शिकायत नहीं॥ सिर्फ जीवन सत्य .. युक्त यथार्थ। शास्त्री जी बतला रहे हैं : 6 जनवरी, बुधवार को 1916 में जन्म हुआ। बिहार के गया जिले के मैगरा गांव में। 12 साल की उम्र में विवाह हो गया। 18 वर्ष की उम्र में बिहार-उड़ीसा में आचार्य की परीक्षा में फस्र्ट फस्र्ट से पास किया। 1934 में ही बनारस चला गया।
बनारस कैसे गए?
कुछ पढ़ा-लिखा नहीं था, सो बीएचयू चला गया। वहां मालवीय जी का प्रियपात्र बन गया। सौभाग्य देखिए छह वर्ष उनके साथ रहा। जब उनकी मृत्यु हुई तब भी पास में बैठा था। बनारस में मेरी कविता पढ़कर निराला मिलने आ गए हॉस्टल में तब से उनका स्नेह मिलता रहा। छह बरस बनारस में रहना सौभाग्य की बात है। साधारण सौभाग्य नहीं। यही ईश्वर ने दिया मुझे। वहां प्रसाद से बहस हो रही है, निराला से टक्कर हो रही है। अब के लोग केवल नाम सुनते हैं उनका। बहुत जानते भी नहीं कि कौन निराला हैं कौन प्रसाद। उस समय तो महात्मा गांधी आए तो सभा का शुभारंभ जानकी वल्लभ करेंगे। लोगों के लिए तमाशा बन गया था। टैगोर आएं या महात्मा गांधी। मैं ही स्वागत भाषण करता था। यद्यपि प्रो राम प्रवेश सिंह ने बाद में इसमें सुधार किया : पहली पत्नी का नाम चन्द्रकला था। मैगरा में ही 1947 में उनकी मृत्यु हो गयी। पुत्री शैलबाला का जन्म हो चुका था। शास्त्री जी ने ‘हंस बलाका’ में खुद लिखा है : पहली पत्नी के पिता ही मालवीय जी से मिलाने बनारस ले गए थे।
सुभाष चंद्र बोस से भी आपकी मुलाकात के किस्से हैं?
हां, एक बार।
कहां?
यहीं। यहां स्टेशन के पास ही एक सभा हुई तो लोगों ने कहा, जानकी वल्लभ शास्त्री उद्घाटन करेंगे तब मेरे लंबे-लंबे बाल थे। वह स्वाधीनता के लिए संघर्ष का दौर था। लोगों ने मेरा कहा सुना। ओजपूर्ण उद्बोधन॥ बस ब्रह्मांड हिल गया..। स्नेह बहुत मिला। कुछ फायदा नहीं उठाया कभी भी। शास्त्री जी का तकिया कलाम है- ‘ब्रह्मांड हिल गया।’ वह चाहे मालवीय जी ने उनका काव्य पाठ सुना हो, निराला जी ने सुना हो, या कर्पूरी ठाकुर ने उनका भाषण सुना- हर बार ब्रह्मांड हिल गया। और जब ब्रह्मांड हिल उठा तब तो सारा कुछ प्रलय जैसा। ऐसे में जो सुना वहीं सब खत्म। फिर देर तक मौन छाया रहा। उदय जी की हिदायत याद थी। बीच में मत बोलें। मौन बीच में ही था। मैं इंतजार करता रहा। कुछ पल बाद शास्त्री जी निजी-पारिवारिक बातों पर उतर आए। बोलते-बोलते अचानक मेरी ओर इंगित कर उदय जी से पूछ, ये कौन हैं कहां से आए हैं, क्यों आए हैं। उदय जी फिर से बताते हैं तो याद आ जाता है। किसने मेरे पास आपको गलती भेज दिया। परेशान कर दिया किसी ने आपको। आपने मुझे परेशान कर दिया। कुछ पूछने को भेजा है?
