Tuesday, July 1, 2008

दोआबा के जून अंक में राजन की कविता

छह महीने में एक बार निकलनेवाली दोआबा पत्रिका का जून 2008 अंक वाकई में बेमिशाल है। विभाजन पर केंद्रित रचनाओं से भरे इस अंक में विभाजन के दर्द को फिर से ताजा कर दिया गया है। वैस विभाजन की त्रासदी को वह कोई अनुभव नही कर सकता जिसने इसकी विभीषिका न झेली हो, लेकिन हिन्दी-उर्दू के दोआब को उर्वर बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध इस पत्रिका में संपादक जाबिर हुसैन ने कहानियोंं-कविताओ का संकलन कर पाठकों को इस त्रासदी को अनुभव करने के लिए मजबूर कर दिया है। प्रसिद्ध कथाकारों की विभाजन की त्रासदी के सुक्ष्म पहलुओं को उभार कर लिखी कहानियां सचमुच में उस दर्द को उनके दिल में भी तरोताजा कर देती हैं जो मानवता के इस भयंकरतम विभीषिका से कोसों और दशकों दूर बैठे हैं।

इसी क्रम में गुलजार और राजेन्द्र राजन की 11 कविताएं भी शामिल की गयी है। राजेन्द्र राजन की कविताएं वैसे तो सीधे विभाजन पर नही हैं लेकिन वह वैसी ही स्थितियों में मनुष्य के सामने उपस्थित त्रासदी को सजीव कर देती हैं। इस अंक में सामग्री चयन तथा प्रति संवाद खंड के लिए डॉण् कमाल अहमद ने सहयोग किया है। कुल मिलाकर दोआबा का 450 पृष्ठों का यह अंक (कंधों पर सलीबें) इतिहास की शायद सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी पर काफी कुछ कह जाता है।
यहां राजेन्द्र राजन की बामियान में बुद्ध प्रतिमा को ध्वस्त करने की तालिबान की करतूत पर लिखी कविता पेश करते हैं जिसमें तालिबान के अलावा सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फार का बुद्ध से साक्षात्कार है।

बामियान में बुद्ध
निंश्चिंत होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से
अपनी बंदूकों, तोपों, बचे हुए विस्फोटकों
और अट्टहासो के साथ
अपनी समझ और हुकूमत के बीच
कि उनके मुल्क की जमीन पर
उसके इतिहास में
अब कहीं नहीं हैं बुद्ध
जहां वे खड़े थे सबसे ज्यादा मजबूती से
वहां से भी मिटा दिए गए उनके नामोनिशान
अब कोई नहीं था उस सुनसान जगह में
जहां पत्थर भी कुद कहते जान पड़ते थे
वहां हर शब्द था डरा हुआ
हर चीज खामोश थी दहशत से दबी हुई
बस हवा में एक सामूहिक अट्टहास था बेखौफ
जो बामियान के पहाड़ों को रह-रह कर सुनाई देता था
तप रही थी जमीन तप रहा था आसमान
पहाड़ के टूटने की आवाज
धरती की दरारों मे समा गई थी
हवा में भर गई बारूद की गंध
सब दिशाओं में फैल गई थी
तीन दिन बाद जब वहां कोई नहीं था
हर तरफ डरावना सन्नाटा था वहां नमूदार हुआ
लंबी नाक और चौड़ी ठोड़ी वाला एक पठान
वह तपती जमीन पर नंगे पांव बढ़ा उस तरफ
तीन दिन पहले जहां पर्वताकार बुद्ध थे
और अब एक बड़ा-सा शून्य था
उस खाली अंधेरी जगह के पास जाकर वह रुक गया
कुछ पल खामोश रह कर उसने सिर झुका कर कहा-
क्षमा करें भगवन् ! हमें क्षमा करें !
बुद्ध ने आवाज पहचानी
यह खान अब्दुल गफ्फार खां होंगे
फिर वे अपनी कोमल संयत गंभीर आवाज में बोले-
आप अवश्य आएंगे, मैं जानता था भंते !
कृपया इधर चले आएं इधर छाया में
आपके पांव जल रहे होंगे
सकुचाए लज्जित-से खान अब्दुल गफ्फार खां
बुद्ध के और निकट गए
फिर सुना
किसी को क्षमा करने का अधिकारी मैं नहीं
जो क्षमा कर सकते थे अब नहीं हैं
वे विलुप्त पथिक अक्षय शांति के खोजी
जिनकी खोज और साधना के स्मारक नष्ट किए गए
खान अब्दुल गफ्फार खां की आवाज अब भी नम थी :
यहां जो हआ उससे पीड़ा हुई होगी भगवन !
पीड़ा नहीं
दुख हुआ है भंते
जब कोई सृजन विध्वंस के उन्माद का शिकार होता है
दुख होता है
पर पीड़ा का प्रश्न नहीं
जब मैं शरीर में था एक दिन अंगुलिमाल गरजा था :
रुक जाओ भिक्षुक
वहीं रुक जाओ
पर मैं रुका नहीं
जैसे कुछ हुआ न हो मेरे कदम आगे बढ़े निष्कंप
जो कंप सकता था वह मेरे भीतर से विदा हो चुका था
अब तो वह शरीर भी नहीं
खान अब्दुल गफ्फार खां थोड़ा सहज हुए
बुद्ध ने उनकी आंखों में झांका :
यह क्या, आपकी आंखें गीली क्यों हैं भंते ?
मुल्क की हालत ठीक नहीं है भगवन् !
बरसों से हर तरफ
खून से सने हाथ दिखाई देते हैं
मारकाट जैसे रोज का धंधा है
सब किसी न किसी नशे में डूबे हैं
होश का एक कतरा भी खोजना मुश्किल है
डर का ऐसा पहरा है कि कोई कुछ बोलता नहीं है
कोई कुछ सुनता नहीं
जो बोलते हैं मारे जाते हैं
अभी तीन रोज पहले यहां जो हुआ उससे
इत्तिफाक न रखनेवाले चार युवक पकड़ लिए गए
सुना है उन्हें सरेआम फांसी पर लटकाया जाएगा
कुछ पल के लिए एक स्तब्ध मौन में डूब गए बुद्ध
जैसे ढाई साल बाद
नए सिरे से हो रहा हो दुख से सामना
फिर सोच मेंं डूबा उनका प्रश्न उभरा -
और, स्त्रियों की क्या दशा है भंते
उनका हाल बयान नहीं किया जा सकता भगवन्
वे पशुओं से भी बदतर हालत में जीती हैं
डर और गुलामी और सजा की नकेल से बंधी हैं वे
बुद्ध असमंजस में डूबे रहे कुछ पल
कि आगे कुछ पूछें या न पूछें
फिर उन्होंने पूछा :
और किसान किस हाल में हैं भंते
खान अब्दुल गफ्फार खां की अनुभव पकी आंखों में
गांवों के रोजमर्रा के चित्र तैर गए :
फसलें सूख रही हैं भगवन्
किसानों की कोई नहीं सुनता
फाकाकशी की छाया लोटती है मेनतकश घरों में
हुक्मरान हथियार खरीदने के अलावा और कुछ नहीं करते
बुद्ध और खान अब्दुल गफ्फार खां के बीच एक सन्नाटा
खिंच गया
बुद्ध को चिंतित देख
शर्म की जमीन पर खड़े बूढ़े पठान ने कहा :
भारत आपके लिए ठीक जगह है भगवन्
नहीं भंते
हथियारों के पीछे पागे हैं वहां के शासक भी
बहुत छद्म और पाखंड है वहां
मानवता के संहार का उपाय कर
वे कहते हैं : मैं मुस्करा रहा हूं
इसके बाद खामोश रहे दो दुख
सहसा खान अब्दुल गफ्फार खां का ध्यान हटा
उन्होंने सूखे आसमान की तरफ नजर फिराई
लगा जैसेकिसी बाज के फड़फड़ाने की आवाज आई हो
मगर चुंधियाती धूप मे कुछ दिखाई नहीं पड़ा
फिर उनका ध्यान लौटा उस जगह
जो तीन दिन पहले हमेशा के लिए खाली हो गई थी
वहां न बुद्ध के होने का स्वप्न था न उनके शब्दों का अर्थ
खान अब्दुल गफ्फार खां खड़े थे अकेले
बामियान के पथरीले सन्नाटे में

