Saturday, May 30, 2009

आम चुनाव के नतीजों से मिले संकेत - अंतिम

पहला भाग दूसरा भाग तीसरा भाग चौथा भाग पांचवा भाग

आचार्य नरेन्द्र देव से शुरू होकर डा. राममनोहर लोहिया तक समाजवादी आंदोलन अपने सही दिशा में रहा लेकिन लोहिया के जीवन काल में ही पार्टी में खुली सदस्यता के कारण तमाम अवांछित तत्व संगठन पर हावी हो गए। इसका परिणाम हुआ कि 1967 में लोहिया के निधन के बाद ऐसे ही तत्व संगठन की सत्ता में अनेक प्रकार के अनैतिक और अवैध हथकंडे अपनाकर हावी होते गए। इसमें सबसे सुगम रास्ता उन्हें जाति की राजनीति लगी और चूंकि उनमें किसी नीति-सिद्धांत के प्रति कोई प्रतिबद्धता न के बराबर थी। संगठन के स्तर पर कार्यकर्ताओं को ऐसी नीतियों का पाठ पढाने का काम भी लोहिया के बाद ही समाप्त हो गया। कम्युनिस्टों में यह काम कुछ और दिनों तक चला लेकिन वर्तमान में वहां भी प्रिशक्षण शून्य ही है। जब मैंने इस बारे में अपने भाकपा माले के एक मित्र से चर्चा की तो उन्होंने माले में भी इस तरह की चर्चा न के बराबर होने की बात ही कही।

उपरोक्त विश्लेशण से तथ्य उभर कर आ रहे हैं कि आम तौर पर पूरे देश में और खासकर उत्तर में परिवर्तनवादी जनाधारित राजनीति के लिए पूरा मैदान खाली है। इस दिशा में काम करनेवाला कोई भी बड़ा या छोटा प्रभावी दल नहीं है। हां, इन छोटे और स्थानीय स्तर पर कई छोटे-संगठन और समूह सक्रिय हैं, जिनका आकार और क्षमता और स्रोत बहुत दुर्बल होने के कारण प्रभाव बहुत कम है। इस तरह के छोटे समूहों में आपसी तालमेल का अभाव रहता है। स्वच्छ और पारदर्शी राजनीति करने के कारण इनके पास साधनों और प्रिशक्षित सैद्धांतिक कार्यकर्ताओं का भी अभाव रहता है। लेकिन सिद्धांतहीनता- मूल्यहीनता और नीति विहीनता से उपजे रिक्त स्थान को भरने का क्षमता इन्हीं में हैं। इसके लिए जरूरी है ऐसे लोकतांत्रिक, नैतिक, समाजवादी- वामपंथी धारा में स्वच्छ और पारदशीZ राजनीति करनेवाले समूहों को निजी अहम से ऊपर उठकर एकजुट होने की। एकजुट होने पर इनके कर्मों और जन संघर्षों के बूत जनता के बीच इनकी विश्वसनीयता निश्चित तौर पर बढेगी और स्थापित राजनीति के बरक्श एक वैकल्पिक राजनीति को दिशा मिल सकती है।

निष्कर्ष के तौर पर हम पाते हैं कि निकट भविष्य में स्थापित राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने पर आनेवाले खाली पने को भरने के लिए देश में छोटे स्तर पर सक्रिय तमाम परिवर्तनवादी ताकतों को एकजुट होकर इससे मुकाबले को कमर कसना होगा। इसमें सभी लोकतांत्रिक वामपंथी धाराओं को भी शामिल करने की जरूरत है। इससे जातिवादी, सिद्धांतविहीन राजनीति के दलदल में फंसी जनता को निजात मिलने की उम्मीद बनेगी। तभी देश में एक सक्षम विकल्प को भी तैयार किया जा सकेगा। वर्तमान स्थिति में नीतिगत राजनीति के लिए काफी जगह है और ये परिवर्तनवादी धाराएं मिलकर जनांदोलन चलाती हैं तो देश की राजनीति की दिशा-दशा को अगले कुछ सालों में पलट कर उसे सकारात्मक दिशा में ले जाया जा सकता है।
समाप्त