हां, पूछने ही आया हूं, हमारे हिन्दुस्तान समूह से कादंबिनी पत्रिका निकलती है, उसी में छपेगा, आपके बारे में।
कादंबिनी समझ जाते हैं। फिर उदय जी से पूछा - जरा बताना क्या पूछते हैं? नहीं बता पाएंगे। यहां मुजफ्फरपुर में भरे विद्वान मिल जाएंगे। पर, यहां न लागहिं राउरि माया। बाई-द वे, हमारे यहां आपको कुछ प्राप्त नहीं हो सकता है। शास्त्री जी के बारे में आम धारणा है कि वे आत्ममुग्ध और स्वाभिमान से भरे हैं। हों भी क्यों न। आखिर हैं तो उसी गया के। इस इलाके की शायद परंपरा ही स्वाभिमान की रही है। यहीं के महाकवि बाणभट्ट ने आठवीं शताब्दी में महाराज हर्षवर्धन के दरबार में उपस्थिति लगाई थी। हर्ष ने जब महाकवि का परिचय पूछा तो सहसा उनके मुख से संस्कृत में छन्दोबद्ध कविता फूटी, वह संस्कृत साहित्य में शायद अहंकार की गंभीरतम अभिव्यक्ति है। शास्त्री जी भी तो आखिर ठहरे उसी गया के। जानकारों का मानना है कि यह स्व अभियान ही शास्त्री जी को ऊपर उठने और समकालीन अन्य कवियों की तरह साहित्याकाश में छा जाने में बाधक भी बना है। अपने अभिमान को शास्त्री जी स्वीकार करते भी हैं। अपने बारे में पूछने पर पीछे लौट जाते हैं : मैंने जहां भी परीक्षा दी फस्र्ट क्लास फस्र्ट पास किया। नौकरी के लिए कुछ नहीं करना पड़ा। ईश्वर की बड़ी कृपा रही। घमंड में फूलता रहता था। भगवान ने सोचा बड़ा अभिमान हो गया है। इसलिए पैर तोड़ दिया। बनारस में छह साल रहा। काशी प्रवास मेरे जीवन-निर्माण और जीवन दृष्टि के विकास का महत्वपूर्ण बिंदु रहा है। यहां न केवल मालवीय जी और निराला का मुङो सान्निध्य प्राप्त हुआ, बल्कि जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, नंद दुलारे वाजपेयी, वामदेव मिश्र, महादेव शास्त्री, गोस्वामी, दामोदर शास्त्री, पंडित बालकृष्ण मिश्र जैसे प्रकांड पंडितों का स्नेह और साहचर्य प्राप्त हुआ। यहीं मैंने छायावादी शैली में संस्कृत ‘काकली’ की रचना की। तो देशभक्ति से ओतप्रोत ‘बंदी मंदिरम’ की भी। मेरी इन्हीं कविताओं को पढ़कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रुइया हॉस्टल में महाप्राण निराला अचानक उपस्थित हो गए। उन्हीं की प्रेरणा से संस्कृत छोड़ हिन्दी काव्य रचना की ओर प्रवृत हुआ॥ फिर तो ब्रह्मांड हिल गया.. । अब तक आचार्य का ढंग कुछ-कुछ समझ चुका था, सो मैंने ब्रह्मांड को देर तक हिलने नहीं दिया। झट प्रश्न सामने रख दिया-
बनारस से कहां गए? लेकिन उन तक प्रश्न यथारूप नहीं पहुंचा। वह मुजफ्फरपुर आने का प्रकरण बताने लगे।
1939 में आया। गंगा कभी देखा नहीं था, सो गंगा देखने पहली बार आया और गलती से नदी पार कर गया। फिर यहीं का होकर रह गया। मुजफ्फरपुर में तब रमना में यहां के सुप्रतिष्ठित गणमान्य नागरिक उमाशंकर प्रसाद सिंह हुआ करते थे। 1939 से 48 तक उन्हीं के यहां रहा। ‘राधा की पांडुलिपि’ बाबू साहब की पुत्री और मेरी शिष्या चंदा ने तैयार की थी। फिर सूत्र टूट गया। शास्त्री जी ने आगे का छोर पकड़ा। स्वगत बोले, मालवीय जी के कारण रायगढ़ के बाद नौकरी नहीं की। लाहौर तो विद्यार्थी जीवन में गया। जो तीनों भाई को फांसी हुई थी। क्या नाम था। वो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु। हां, वहीं घूम-घूमकर उनका फोटो दिखाते थे। आजकल थोड़ा पढ़ लें तो अभिमान हो जाता है। उस समय सामान्य रूप से उनकी फोटो लेकर घूमता था। इस अवांतर के बाद पुन: मुजफ्फरपुर प्रसंग पर मोड़ने की कोशिश की।
तो मुजफ्फरपुर गंगा दर्शन को आए थे?