Saturday, June 7, 2008

संगठन व साइंस की एका से किसानों का भला

कन्याकुमारी से कश्मीर तक के किसानों का एक ही दर्द है। वह यह कि दुनिया भर में उत्पादित सामानों की कीमत तय करने का अधिकार तो उनके उत्पादकों का होता है जबकि उनके द्वारा पैदा किए जानेवाले अनाजों का मूल्य खरीदनेवाला अपनी मर्जी से तय करता है। उन्हें इस बात का भी दु:ख है कि कहने को तो वे आजाद देश के नागरिक हैं पर एक चिट्ठी पर उनकी जमीन छीन ली जाती हैं।

जमीनों को लेकर जो कानून अंग्रेजो ने बनाए थे, आज की सरकार उसी कानून पर चल रही है। देश में कृषि के लिए कोई कानून नहीं है और न इसपर आधारित कोई उद्योग। आज तक उनके उत्पादों की खरीद-बिक्री के लिए कोई सहकारी समिति तक नहीं बनायी गयी हैं और न ही उन्हें उत्पादों का सही मूल्य ही मिल पाता है। किसानों का मानना है कि बिना उनका राष्ट्रव्यापी संगठन बने उनकी बात कोई सुननेवाला नहीं है और विज्ञान व तकनीक का किसानोन्मुखी बनें बिना उसका फायदा उन्हें मिलनेवाला नहीं। उनका कहना है कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन पर आज बहुत बहस-मुबाहिसा हो रहा है जबकि उन्होंने इस तरह के जलवायु परिवर्तन को रोज झेला है। लेकिन इसकी कोई सुध लेनेवाला नहीं है। उनकी मांग हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तरह ही सार्वजनिक खरीद प्रणाली स्थापित होनी चाहिए, जिससे किसान अपने गांव या क्षेत्र के केंद्र पर ही अपनी जिंसों को बिना बिचौलिये के बेच और खरीद सकें। उनकी मांग है कि उनकी जरूरतों की पूर्ति और जानकारी देने के लिए एकल खिड़की प्रणाली भी स्थापित की जाए।