Friday, May 29, 2009

आम चुनाव से मिले संकेत- पांच

पहला भाग दूसरा भाग तीसरा भाग चौथा भाग

लेकिन इन प्रदेशों में सबसे चिंतित करनेवाली बात जो दिखाई दे रही है, वह परिवर्तनवादी -प्रगतिशील धारा का अंत है। यह कोई जनता की इच्छा के कारण नहीं बल्कि इन धाराओं की आपसी नालायकी की वजह से हुआ है। बिहार में शुद्ध रूप से जातिवाद की राजनीति पर आधारित लालू को 15 साल तक समर्थन देकर वहां की जनाधार वाली भाकपा ने अपने को मटियामेट कर लिया तो उत्तर प्रदेश में भी उसकी बची-खुची ताकत का अंत उसी तरह की राजनीति करनेवाले मुलायम सिंह को समर्थन के कारण हुआ। बिहार में वामपंथ के नाम पर भाकपा-माले है लेकिन उसकी पहचान एक क्षेत्रीय तौर पर ही है और उसकी विश्वसनीयता न के बराबर है। उधर लोहिया के समाजवाद और जयप्रकाश आंदोलन के गर्भ से निकले लालू- मुलायम की पार्टियां पूरी तरह जातिवाद और भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी हैं। इन पार्टियों पर कारपोरेट घरानों, उद्योगपतियों, उनके एजेंटों और सत्ता के शुद्ध दलालों का कब्जा हैं।

इसके साथ ही इस चुनाव में दूसरी चिंता की बात यह रही कि पूरे प्रचार अभियान के दौरान शासन-प्रशासन में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार, कुशासन, देश में बढ़ती महंगाई, गरीबी, किसानों की बदहाली, मजदूरों का विभिन्न स्तरों पर होनेवाला शोषण, मंदी के कारण नौकरियों से हो रही छंटनी और बेरोजगारी कोई मुद्दा नहीं बना। न तो राजनीतिक दलों के स्तर पर और न ही जनता के स्तर पर। जनता से दबाव न बनने के कारण ही विपक्षी दलों ने भी इन मुद्दों को उठाने की जहमत नहीं दिखाई।

जानने वाले जानते होंगे कि कभी उत्तर भारत में कम्युनिस्ट-सोसलिस्ट आंदोलन की आंधी थी। इस आंदोलन के मूल में जनता के मुद्दे जैसे महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय और भ्रष्टाचार हुआ करते थे। `दाम बांधो काम दो´, संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ´ जैसे लोकप्रिय नारों की गूंज चुनावों में आम थीं। 1967 में इसी आंधी की चपेट में कई राज्यों में कांग्रेस की जड़ उखड़ी और संविद सरकारें सत्ता में आयी। लेकिन यह धारा चिरस्थायी नहीं रह सकी। इसका कारण भी इसी आंदोलन की जड़ में विद्यमान है। तब की सोशलिस्ट पार्टी ने हिन्दी प्रदेशों में पिछड़े- दलितों को राजनीतिक अधिकार दिलाने, उन्हें सत्ता के मुख्य केंन्द्र तक पहुंचने और सामाजिक बराबरी के लिए प्रेरित किया और संघर्षशील तो बनाया लेकिन इस क्रम में उन्हें सिद्धांतों की कसौटी पर कसने और उसकी धार देने का कोई प्रयास नहीं किया।
.... जारी

Thursday, May 28, 2009

आम चुनाव से मिले संकेत- चार

उत्तर प्रदेश में चमत्कार के स्तर पर जाकर कांग्रेस ने अपनी जड़ फिर से जमाई है। राहुल गांधी की करिश्माई छवि का जो सर्वाधिक चारणगान हो रहा है, वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सतही पुनर्वापसी को ही देखकर ही हो रहा है। कांग्रेसी नक्कारखाने में इस झूठ का इतना शोर है कि सच्चाई यहां तूती की आवाज साबित हो रही है। सच्चाई जब खुलेगी तब सामने आएगा कि जिन क्षेत्रों में कांग्रेस का वोट बढ़ा है और सपा या बसपा का वोट घटा है, उन सबके पीछे राज्य की एक शख्सियत - पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह रहे हैं।

