रेंकोजी मंदिर से लौटकर
सबसे हालिया गठित न्यायमूर्ति मनोज मुखर्जी आयोग है। मुखर्जी आयोग भी संभवत: किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है। लेकिन इतना निष्कर्ष जरूर दिया कि ताइवान में 18 अगस्त 1945 को हुए विमान दुर्घटना और उसमें सुभाष बोस के जलकर मारे जाने की थ्योरी कतई स्वीकार्य नहीं है। उधर, नेताजी के रहस्यमय ढंग से गायब होने को लेकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के पास जो दस्तावेज हैं, वह ब्रिटिश सरकार 2020 के पहले सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है। इस कारण नेताजी के बारे में संदेह के बादल लगातार गहराते ही रह गए।
रेंकोजी मंदिर में रखा सुभाष बोस का कथित अस्थि कलश (मंदिर आकार के सुनहले बक्शे में)इस तरह के तमाम बवंडरों से बिल्कुल अप्रभावित टोक्यो से करीब 200 किलोमीटर पश्चिम स्थित सुगीनामी इलाके में स्थित छोटे से लेकिन भव्य रेंकोजी मंदिर में रखे एक अस्थि कलश को जापान को मोचीजुकी परिवार अनवरत इस विश्वास के साथ सेवता आ रहा है कि यह कलश द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की सहायता से धुरी राष्ट्रों की ओर से मित्र राष्ट्रों पर जबर्दस्त हमला बोलनेवाले महान योद्धा की अस्थियों से भरा है। इलाका बिल्कुल शांत और आवाजाही की भीड़भाड़ से अलग है। मंदिर दो तले का बना है जिसमें प्रवेश करते ही सुभाष बोस की आवक्ष प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इसके बगल में दीवार पर लगी पट्टी में प्रथम राष्ट्रपति डॉ। राजेन्द्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के संदेश खुदे हैं। अंदर मंदिर में बुद्ध की प्रतिमा है और एक तरफ सुभाष बाबू की अस्थि कलश र्षोर्षो मंदिर के रूप में पूजित है, जिसके आसपास विभिन्न मुद्राओं में इस महान नेता की कई फोटो लगी हैं।
वर्तमान में मंदिर के पुजारी 35 वर्षीय क्योजेन मोचीजुकी हैं, जिन्होंने इसी साल फरवरी में यह पद संभाला है। इसके पूर्व इनके पिताजी निचिको मोचीजुकी थे और उनसे पहले इनके दादाजी क्योई मोचीजुकी। क्योजेन ने बताया कि जब ताइवान से यह अस्थि कलश लेकर जापानी सेना आयी तो उनके दादाजी ही यहां थे। संभवत: वह अस्थि कलश के साथ ही आए थे।
जब हम भारतीय पत्रकारों के दल ने जापानी मेजबानों को इस मंदिर के बारे में बताया तो वे अनभिज्ञ थे। लेकिन उन लोगों ने तत्काल इंटरनेट से सुभाष बोस और मंदिर का पूरा प्रोफाइल निकालकर हमें रास्ता तक बता दिया। साथ ही वहां तक जाने के लिए साथ हाशीमाशा मिजोगुची को कर दिया जो हमारे जापान भ्रमण के गाइड भी थे। इस मंदिर की यात्रा के बाद यद्यपि सुभाष बोस के गुम होने के बारे में हमारी जिज्ञासा जरा भी कम नहीं हुई लेकिन मन में एक संतोष का भाव और जापान यात्रा की सार्थकता का भाव भरा हुआ था।
हिन्दुस्तान १८-०८-०९