किसानों द्वारा व्यक्त इस तरह के विचार उस समय सामने आए जब देहरादून स्थित हेस्को नामक संगठन के प्रमुख प्रोफेसर अनिल जोशी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय दल इसी साल 12 जनवरी से 16 मार्च तक कन्याकुमारी से देहरादून तक कि `किसान साइकिल यात्रा´ पर था। प्रो। जोशी जाने-माने पर्यावरणविद है और 2006 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने 1976 से 1997 तक गढ़वाल विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र का अध्यापन किया। इसी दौरान उन्होंने अपने शोध छात्रों को लेकर 1979 मे एक संगठन बनाया और बाद में विश्वविद्यालय से इस्तीफा देकर देहरादून के पास शुक्लापुर गांव में संगठन का काम कर रहे है। जोशी का कहना है कि संगठन और साइंस को जोड़ कर ही देश और किसानों का भला हो सकता है।

अपनी या़त्रा का विवरण देते हुए जोशी बताते है। कि लगभग हर जगह किसानों ने एक ही मांग की कि देश में एक कृषि कानून बने, वाटर बॉडी एक्ट बने और कृषि को संघ सूची में रखा जाए। किसान पानी की समस्या के निपटने के लिए तालाबों का उद्धार और उसका उपयोग सुनिश्चित करना चाहते हैं जिसमें सरकार सहायता और नीति का सहयोग मिलना आवश्यक है। वे एक किसान बैंक भी चाहते हैं जो उन्हें बीज खाद से लेकर हर तरह की जानकारी और ऋण प्रदान करे।

जोशी अपना अनुभव बताते हैं कि केवल सेज के कारण ही नहीं, बल्कि हाईवे के कारण भी बड़ी मात्रा में कृषि जमीन घटी है। हाईवे के किनारे की लगभग जमीन रिएल इस्टेट में चली गयी है। किसानों की मांग है कि अगर जरूरी कारणों से उनकी जमीन उद्योगों के लिए ली जाती है तो उन्हें नगद मुआवजा देने के बजाये उन उद्योगों में शेयर दिया जाए।

किसानों ने रास्ते में बताया कि कृषि क्षेत्र में आ रही समस्या और खाद्यान्न की कमी अब केवल किसान की समस्या नहीं रही बल्कि यह आम आदमी की समस्या बन गयी है। वह भारत हो या हैती-सेनेगल, हर जगह कृषि क्षेत्र में आ रही समस्याओं और नुकसान का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा हैं। उन्होंने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश से लेकर कश्मीर और उत्तराखंड के किसानों के बातचीत के आधार पर बताया कि उन्हें कृषि ऋण माफी की बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिला है और समर्थन मूल्य जेसी सरकारी योजनाओं से उनका कोई लेना-देना नहीं, क्योंकि देश का 79 फीसदी किसान सीमांत है जो बहुत कम ही अपना अनाज बेचता है। बेचता भी है तो उसकी मजबूरी देख व्यापारी अपनी कीमत पर उसे खरीदते हैं, जो समर्थन मूल्य से आधी तक होती है।

Thursday, May 22, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य 4

पहली किस्त, दूसरी किश्त, तीसरी किस्त

समाजवादी विचारक सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा 11 मई को आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र के पुन: सक्रिय होने के मौके पर आयोजित संगोष्ठी में प्रस्तुत पर्चे की चौथी व अंतिम किस्त

अगर हम अपनी संप्रदायवादी (Sectarian के अर्थ में) दृष्टि से ऊपर उठकर विचार करेंगे तो पाएंगे कि मानव श्रम की गरिमा जो माक्र्स के मूल्य के श्रम सिद्धांत का आधार है, वही गांधी की के `ब्रेड लेबर´ का भी आधार है और गांधी का अंतिम आदमी आज माक्र्स के सर्वहारा का असली प्रतिनिधि है। वर्तमान अत्यधिक स्वचालित और कंप्युटरीकृत प्रतिष्ठानों में काम करनेवाला कुशल मजदूर नहीं।

तो फिर आज समाजवाद की चुनौती यह है कि आधुनिक उद्योग और सामाजिक व्यवस्था में हासिये पर डाल दिया गया मजदूर व्यवस्था के केंद्र में फिर कैसे आएगा। इसके लिए कैसे सामाजिक बदलाव और नयी संरचनाओं की जरूरत होगी।

यह परिवर्तन युगान्तरकारी होगा और संसार भर में व्यवस्थाओं में जमे हुए निहित स्वार्थों और उन्हें कायम रखनेवाले संस्थाओं के संगठनों को तोड़ने की जरूरत होगी। पिछले हिंसक क्रांतियों के नतीजों को देखते हुए इस नयी क्रांति को अहिंसक होना होगा लेकिन राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन के संकल्प के साथ।

अहिंसक परिवर्तन के सबसे सशक्त औजार लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया के भरपूर इस्तेमाल को विशाल पैमाने पर सिविल नाफरमानी और सत्याग्रह जैसे संघर्षों से जोड़ना होगा। जो वास्तव में गांधी के आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध हैं उन्हें गांधी के जीवन एवं विचारों को रामलीला और कृष्णलीला की तर्ज पर Ritual (कर्मकांड) बनाने की जगह समाज में सशक्त हस्तक्षेप का हथियार बनाना होगा। माक्र्सवादियों को तो अपने Mind set को आमूलचूल रूप से बदलना होगा। अगर इस दिशा में पहल नहीं हुई तो दोनों ही विचार के लोग वर्तमान चुनौतियों के लिए अप्रासंगिक हो जाएंगे और अपने अलग-अलग जप-जाप में जीवन गुजार देंगे। इधर मानवीय संबंधों के अवमूल्यन और पर्यावरण के क्षय से संसार विनाश की ओर जाएगा।