कल्याण सिंह को साथ लेकर समाजवादी पार्टी ने अपनी परंपरागत मुस्लिम वोट खोया तो वरुण गांधी के मुस्लिम विरोधी भाषणों के कारण भी मुसलमानों को सपा से अधिक सुरक्षित जगह कांग्रेस में ही दिखी। यही कारण रहा कि बिना मांगे ही कई क्षेत्रों में कांग्रेस को वोट मिल गए। यह वोट स्थायी न होकर क्षणिक भय से उपजा और नकारात्मक रहा है। भाजपा को यहां वरुण और नरेन्द्र मोदी अपने जहरीले भाषणों से कोई मदद नहीं कर पाए और न ही भाजपा की अपनी राम मंदिर की रणनीति काम कर पायी। हरियाणा, पंजाब में भी कांग्रेस का मुकाबला क्षेत्रीय दलों अकाली दल और इंडियन नेशनल लोकदल से रहा और यहां कांग्रेस ने अपनी शक्ति को बढ़ाया है। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जिस तरह से दो ध्रुवीय राजनीति है उसमें अलग से किसी ताकत के अनायास उभरने की कोई संभावना पहले भी नहीं थी।

कुल मिलाकर इस बार मतदान में जनता ने जातिवादी, सांप्रदायिक, ब्लैकमेंल करनेवाले और क्षेत्रवाद पर राजनीति करने वालों को नकारा है। बिहार में इसी बूते पिछले दो दशकों से सत्ता पर छाए लालू प्रसाद यादव का पराभव हुआ तो राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी पूरी तरह से नेस्तनाबूद हो गयी। उत्तर प्रदेश में सर्वजन की होने का दम भरनेवाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी केवल तीन साल पूर्व ही खुद को प्राप्त 210 विधानसभा सीटों के आंकड़े के आधे को भी इस लोकसभा में नहीं प्राप्त कर सकी। उसे मात्र 20 सीटें मिली हैं। इसी तरह समाजवादी पार्टी की सीटें पिछले लोकसभा चुनाव मे मिली 40 सीटों के मुकाबले आधे के करीब ही रह गयीं। सपा ने 23 सीटें जीतीं। (उत्तर प्रदेश में एक लोकसभा सीट के दायरे में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं)। भाजपा किसी तरह सांप्रदायिक आग भड़काकर अपनी पिछली संख्या को कायम रख सकीं।

प्रदेश में कांग्रेस की अप्रत्याशित वापसी हुई है, जिसका कारण हम ऊपर बता आए हैं कि यह वोट नकारात्मक, बाबरी मिस्जद के विध्वंसक कल्याण सिंह की सपा से दोस्ती और वरुण-नरेन्द्र मोदी के आग उगलने की प्रतिक्रिया में था। बिहार-उड़ीसा में नीतीश कुमार और नवीन पटनायक को मिला जनसमर्थन विकास और उनकी व्यक्तिगत सौम्य छवि पर है। भाजपा की सहयोगी होने के बावजूद नीतीश को वामपंथी पार्टियां तक धर्मनिरपेक्ष कह चुकी हैं तो कंधमाल कांड के बाद भाजपा से पल्ला झाड़ चुके नवीन को वामपंथी पार्टियों ने समर्थन भी दिया था। कुल मिलाकर जनता ने साफ कर दिया है कि वह अब ऐसे उल जलूल की ओछी राजनीति के नाम पर झांसे में आने से रही। बिहार- उत्तर प्रदेश में लालू- राम विलास- मुलायम की जाति आधारित और देश भर में भाजपा के राम मंदिर बनाने के संकल्प वाली राजनीति बुरी तरह पिट गयी।