हां, रास्ता नहीं था। नाव नहीं। लकड़ी के नाव पर लड़के बैठाकर ले आए। स्टेशन पर रो रहा था। लोगों ने देखा और बाबू साहब (उमा शंकर प्र। सिंह) से कहा। बाबू साहब के यहां आ गया। यहां संस्कृत कॉलेज में नियुक्ति हो रही थी। दो-तीन दिन बाद यहां नियुक्त हो गया। मैं तब ही संस्कृत में भाषण करता था कॉलेज में। ‘अहं पुस्तकं पठाम’ वाली संस्कृत नहीं, धारा प्रवाह। मेरी लिखी किताब देखिएगा तो ब्रह्मांड हिल जाएगा। वह जमाना था जब निराला थे, प्रसाद थे। महादेवी से मिलाने निराला ले गए। बस उम्र देखकर सब आश्चर्य करते थे। शास्त्री जी की पहली पत्नी का निधन 1947 में हो गया। तब पत्नी मैगरा में थी। शास्त्री कहीं और थे। कई दिनों बाद पहुंचे। छह महीने बाद दूसरा विवाह मुजफ्फरपुर के तुर्की में हुआ 1948 में।
फिर मैगरा कभी गए?
कभी-कभी। पहले पिताजी थे। फिर उन्हें भी यहीं ले आए। उसके बाद नहीं गया। कहीं आपने सुना है। पिता का मंदिर बनवाते। मैंने बनवाया। 4 साल की उम्र में ही मां मर गई।
अपने साहित्य के बारे में बताइए।
यही बताएगा लड़का। मुझे कुछ नहीं आता। मेरा तो पैर टूटा है। कोई कुछ नहीं करने वाला है। भाई- भतीजा कोई नहीं है। बाहर वाले आते हैं। शास्त्री जी ई पास हैं कि ऊ पास हैं। कोई जान सकता है? 18 वर्ष में जब बोलता था तो ब्रह्मांड हिल जाता था। अरे आप इस तरह से तो सब जान ही गए।
निराला जी के साथ आपका नाम विशेष रूप से साहित्य जगत में स्मरणीय है। आपकी काव्य रचना की प्रक्रिया में निराला का प्रभाव किस रूप में रहा? (उत्तम जी फिर से सवाल दोराहते हैं।)
यह तो लोअर स्कूल का प्रश्न है। निराला बड़े कवि थे। एक युग थे। मैं उनके बेटे से भी छोटा था। मेरे ऊपर उनकी बड़ी कृपा थी। उत्तम जी फोटो लेकर जाना चाहते थे। नंगे बदन बैठे हैं शास्त्री जी को कुरता पहनाया गया। बोले- यह क्या कर रहे हो। फोटो-उटो लेना है। इनको तो कोई काम नहीं है। फोटो ले लेंगे, छाप देंगे। बस। किधर बैठना है। जरा बाल ठीक करो। बड़ा दुख हुआ। क्षमा कीजिए। मैं कुछ नहीं बता सकता। मेरे बारे में आप कुछ भी जानते होंगे, यह मेरा मन स्वीकार नहीं करता। आपने जितना सुना वहीं दोहरा दीजिए तो मान जाऊंगा। इतने के बाद कहो कि शास्त्री के बारे में सब कुछ जानते-समझते हैं, इससे बड़ा धोखा क्या है। पूरा दिन बैठे बीत गया।
आपकी इन दिनों दिनचर्या क्या है?