Tuesday, May 20, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य 3

पहली किश्त और दूसरी किश्त क्रमश:

जो बात पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था को सभी पूर्ववर्ती उत्पादन व्यवस्थाओं से अलग करती है, वह है उत्पादन का आवश्यकताओं से निर्भरता से मुक्त हो जाना। सभी पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं मे चाहे वह कबिलाई, चाहे नगर राज्य चाहे सामंत रही हो, उत्पादन समाज की किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए होता था। चाहे यह आवश्यकता आमजन की हो या अभिजन की। मसलन सामंतो के साज-सज्जा, आभूषण, तख्त-ताज या बख्तर की। आवश्यकता पूर्ति हो जाने पर उत्पादन पर विराम लग जाता था।

लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का एक मात्र लक्ष्य उत्पाद की बिक्री और उससे मुनाफा कमाना होता है। इससे पुरानी कहावत के विपरीत जिसमें आवश्यकता को अविष्कार की जननी माना जाता था, पूंजीवादी व्यवस्था का एक बड़ा उद्यम आवश्यकताओं का आविष्कार है। इसके लिए बड़ी- बड़ी प्रयोगशालाएं अरबों रुपये के खर्च से कार्यरत रहती हैं। चूंकि यह आवश्यकताएं जीवन की किसी मूलभूत जरूरतों को पूर्ति नहीं करतीं, कभी भी इनके उत्पादन पर विराम नहीं लग सकता। कहीं-कहीं ये वस्तुएं जहरीली और घातक भी होती हैं, जैसे तम्बाकू या ठंडे पेय। प्राय: ये आदत डालनेवाली होती हैं, इससे इनकी मांग पर कभी विराम नहीं लगता। अन्ततोगत्वा, चूंकि इनके उत्पादन मे धरती के संसाधनों का इस्तेमाल करना होता है। इन सबका अंतिम परिणाम होता है पर्यावरण का क्षय और स्वयं मानव अस्तित्व का संकट।

दूसरी ओर व्यवस्थापकों और श्रमिकों के बीच घोर विषमता फैल गयी है। यह विषमता देशों, क्षे़त्रो और प्रत्येक क्षेत्र के वर्गों के बीच बढ़ी है। और यह सब उन्मुक्त पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर हो रहा है, जो कम से कम तात्कालिक रूप से उनके द्वारा भी अपनायी जा रही है जो क्रांतिकारी कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी होने का दावा करते रहे हैं। वे वही पुराना राग आज भी अलाप रहे हैं कि पूंजीवाद स्वयं वह आर्थिक आधार तैयार कर रहा है जिस पर समाजवाद की इमारत खड़ी होगी।

लेकिन पूरे परिदृश्य पर नजर डालने पर एक बात स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के तानाबाना की विशालता स्वयं संसाधनों और पर्यावरण के संकट का सबसे बड़ा कारक बन गयी है। फिलहाल कार्बन डायआक्साइड के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत मोटर वाहनों एवं हवाई जहाज का यातायात है। ये दोनों ही सीधा आर्थिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और राजनीतिक संबंधों, (जिनके साथ हथियारों की होड़ भी जुड़ी है) के फैलाव के नतीजे हैं।

इसका विकल्प फिर छोटी और स्वायत्त आर्थिक एवं राजनीतिक इकाइयों की ओर लौटना होगा। यहां पर गांधी की उस दस्तक पर विचार करने की जरूरत हो जाती है, जिसकी शुरू में (प्रथम किश्त देखें) चर्चा की गयी है। यह विचार करने का विषय है कि क्या नये समाजवादी आंदोलन में गांधी और मार्क्स के समन्वय का आधार तैयार हो रहा है ?

... जारी

Monday, May 19, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं, नये लक्ष्य २

पहली किश्त क्रमश:

यह मोटामोटी माना जाता था कि उत्पादन की तकनीक या तकनीक की दिशा वही होगी जो पूंजीवाद ने विकसित की है। सिर्फ स्वामित्व और उत्पादित वस्तुओं के वितरण की व्यवस्था बदलेगी स्वामित्व सामाजिक होगा और वितरण पूर्ण समता पर आधारित।

लेकिन न तो उन देशों में जहां समाजवादी बदलाव के लिए हिंसक क्रांतियां हुई और न पश्चिमी यूरोप की संपन्न अर्थव्यवस्थाओं में, जहां चुनावी प्रक्रिया से समाजवादी पार्टियां सत्ता में आईं और समाजवाद की दिशा में परिवर्तन का प्रयास किया, समतावादी समाज स्थापित करने में विशेष सफलता मिल पायीं। जहां हिंसक क्रांतियां हुईं, वहां तो घोर तानाशाही पैदा हुई और इसमें जिनके हाथ में अनियंत्रित सत्ता आयीं उन्हें अनियंत्रित सुविधाएं भी मिलने लगीं। जहां चुनाव प्रक्रिया से समाजवादी कहे जानेवाले लोगों को सत्ता मिली, वहां संपत्ति के समाजीकरण के प्रयास आधे-अधूरे ही हुए और पार्टी के शीर्ष पर स्थापित समूह और राज्य की नौकरशाही मे विशिष्ट स्थान बनाये लोगों की सुविधाएं और आय काफी बढ़ गयीं। समता का लक्ष्य तो गौण ही होता गया। पर इससे भी बढ़कर चिंता की बात थी उत्पादन की दिशा जो अंतत: पर्यावरण के संकट की जनक बनी और अंतहीन विकास की कल्पना भी कोरा सपना लगने लगी।