.... जारी

Tuesday, May 26, 2009

आम चुनाव के नतीजों से मिले संकेत- तीन

पहला भाग दूसरा भाग

उत्तर प्रदेश में चमत्कार के स्तर पर जाकर कांग्रेस ने अपनी जड़ फिर से जमाई है। राहुल गांधी की करिश्माई छवि का जो सर्वाधिक चारणगान हो रहा है, वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सतही पुनर्वापसी को ही देखकर ही हो रहा है। कांग्रेसी नक्कारखाने में इस झूठ का इतना शोर है कि सच्चाई यहां तूती की आवाज साबित हो रही है। सच्चाई जब खुलेगी तब सामने आएगा कि जिन क्षेत्रों में कांग्रेस का वोट बढ़ा है और सपा या बसपा का वोट घटा है, उन सबके पीछे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह रहे हैं।

कल्याण सिंह को साथ लेकर समाजवादी पार्टी ने अपनी परंपरागत मुस्लिम वोट खोया तो वरुण गांधी के मुस्लिम विरोधी भाषणों के कारण भी मुसलमानों को सपा से अधिक सुरक्षित जगह कांग्रेस में ही दिखी। यही कारण रहा कि बिना मांगे ही कई क्षेत्रों में कांग्रेस को वोट मिल गए। यह वोट स्थायी न होकर क्षणिक भय से उपजा और नकारात्मक है। भाजपा को यहां न तो वरुण और नरेन्द्र मोदी अपने जहरीले भाषणों से कोई मदद कर पाए और न ही भाजपा की अपनी राम मंदिर की रणनीति काम कर पायी।

हरियाणा, पंजाब में भी कांग्रेस का मुकाबला क्षेत्रीय दलों अकाली दल और इंडियन नेशनल लोकदल से रहा और यहां कांग्रेस ने अपनी शक्ति को बढ़ाया है। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जिस तरह से दो धु्रवीय राजनीति है उसमें अलग से किसी ताकत के अनायास उभरने की कोई संभावना पहले भी नहीं थी। दक्षिण में केरल और आंध्र में कांग्रेस बेहतर रही। लेकिन कर्नाटक में पिटी और तमिलनाडु में तो वह क्षेत्रीय शक्ति की ही बैशाखी पर टिकी है.

कुल मिलाकर इस बार मतदान में जनता ने जातिवादी, सांप्रदायिक, ब्लैकमेंल करनेवाले और क्षेत्रवाद पर राजनीति करने वालों को नकारा है। बिहार में इसी बूते पिछले दो दशकों से सत्ता पर छाए लालू प्रसाद यादव का पराभव हुआ तो राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी पूरी तरह से नेस्तनाबूद हो गयी। उत्तर प्रदेश में सर्वजन की होने का दम भरनेवाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी केवल तीन साल पूर्व ही खुद को प्राप्त 210 विधानसभा सीटों के आंकड़े के आधे को भी इस लोकसभा में नहीं प्राप्त कर सकी। उसे मात्र 20 सीटें मिली हैं। इसी तरह समाजवादी पार्टी की सीटें पिछले लोकसभा चुनाव मे मिली 40 सीटों के मुकाबले आधे के करीब ही रह गयीं। सपा ने 23 सीटें जीतीं। (उत्तर प्रदेश में एक लोकसभा सीट के दायरे में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं)। भाजपा किसी तरह सांप्रदायिक आग भड़काकर अपनी पिछली संख्या को कायम रख सकीं। प्रदेश में कांग्रेस की अप्रत्याशित वापसी हुई है, जिसका कारण हम ऊपर बता आए हैं कि यह वोट नकारात्मक, बाबरी मस्जिद के विध्वंसक कल्याण सिंह की सपा से दोस्ती और वरुण-नरेन्द्र मोदी के आग उगलने की प्रतिक्रिया में था। बिहार-उड़ीसा में नीतीश कुमार और नवीन पटनायक को मिला जनसमर्थन विकास और उनकी व्यक्तिगत सौम्य छवि पर है। भाजपा की सहयोगी होने के बावजूद नीतीश को वामपंथी पार्टियां तक धर्मनिरपेक्ष कह चुकी हैं तो कंधमाल कांड के बाद भाजपा से पल्ला झाड़ चुके नवीन को वामपंथी पार्टियों ने समर्थन भी दिया था। कुल मिलाकर जनता ने साफ कर दिया है कि वह अब ऐसे उल जलूल की ओछी राजनीति के नाम पर झांसे में आने से रही। बिहार- उत्तर प्रदेश में लालू- रामविलास के जाति आधारित और देश भर में भाजपा के राम मंदिर बनाने के संकल्प वाली राजनीति बुरी तरह पिट गयी।