सामान्य ही है। कहीं आ-जा नहीं सकता। जानते नहीं। यहां दिनकर के सामने किसी की बोली नही निकलती थी। वहां शास्त्री बोलता था। ब्रह्मांड हिल जाता था। बेनीपुरी कलेजे से लगाए रखते थे अब मैं भी वह शास्त्री नहीं हूं। आज कंघी भी नहीं किया। बताते चलें कि शास्त्री जी बीच-बीच में मुझसे खाना खाने के बारे में पूछते रहे। फिर अचानक जैसे उन्हें याद आया, अरे आप इतनी देर से बैठे हैं कुछ खाइए। खाकर आया हूं। फिर आग्रह- अगर खाना हो तो खा लीजिए। भूखे होंगे। अपने बारे में भी भूल गए हैं। उदय जी से पूछा- आज मैंने कुछ खाया है या नहीं।
आपने काफी बड़ी संख्या में प्रगीत लिखे हैं और छंदोबद्ध कविता भी। जबकि निराला आदि ने छंद के बंध को तोड़ने का आह्वान किया था।
सबको एक साथ मिलाकर नहीं देख सकते। जब जिसके साथ रहा, वहां उसी की तरह की बात बोला। मालवीय जी के साथ रहा, निराला के साथ रहा और जनता के बीच भी रहा तो उन्हीं के अनुसार लिखा। मंच पर गया। छंदोबद्ध। प्रगीत भी लिखे। यहां से पहले काशी का आदमी था। यहां आकर बिहार का हो गया। काशी में ग्रंथ पर ग्रंथ लिखे। इसके अलावा क्या किया, कुछ नहीं, कविता से कहानी, फिर नाटक लिखा। जितना लिखा, एक आदमी से उठेगा नहीं, उठाने के लिए कुछ पैसा लगेगा। आदमी रखना पड़ेगा। नई किताब आई है। (राधा दिखाते हैं) 1000 की एक है। रायगढ़ में लिखना शुरू किया।
अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए?
देखिए, तंग मत करिए। समझ गया, उस दिशा में दूर तक जाने की गुंजाइश नहीं है। साहित्य की ओर लौट आया।
पद्य की ओर कब से झुकाव हुआ?
जन्म से ही। संस्कृत, बांग्ला, हिन्दी सबमें लिखा।
परिवार में कोई साहित्यिक थे?
पिता जी बड़े विद्वान थे पर कवि नहीं थे। एक लड़के को बुलाकर पिता का मंदिर खुलवाते हैं। दिखाते हैं।
आपका पशु-पक्षी प्रेम जगजाहिर है। यह लगाव कैसे हुआ?
अब मैं क्या जवाब दूं। मेरी मां भी गाएं पालती थीं। पूर्वज गो भक्त थे। घर में 10-12 गाएं थी। सब लोग मर गए। पिता यहां आ गए तो यहां गाएं रख ली।
आज के साहित्य के बारे में कुछ बताइए?
आगे नहीं बढ़ा है। नए अर्थ में तो बड़ा हो गया है। लोग नए ढंग से लिखने लगे हैं, पर कविता की गुणवत्ता आगे नहीं बढ़ी। नई कविता हो गई। पहले आदमी विद्या, आचरण, अनुभव को मिलाकर कविता लिखता था। आजकल बस सुन लिया और लिख दिया। पहले इतनी भाषाएं नहीं थी, अब भाषाएं बढ़ी हैं, शैली बढ़ी है तो कुछ काम भी बढ़ गया है। इस अर्थ में नया तो कुछ हो ही गया है। कुछ चीजों में मन नहीं लगता। आप जो लिखिएगा, उसमें मुझे मजा नहीं आएगा। आप तो जो सुनिएगा, वही लिखिएगा, समझकर तो लिखिएगा नहीं। बड़ा कठिन है। जिसने रामायण लिखा, उसने एक हजार किताबें नहीं लिखी पर बड़ा हो गया। अचानक ब्रह्मांड हिला, नाराज से हो गए। आपने कैसा समय बिगाड़ा आज मेरा। और कुछ पूछ रहे हैं बताना जरा।
उत्तम जी ने पूछा - कविता के भविष्य के बारे में पूछ रहे हैं।
अलग रूप नहीं है। भविष्य विश्व के जैसा रहेगा। विश्व आगे जाएगा तो कविता आगे जाएगी। विश्व नष्ट होगा तो कविता का नाश हो जाएगा। क्यों ये सब बातें पूछ रहे हैं। छपेगी क्या? हां। अरे तब तो बहुत बुरा होगा। सब बातें बदल जाएगी। कुछ रुककर- चलो छपने दो।
कुछ विद्वतजन (मुख्यत: नलिन विलोचन शर्मा) ने आपको छायावादी कवि बताया है। आपकी खुद के बारे में क्या राय है?