परिवर्तन के लिए किये गये प्रयासों की स्थितियों यथा हिंसक क्रांतियों के साथ केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में सत्ता के केन्द्रीकरण या तानाशाही रूझान के अलावा दो कारक और थे जिनसे क्रांतियां अपने लक्ष्यों से दूर होती गयीं। एक तो स्वचालन और कम्प्युटरीकरण के कारण श्रमिकों के काम की समान स्थिति की जगह मजदूरों या कर्मचारियों में ही अत्यधिक सोपानवत (Hierarchical) व्यवस्था में विभाजन हो गया। इससे व्यवस्थापकों का महत्व उद्योगों और विनिमय दोनों ही स्तर पर अत्यधिक बढ़ गया। इसी अनुपात में आय और सुविधाओं के बंटवारे में भी अत्यधिक विषमता आ गयी। आज जिस तरह की आय कम्युटरीकृत व्यवस्था के चलते प्रबंधकों को मिल रही है वह पहले कल्पना से परे थी। अगर श्रमिकों और प्रबंधकों की भूमिका में यह गैर बराबरी निहित हो तो इस तरह के श्रम विभाजन में समता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसमें संपत्ति के स्वामित्व की भूमिका कुछ खास नहीं होती। प्राय: स्वामित्व और प्रबंधन एक ही व्यक्ति या समूह के हाथ मे होता है। विशाल धन अर्जन करनेवाली अनेक संस्थाएं तो सिर्फ प्रबंधन के ही व्यवसाय में लगी होती हैं। प्राय: इनमें अनेक काम सेवा क्षेत्र में आते हैं- मसलन बैंकिंग या होटल। इनमें अत्यधिक आय होती है लेकिन कार्यरत लोगों की संख्या अपेक्षातया बहुत कम होती है। अगर पूरी व्यवस्था ऐसी संस्थाओं के साथ में हो तो पूर्ण समता की कोई कल्पना नहीं कर सकता। लेकिन जो सबसे मारक स्थिति है वह पूंजीवादी उत्पादन के मूलभूत चरित्र में है।

.... जारी

Sunday, May 18, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य

मुजफ्फरपुर में 1965 में आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र की स्थापना की गयी थी। उस समय कांग्रेसी सरकार के आतंक इतने बढ़ गये थे कि लोग उसे अघोषित इमरजेंसी की तरह आज भी याद करते हैं। मुजफ्फरपुर में राजनीतिक आंदोलनों के केंद्र आर. डी. एस. कॉलेज में 10 दिसंबर 1966 को हुई पुलिस फायरिंग में गुरु-शिष्य शहीद हो गए थे। उस समय समाजवादी आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए एक तरह से संवाद केंद्र और शरण स्थली के रूप में उपयोग होता था इस केंद्र का। आंदोलन के पर्चे पोस्टर के अलावा यहां से कई महत्वपूर्ण प्रकाशन भी हुए। लेकिन बाद में समय के साथ यह निष्क्रिय हो गया। हाल ही में प्रोफेसर उदय शंकर जी ने इस केन्द्र को पु्नर्जीवित करने की पहल की और इसका फिर से शुभारंभ किया गया। 11 मई को इसकी उद्घाटन संगोष्ठी आयोजित की गयी, जिसमें 50 से अधिक लोग खासकर युवा उपस्थित थे। इस संगोष्ठी को समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा ने संबोधित किया। वर्तमान संदर्भ में समाजवाद का उपयोग और उसकी प्रासंगिकता पर उन्होंने एक संक्षिप्त नोट यहां पढ़ा। यहां हम 11 मई को प्रस्तुत संक्षिप्त नोट को किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं।

आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र की पुनर्स्थापना को हमें समाजवादी आंदोलन की नयी स्थापनाओं के साथ जोड़ना चाहिए। आचार्य नरेन्द्रदेव मा्र्क्सवादी थे और उनके या जेपी के प्रभाव में हमारी पीढ़ी के समाजवादियों ने समाजवाद का प्रथम पाठ मार्क्सवादी परंपरा में ही लिया था। इसमें शुरू करते थे स्वप्नवादी समाजवाद से फिर इस प्रक्रिया की परिणति वैज्ञानिक समाजवाद से और फिर सोवियत यूनियन या अन्यत्र इसमें जो विकृतियां आयीं, उनको क्रांति, देश और समाज की विशेष स्थितियों से जोड़कर समझने की कोशिश करते थे। आचार्य नरेन्द्रदेव केंद्र से ही प्रकाशित मेरी पुस्तक `समाजवाद के बढ़ते चरण´ में भी इसी परंपरा में समाजवादी आंदोलन और बाद की इसकी विकृतियों को समझने की कोशिश है।