लेकिन इन प्रदेशों में सबसे चिंतित करनेवाली बात जो दिखाई दे रही है, वह परिवर्तनवादी -प्रगतिशील धारा का अंत है। यह कोई जनता की इच्छा के कारण नहीं बल्कि इन धाराओं की आपसी नालायकी की वजह से हुआ है। बिहार में शुद्ध रूप से जातिवाद की राजनीति पर आधारित लालू को 15 साल तक समर्थन देकर वहां की जनाधार वाली भाकपा ने अपने को धराशायी कर लिया तो उत्तर प्रदेश में भी उसकी बची-खुची ताकत का अंत उसी तरह की राजनीति करनेवाले मुलायम सिंह को समर्थन के कारण हुआ। बिहार में वामपंथ के नाम पर भाकपा-माले है लेकिन उसकी पहचान एक क्षेत्रीय तौर पर ही है और उसकी विश्वसनीयता न के बराबर है। उधर लोहिया के समाजवाद और जयप्रकाश आंदोलन की गर्भ से निकले लालू- मुलायम की पार्टियां पूरी तरह जातिवाद और भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी हैं। इन पार्टियों पर कारपोरेट घरानों, उद्योगपतियों, उनके एजेंटों और सत्ता के शुद्ध दलालों का कब्जा हैं।
.... जारी

Monday, May 25, 2009

आम चुनाव नतीजों से मेले संकेत - दो

पहला भाग

अगर पिछली सरकार में वामदलों का प्रभावी हस्तक्षेप न रहता तो बैंकों का निजीकरण, बीमा कंपनियों का निजीकरण, पीएफ फंड का शेयर बाजार में निवेश आदि कई कानून पारित हो जाते। ऐसे में आज जो वैश्विश्वक मंदी आयी है, उसका जितना भयंकर दुश्प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। खुद मनमोहन सिंह ने ही यह स्वीकार किया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने हमे मंदी में भी मजबूती प्रदान की है। दूसरी ओर वामदलों के लिए निराशाजनक बात यह रही कि खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी तमाम राजनीतिक और वैचारिक पूंजी को नंदीग्राम और सिंगूर में बड़े पैमाने पर जनसंहार कर और किसानों को तबाह कर नष्ट कर लिया। यहां तक कि उसने टाटा और सलेम समूह के लठैत का काम करते हुए अपने सहयोगियों -भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, फारवर्ड ब्लॉक और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी तक को नहीं बख्शा। उनके विरोध और उनकी आपत्तियों को तो नहीं ही सुना उल्टे उनपर हमले भी किये। इसका असर हुआ कि बंगाल में वामपंथी बुदि्धजीवी भी उससे अलग होते गये।

कभी देश भर में विपक्षी राजनीति के एक मजबूत स्तंभ के रूप में विश्वसनीयता हासिल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बंगाल और केरल के अंतर्कलह और नंदीग्राम-सिंगुर के पाप से उबरने में ही उलझी रही। माकपा ने हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे मोर्चे के पिटे-पिटाए प्रयोग को अपने स्तर पर करने की कवायद शुरू की लेकिन यह एक तो काफी देर से उठाया गया कदम था और दूसरे इसमें जिन ताकतों पर भरोसा किया गया वे पहले से ही अविश्वसनीय हैं। इसका परिणाम सामने है।