मैं कुछ नहीं जानता, कुछ नहीं बताऊंगा, इस बारे में उन्हीं से जाकर पूछिए। मुजफ्फरपुर के कॉलेज में, विश्वविद्यालय में बड़े-बड़े विद्वान हैं। उन्हीं से जाकर पूछिए। मैं तो कुत्ते-बिल्लियों के साथ रहता हूं। साहित्य- व्याकरण से क्या लेना-देना।
आपकी प्रसिद्ध कविता है- किसने बांसुरी बजाई?
मुंह फेरते हैं। देखिए ये सब बच्चों के सवाल हैं। उन्हीं से पूछिए। कहिए कि हमने लेख लिख लिया। इससे न तो कविता समझ में आएगी, न परीक्षा पास करने में सहायता मिलेगी। लोगों से कहिएगा कि यह लिखा, वह लिखा। सच्ची बात है कि कविता पर बात करने का मन नहीं करता। नाम जोड़ दीजिए, बस संतोष हो जाए तो हो जाए, पर इससे कुछ समझ में आएगी नहीं। मुझे कौन जानता है कौन आता है मिलने। मुजफ्फरपुर में बड़े-बड़े कवि हो गए हैं।
आपको सब जानते हें दिल्ली में भी जानते हैं तभी तो मुझे आपसे बातचीत करने को भेजा है।
(शास्त्री गलत समझ जाते हैं शायद यह कि मैं सवाल कर रहा हूं कि दिल्ली में आपको कौन जानता है।) बस, तुरंत ब्रह्मांड हिल गया। पागल है क्या? मुझे दिल्ली में कई मेडल मिले। एक भाषण सुन बंबई में पृथ्वीराज हिल गए। पूरे परिवार के साथ आ गए मिलने। कई-कई दिन यहां रुकते थे। मुङो जबर्दस्ती बंबई ले गए वहां रखा। वह समझना है। वह समय बीत गया। अब तो सब एक पर एक काबिल हैं। दिल्ली में एकाधिक पुरस्कार पाया। उपन्यास, नाटक, भाषण सब दिया। वहां का कोई पूछेगा कि कोई जानता है? यह तो दुख की बात है। कह दीजिएगा कि कुत्तों के साथ रहते हैं। यही न जानेगा। बहुत दुख दिया आपने, (उत्तम जी समझाने की नाकाम कोशिश की।) कोई मुझे समझने वाला हो तो ठीक। यह फोटो-वोटो से क्या होगा। ये भिड़े हैं कि निबंध लिखेंगे। मेरे लिखे को जान जाइएगा तो विद्वान हो जाइएगा। हमसे कहलवाना ठीक नहीं है। हमारे बारे में पढ़कर समझना चाहिए किसी को। इन्होंने तो पूरा दिन बर्बाद कर दिया। शास्त्री जी को कई पुरस्कार मिले। बिहार का राजेन्द्र शिखर सम्मान, उत्तर प्रदेश का भारत-भारती पुरस्कार आदि। उन्होंने पुरस्कार ठुकराए भी हैं। पहले इंदिरा जी के हाथों नहीं लिया। इधर भी पद्म पुरस्कार ठुकराकर साहित्य की स्वतंत्र चेता सत्ता की श्रेष्ठता को सिद्ध किया है। अचानक उदय जी की ओर मुखातिब होकर पूछा- तुम बुलाकर लाए थे इनको? उदय जी ने इनकार किया। तुम ही तो बाहर गए थे और बुलाकर ले आए। नहीं मैं नहीं गया था। मैं तो सोने गया था। अरे, सारा दिन बैठा रहा। न पांव फैला सका न खा सका। अदभुत-अदभुत आदमी आ जाते हैं, तुमने इनको लाकर सारा काम खराब कर दिया। खाली फोटो छपवाने का काम करते हैं। आप लोग लड़के हैं। समझ नहीं सकते कि मैं क्या बोलता हूं। मेरी उम्र बताइए?