इस पुस्तक के आधार में मूलत: मार्क्सवादी मान्यताएं हैं लेकिन गांधी के विचारों की दस्तक भी यत्र तत्र सुनी जा सकती है। मार्क्सवादी विचार की एक मूल स्थापना थी कि पूंजीवाद अपने विकास के क्रम में उत्पादन की वह व्यवस्था स्थापित करेगा जिसके आधार पर समाजवादी समाज की ओर संक्रमण होगा। समस्या एक ही रहेंगी, उत्पादन के साधनों पर से पूंजीवादी स्वामित्व को समाप्त करना। इसके साथ ही गैर-बराबरी, वर्गीय वर्चस्व और फिर शोषण की व्यवस्था को कायम रखने वाली राज्य व्यवस्था का विघटन शुरू होगा और एक ऐसा समाज बनेगा जिसमें सभी क्षमता के हिसाब से काम करेंगे और सबको आवश्यकता के हिसाब से आपूर्ति होगी।
.... जारी

Tuesday, April 29, 2008

पहले यह दीवार तो गिरे

गुवाहाटी से शिवसागर जाते समय नेशनल हाईवे के दाएं किनारे लंबी-ऊंची दीवार के बारे में पूछने पर सहयात्रियों ने बताया कि यह मेघालय और असम के बीच खड़ी की गई दीवार है। पूर्वोत्तर में इस तरह की स्थितियों को लोग वहां के परिप्रेक्ष्य में सामान्य घटना मान सकते हैं। लेकिन पिछले दिनों महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक गांव में इसी तरह की स्थिति दिखी, जो काफी गंभीर है।

भीमनगर और दरे नामक गांवों में इसी तरह की दीवार बनाई गई है। यह दीवार दो गांवों के बीच आपसी रंजिश के कारण नहीं बल्कि एक गांव के दलित होने के कारण खड़ी की गई है। जब कोयना बांध बन रहा था तो वहां से विस्थापितों को बसाने के लिए भीमनगर बसाया गया था। शुरू में यहां कुछ दलित परिवार ही थे। बाद में यहां मराठों को लाकर बसाया गया। इसके बाद दलितों के पास वाले हिस्से का नाम दे दिया गया दरे और यहां मराठे आ गए। दलितों की कम्युनिटी हॉल को भी दरे में कर लिया गया। अब दरे के मराठों ने दलित बस्ती भीमनगर को अलग करने के लिए 10 फीट ऊंची और करीब 150 फीट लंबी दीवार खड़ी कर दी है। इसके बारे में मराठों की ओर से बताया गया है कि स्कूल के मैदान की रक्षा के लिए दीवार बनाई गई है, लेकिन यह केवल बहाना है।

यह तो सतारा के एक गांव की घटना है लेकिन अगर हम गौर से देखें तो पूरे देश में समाज का कमोबेश यही हाल है। देश को एक करने के लिए पहले इन बांटनेवाली दीवारों को गिराने की जरूरत है। चाहे वह मेघालय और असम के बीच हो या दरे व भीमनगर के बीच।

Monday, April 28, 2008

मौत के नाले

देश भर में गंदे नालों की सफाई में लगे नगर निगमों के कर्मचारियों की दशा सुधारने के काम में लगी एक संस्था नेशनल कंपेन फॉर डिग्निटी एंड राइट ऑफ सीवेज वर्कर्स ने पिछले महीने दिल्ली में जन सुनवाइयों का आयोजन किया। इनमें नाले साफ करनेवाले बहुत से कर्मचारी शामिल हुए और उन्होंने अपनी परेशानियां भी बतायीं। संगठन और कुछ दूसरे सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों के आधार पर कुछ सरकारी त्रुटि तो कुछ इन कर्मचारियों की लापरवाही की बातें भी की।

राजधानी के चारों दिशाओं में पहले जन सुनवाई के बाद इनका निष्कर्षात्मक सम्मेलन गांधी शांति प्रतिष्ठान में 6 अप्रैल को हुआ। इस बारे में हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रकार निवेदिता खांडेकर की एक रिपोर्ट अखबार में प्रकाशित हुईं। यह रिपोर्ट निवेदिता ने मुझे मेल किया है। इससे पहले की दो जन सुनवाइयों में मैं खुद भी शामिल हुआ था। इससे पहले भी गुजरात हाईकोर्ट के इस संबंध में दिशा-निर्देश वाले फैसले के आलोक मे दो लेख मैंने जनसत्ता में लिखे थे। तीसरा लेख यहां ब्लॉग पर प्रकाशित किया था। इस बार प्रस्तुत है विभिन्न जन सुनवाइयों और निवेदिता की रिपोर्ट पर आधारित यह संक्षिप्त पोस्ट।