लेकिन बंगाल से लेकर पूरे उत्तर और मध्य भारत पर नजर दौड़ायें तो हम पाते हैं कि इसका फायदा जनता ने कहीं भी भाजपा या कांग्रेस को नहीं दिया है। पश्चिम बंगाल में माकपा की हार का फायदा क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस को मिला है। तृणमूल के साथ गठबंधन के कारण ही कांग्रेस को यहां वाम विरोधी मत मिले हैं। बिहार में कांग्रेस अपने ही घटकों से बुरी तरह उलझी। यहां उसे पहले की तीन सीटें भी नहीं मिल पायीं। यहां पर भी फायदा जदयू और उसके साथ होने के कारण भाजपा ने उठाया। बिहार की राजनीति को देखें तो साफ है कि जनता ने इस बार नीतीश कुमार की सरकार को विकास के नाम पर जितना वोट दिया है उससे कहीं ज्यादा उस लंपट और बकवासी राजनीति के खिलाफ मतदान किया है जिसके साए में राज्य की जनता 1990 से 2005 तक की लालू-राबड़ी राज में रहती आयी थी। बिहार में लोगों की बातों में और उनके जेहन में उस आतंकी और जंगल राज की याददाश्त साफ देखी जा सकती है। अभी नीतीश कुमार के शासन में जो कुछ सकारात्मक काम हुए हैं, उनमें अपराध पर अंकुश लगा है। लूटपाट की प्रवृत्ति रुकी है और कुछ हद तक विकासात्मक काम भी आगे बढ़े हैं।

लालू प्रसाद यादव के मुकाबले नीतीश की सौम्य भाषा और छवि ने भी जदयू-भाजपा गठजोड़ को काफी मदद की है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान भाकपा महासचिव ए.बी. बर्धन भी नीतीश को धर्मनिरपेक्ष घो्षित कर चुके हैं। यहां भाजपा के वोट में बेतहाशा वृदि्ध धर्मनिरपेक्ष राजनीति करनेवालों के लिए चिंता की बात है। लेकिन बिहार-उड़ीसा में दूषित ताकतों के निषेध भाव पर टिका यह जनमत ज्यादा दिनों तक बना नहीं रह पाएगा। लोग स्थिर होने पर विभिन्न जन समस्याओं पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि इन जनपक्षीय मुद्दों पर ये पूंजीवादी, बाजारवादी सरकारें भी ढोल की पोल साबित हो रही हैं। ऐसे में एक बड़ा राजनीतिक खालीपन उभरेगा।
..... जारी

Sunday, May 24, 2009

आम चुनाव से मिले संकेत - एक

लोकसभा चुनाव के परिणाम में कांग्रेस को 205 सीटें मिलने के बाद पार्टी की चापलूसी परंपरा का निर्वाह करते हुए राहुल गांधी और सोनिया गांधी की जो जयकार हो रही है, वह तो संभावित ही थी, लेकिन इस बार आश्चर्यचकित कर देनेवाली बात यह है कि देश का पूरा मीडिया भी इस झूठी जय-जयकार में शामिल हो गया है। इस मामले में मीडिया ने अपने वाम-दक्षिण होने के सारे भेद को खत्म कर लिया है।

वस्तुस्थिति पर नजर डालें तो कांग्रेस को मिली सीटें 1991 के चुनाव में मिली सीटों से कम ही हैं। इसके बाद कांग्रेस को हमेशा 150 से कम ही सीटें मिलती रही हैं। इस बार अंतर सिर्फ इतना है कि मुख्य विपक्ष का खम ठोकने वाली भारतीय जनता पार्टी सीटों के मामले में पिछले चुनाव से और नीचे चली गयी है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर लड़ाई के दो मुख्य ध्रुव कांग्रेस-भाजपा ही बने रहे। साथ ही सरकारों पर राजनीतिक दबाव बनाए रखनेवाले वामदलों की ताकत बुरी तरह से क्षीण हुई है। बाकी क्षेत्रीय दलों के उभार में कहीं कोई कमी नहीं आयी है और न ही लोग इन छोटे दलों से निराश हुए हैं।