100 के पास।
कल्पना है, कभी कोई बात कर ले वह ठीक पर जम जाते हैं, वह ठीक नहीं। पढ़कर समझिए। ये क्या कि शास्त्री जी के बारे में दो लाइन में बताइए तो मैं नहीं बताऊंगा। जितने से सुनिएगा अलग-अलग हैं। उससे कुछ होने वाला नहीं। समझिए तब। दुनिया को बताइएगा। एक बात याद रखने की है कि आदमी आगे बढ़ा नहीं है। देखकर-पूछकर लिख लीजिए लेकिन उस युग के आदमी का ठेंगा भी नहीं है आज का आदमी। दर्शन देने को भी नहीं मिलेगा। 16-18 की उम्र में मेरी कविता की किताब निकली और निराला लखनऊ से बनारस मिलने आ गए। तब प्रेम था। अब क्या? नाम भी मेरा नहीं जानते थे। कोई कल्पना कर सकता है कि पृथ्वीराज कपूर यहां आकर रहते थे। उनके यहां मैं भी महीनों रहा। राजकपूर खाना लगा रहा है। शशि दौड़-दौड़कर पानी ला रहा है, अब तो सब सुनकर विद्वान हो जाते हैं, होते नहीं, होने के लिए तैयारी करनी पड़ती है। आपको भी ठग दिया गया है। और आपको यहां भेजकर मुझे भी ठग दिया गया है। जब ब्रह्मांड बुरी तरह हिलने लगा तब तय हुआ कि आगे कुछ न पूछा जाए। नाश्ता-चाय के बाद वहां से निकल जाना ही बेहतर समझा। वैसे आते समय चाय- नाश्ता करने के आग्रह पर शास्त्री जी पूरे सतर्क रहे। कुछ खाकर ही जाइए।
शास्त्री जी पर विद्वानों की सम्मतियां
प्रो. उदय शंकर : जानकी वल्लभ शास्त्री को उत्तर छायावादी कवि कहा जा सकता है। छायावाद के बाद जो प्रगतिवाद या प्रयोगवाद की धाराएं चलीं, उसमें तो वे कहीं हैं नहीं। छायावाद का प्रभाव जरूर उनकी कविताओं पर है। वैसे शास्त्री जी की कविताएं अनुभूति प्रधान है। गीतिकाव्य भी हैं और दर्शन का पुट भी है। दर्शन में भी मुख्यत: वेदांत से प्रभावित हैं। उनके लेखन में सुख-दुख की कहानी देखी जा सकती है।
गिरधर राठी : शास्त्री जी छायावाद युग के कवि हैं। निराला जी जैसे वरिष्ठ कवियों के साथ उनका संपर्क रहा है। उनकी छंदोबद्ध रचनाएं बहुत ही अद्भुत हैं। यद्यपि शायद यह अब नए पाठक वर्ग को अपील नहीं करे परन्तु हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में उनका योगदान उल्लेखनीय है। कालिदास पर उनका उपन्यास उल्लेखनीय कृति है। इस समय जो वरिष्ठ कवि हैं उनमें उनकी उपस्थिति प्रेरणादायक है। खासकर शास्त्री जी का पशुओं के प्रति जो घर के सदस्यों जैसे प्रेम है वह चकिता करता है, अच्छा लगता है।
प्रो. रामप्रवेश सिंह : पहली पत्नी की मृत्यु शीतला बीमारी से 1947 में मैगरा में ही हो गयी। 1939 में राधा की पांडुलिपि मथुरा जाते ट्रेन से ही एक नवयुवक लेकर फरार हो गया। साथ ही 2000 रुपये भी ले गया। कविता के बारे में उनका कहना है कि शास्त्री जी दार्शनिक कवि हैं। उनकी कविता सांस्कृतिक उन्नयन की है। जीवन मूल्य, अनेकांतवादी मानव दर्शन के कवि हैं। उनकी कविताओं की गहराई और ऊंचाई में रमतापन ही रमतापन है। इस दृष्टि से वे निराला और प्रसाद के बीच एक प्राणवान मनस्वी कवि हैं। उत्तर