सीवेज वर्कर्स को एक प्लेटफार्म मुहैया कराने के उद्देश्य से उक्त संस्था ने राजधानी के विभिन्न इलाकों में जो जन सुनवाइयां आयोजित की उनमें शामिल होने आए सीवेज कर्मियों ने अपनी समस्याओं और इस खतरनाक काम के माहौल को विस्तार से प्रस्तुत किया। दुखद बात यह है कि अनेक बार दिशा निर्देश जारी होने के बावजूद इन कर्मियों को सुरक्षा उपकरण नहीं दिए जाते और ये लोग मूलभूत मानवीय सम्मान, स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन यापन के मौलिक अधिकारों से भी वंचित किए जाते हैं।
इस संस्था ने दिल्ली के डाबरी इलाके में 2006 में तीन मजदूरों की सीवर के अंदर हुई मौत के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में 2007 में एक जनहित याचिका दायर की थी। दिल्ली जलबोर्ड ने इस याचिका पर अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि पिछले दो सालों में सीवरो में 36 कर्मियों की मौत हुई हैं। लेकिन संस्था की समन्वयक हेमलता कंसोटिया के अनुसार असल में प्रति वर्ष केवल दिल्ली में 100 सीवर कमीZ अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। उनका कहना है कि अधिकारी केवल उन्हीं मौतों को सीवर मौत मानते हैं जो सीवर के अंदर काम करते हुए होती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अनेक कर्मी सीवर में घुसने के कारण हुई दूसरी तरह की बीमारियों से भी मर जाते हैं। इनमें जहरीली गैंसों से होनेवाली स्वास्थ्य की क्षति और संबंधित अन्य बीमारियों के कारण हुईं मौतें भी नहीं गिनी जातीं।

दिल्ली असंगठित मजदूर यूनियन के महासचिव मोहम्मद अमजद हसन गुजरात हाईकोर्ट के दिशा निर्देश को इस दिशा में मील का पत्थर मानते हैं, लेकिन जरूरत इसके लागू करने की हैं। कर्मियों और इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के अनुभवों से जो बातें निकल कर आई, उनमें प्रमुख यह थी कि कर्मियों को सीवर में उतरते वक्त कई सुरक्षात्मक उपकरण उपलब्ध कराएं जाएं और सीवर के लिए कई बातों की जानकारी भी उन्हें देकर निगमों द्वारा उसका पालन कराया जाए। साथ ही 1999 से कर्मियों की खाली जगहों को भी नियुक्ति द्वारा भरा जाना चाहिए। क्योंकि समुचित संख्या में कर्मचारी न होने के कारण एक ही कर्मी को कई कर्मियों के बदले सीवर में उतरना पड़ता है जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। सुरक्षा संबंधी जागरुकता न होने के कारण 90 फीसदी से अधिक सीवर कर्मी रिटायर होने से पहले ही स्वर्ग सिधार जाते हैं। कोशिश करने के बावजूद दिल्ली जल बोर्ड के मुख्य कार्यकारी टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं हुए हैं।

Thursday, April 24, 2008

हिंसा की अप्रासंगिकता पर कुछ संदर्भ

समाजिक और राजनीतिक उद्देश्य के लिए हिंसा आम जनता के व्यापक हित में कितनी अप्रासंगिकता, निरर्थक और आत्मघाती होती है, इतिहास में इसके प्रमाण भरे पड़े हैं। मैंने कल कुछ का जिक्र भर किया था। आज यहां प्रस्तुत है समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिंन्हा की पुस्तक से कुछ उद्धरण। सच्चिदा जी ने सन 2000 में `नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट´ नामक पुस्तक लिखी थी। उसका नया संस्करण हाल में ही रोशनाई प्रकाशन, उत्तर कांचड़ापाड़ा से प्रकाशित हुआ है। इस नये संस्करण में उन्होंने दो अध्याय जोड़े हैं जिनमें से एक है `हिंसा और समाज परिवर्तन´। इसी अध्याय के कुछ प्रसंग यहां दे रहा हूं।

... कार्ल मार्क्स ने फायरबाख पर अपनी अत्यंत संक्षिप्त टिप्पणी पर बहुचर्चित थीसिस में लिखा था, `सामाजिक जीवन मूलत: व्यवहार पर आधारित है। सभी गु्त्थियां जो सिद्धांत को रहस्यवादिता की ओर ले जाती है अपना बुदि्धसंगत समाधान व्यवहार में और इस व्यवहार की समझ में पा जाती हैं।´ यह दृष्टि बिल्कुल वैज्ञानिक है और किसी अवधारणा की सत्यता को प्रयोग की कसौटी पर परखने का सुझाव देती हैं। वर्तमान राजनीति के सामने, विशेषकर उस राजनीति के सामने, जो सिर्फ सत्ता का खेल होने के बजाय अपना लक्ष्य कुछ उदात्त मूल्य बतलाती हैं, परिवर्तन का साधन हिंसक हो या अहिंसक यह समस्या इसी तरह की अनिर्णीत गुत्थी बनी हुई है। इस तरह की गुत्थी को पिछले व्यवहारों के नतीजों की रोशनी में ही सुलझाया जा सकता है। यह विचार अनेक जटिलताएं इसलिए भी पैदा करता है क्योंकि सामाजिक लक्ष्यों के अलावा व्यक्तिगत जीवन और इसमें पैदा होनेवाली स्थितियों में भी आदमी इस दुविधा में रहता है कि वह हिंसा का रास्ता अख्तियार करे या अहिंसा का।

कुछ क्रांतियों पर

.... पहली क्रांति इंग्लैंड में सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में हुई जिसमें निरंकुश राजा चार्ल्स प्रथम के खिलाफ पार्लियामेंट के अधिकारों के लिए युद्ध हुए। इसमें टैक्स लगाने के पार्लियामेंट के अधिकार से लेकर धार्मिक आजादी तक का मुद्दा जुड़ गया था। राजा के राज्य करने के ईश्वर प्रदत्त अधिकार के साथ-साथ केंद्रीय राजधर्म का सबों द्वारा पालन करने की अनिवार्यता का मुद्दा भी जुड़ा हुआ था। क्रांति में राजा की पराजय हुई और उसे मृत्युदंड दिया गया। लेकिन इस हथियारी जंग के साथ धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता भी जुड़ती गयी। अंतत: सत्ता वहीं केंद्रित हुई जहां सबल सैन्य शक्ति थी। नतीजा हुआ क्रामवेल की तानाशाही की स्थापना। .... बाद में क्रामवेल की तानाशाही के खिलापफ ऐसा जन मानस बना कि क्रांतिकारियों की सत्ता फिर समाप्त हो गयी और राजशाही अपनी अति के साथ कायम हो गयी।

.... होता यह है कि हिंसक संघर्षों से उन मुद्दों को सदा नजरंदाज किया जाता है जो लोगों की समान मानवीयता को रेखांकित करते हैं और इसकी जगह भिन्नता के तत्वों को - जैसे धर्म, रंग, रहन-सहन के तौर-तरीके, भोजन- लिबास आदि के फर्क को चिहि्नत किया जाता है, जिससे प्रतिद्वंद्वी अमानवीय या हीन मानव दिखाई देने लगते हैं। ऐसी मानसिकता में विरोधियों के अस्तित्व को मिटाने का उन्माद पैदा होता है। मूल उच्छेद (Ethnic cleansing) वर्ग शत्रुओं का उन्मूलन आदि इसी मानसिकता की अभिव्यक्ति हैं।
.... दूसरी महान क्रांति 1789 में फ्रांस में हुई। यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के तीन लक्ष्यों ने, जिसका उद्घोष इस क्रांति में हुआ, संसार में न सिर्फ अन्याय के प्रतिकार मे हुए पूर्ववर्ती आंदोलनों के लक्ष्यों को अपने में समेटा बल्कि उस आधार को भी खड़ा किया जिस पर बाद में होनेवाली क्रांतियों ने अपने उद्देश्यों को अमली जामा पहनाने की कोशिश की। ... राजा लुई सोलहवें को फांसी दी गयी और रॉब्सपियर के नेतृत्व में गरीब तबकों पर आधारित जैकोबिन का राज कायम हुआ। ... ये लोग अपना आतंक का राज स्थापित करते हैं जिसके तहत भारी संख्या में संदेह के आधार पर लोगों को गिलोटिन पर मृत्युदंड दिया जाता है। इस तरह दांते, रेमूली तथा पूर्व के अनेक नेताओं को मौत के घाट उतार दिया जाता है। लेकिन इस अति की प्रतिक्रिया होती है। ... बारा और तालिएं जैसे नेताओं द्वारा षडयंत्र कर और इसमें सैनिकों को शामिल कर रॉब्सपीयर को घेर लिया गया और घायल कर दिया गया। इसी घायल अवस्था में घसीट कर उसे भी गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया। इस आतंरिक संघर्ष में सैनिक हस्तक्षेप की परिणति हुई नेपोलियन के उदय में। ... इस तरह महान लोकतांत्रिक आदर्शों के लिए शुरू की गयी क्रांति का अंत हुआ नेपोलियन के साम्राज्य में।


..... तीसरी महान क्रांति बीसवी सदी की बोल्शेविक क्रांति थी, जिसका उद्देश्य फ्रांस की लोकतांत्रिक क्रांति से एक कदम और आगे बढ़कर समता के सिद्धांत को राजनीति से आगे बढ़ा आर्थिक क्षेत्र में भी स्थापित करने का था। ... रूस की विशेष परिस्थिति में एक बिखरी राज्य व्यवस्था के मुकाबले बोल्शेविकों की संगठित जमात ने जन मानस को अपनी ओर मोड़ सत्ता अपने हाथ में ले ली। लेकिन वे समूह जिनकी आकांक्षाएं इससे ध्वस्त हुईं थीं, इससे आहत थे और सोवियत सरकार की वैधता को नकारते हुए उन्होंने इसके खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया। इस तरह वह गृहयुद्ध शुरू हुआ जो चार वर्षों तक चला। इस दौरान प्रतिद्वंद्वियों के बंदियों को हॉस्टेज बनाने तक की नीति अपनाई गयी( प्रारंभिक दौर में इसे प्रजातांत्रिक युद्ध कहा गया। लेकिन आत्मरक्षा और विजय की लालसा ने उन्हें उन सारी मान्यताओं को ताक पर रखने को मजबूर कर दिया जिसके लिए लोकतांत्रिक क्रांति की जरूरत महसूस की जाती है। .... 1928 मे भूमि के सामूहिकीकरण की नीति अपनाई गयी। किसानों के विरोध को घोर दमन से दबाया गया। इस प्रक्रिया में विरोध करने के अपराध में लाखों किसानों को उजाड़कर दूरदराज के स्थानों पर तरह-तरह के श्रम में, लगाया गया। अनुमान है कि इसमें लगभग एक से डेढ़ करोड़ लोग भोजन की कमी या दूसरे कारणों से मर गए। आखिर में हिंसक शक्ति के बल एक आदर्श समाज स्थापित करने की परिणति हुई स्टालिन की घोर तानाशाही में।