चुनाव के परिणाम बताते हैं कि देश में क्षेत्रीय अस्मिताएं तमाम कमियों और क्षुद्र राजनीति का अड्डा होने के बावजूद न केवल बरकरार है बल्कि लगातार बढ़ रही हैं। लगता है कि मीडिया जिस तरह से राहत और खुशी का इजहार कर रहा है वह केवल इन वामपंथी दलों के ध्वस्त होने की ही खुशी है न कि देश में किसी कथित दो दलीय व्यवस्था कायम होने या राजनीति को अस्थिर करने वाली ताकतों के क्षय की। यह मीडिया के उच्चवर्गीय चरित्र को ही दिखलाता है जो अपने ख्यालों में ही आकाश कुसुम खिला रहा है। यह खुशी इसलिए भी है कि वामपंथी पार्टियां जिस तरह से बाजारवाद को उद्धत मनमोहन-चिदबंरम-मोंटेक की तिकड़ी पर तलवार लटकाए रखती थी, उससे मीडिया के कर्ताधर्ताओं और विज्ञापनदाताओं का हित ही प्रभावित हो रहा था और सरकार को खुले खेल की कभी पूरी छूट नहीं मिल पाती थी। कांग्रेस का जो थोड़ा उभार इस बार दिखा वह मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के अंदर आडवाणी बनाम शेखावत-मोदी के अंतर्कलह, भाजपा द्वारा चुनावी लड़ाई को व्यक्तिगत बनाकर मनमोहन सिंह पर कमजोर होने का निजी आक्षेप और वरुण गांधी- नरेन्द्र मोदी द्वारा मुस्लिम विरोधी भड़काऊ भाशणों के कारण है। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह से दोस्ती के कारण मुसलमानों का विश्वास सपा से उठना भी एक कारण रहा है।

जो लोग इस चुनाव से निकले नतीजों में देश में दो दलीय प्रणाली की स्थापना देख रहे हैं उनके लिए निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आंकड़े आईना का काम करेंगे। उल्टे कांग्रेस-भाजपा जैसे कथित राश्ट्रीय पार्टियों की मिले वोटों से कहीं अधिक वोट बाकी शक्तियों को मिली है। निर्वाचन आयोग के अनुसार ही, इस बार कांग्रेस को 28.52 फीसदी वोट मिले जबकि भाजपा को केवल 18.83 फीसदी, बसपा को 6.18 फीसदी, माकपा को 5.34 फीसदी, राकांपा को 2.04 फीसदी, भाकपा को 1.43 फीसदी, राजद को 1.27 फीसदी और अन्य पार्टियों व निर्दलीयों को 36.4 फीसदी वोट मिले हैं। यहां साफ है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों को सम्मिलित रूप से मिले वोट का प्रतिशत केवल 47.35 फीसदी ही रहा जबकि 2004 में दोनों को मिलाकर 49.5 फीसदी वोट मिले थे। यानी, दोनों राश्ट्रीय दलों को मिलाकर भी 50 फीसदी वोट नहीं मिले। यह आंकड़ा उन विश्लेशकों के मुंह पर तमाचा जैसा है जो देश को दो दलीय व्यवस्था की ओर बढ़ते देख रहे हैं। ....

जारी

Thursday, April 9, 2009

जूते गुजरात पर भी चले और इस नजीर को सलाम भी करें

अहमदाबाद के निकट कोहा गांव के धूराजी और बाबूबेन ठाकुर को शायद आपमें से कोई नहीं जानता हो। लेकिन इन दोनों ने आजाद भारत के सबसे दुखद दिनों में मानवता को बचाकर एक मिशाल पेश की है। गुजरात में 2002 में हुए एकतरफा जनसंहार के हालात पर अंग्रेजी में पुस्तक ‍"फीयर एंड फोरगिवनेस" में पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर ने इस दंपति के सर्वोत्तम मानवीय कार्य को याद किया है, जो इतिहास में नजीर के रूप में दर्ज हो चुका है।

पुस्तक के मुताबिक, दंगाइयों ने 110 लोगों के घरों से सारा सामान लूटने के बाद उनके घरों को आग लगा दी थी और उन्हें पनाह देनेवाला कोई नहीं था। सारा दिन खेत में छिपे रहने के बाद उन्होंने एक रात गुजारने के लिए धूराजी के घर पर दस्तक दी। धूराजी और बाबूबेन ने एक भी पल सोचे बिना अपने घर के दरवाजे इन मुसीबतजदा मेहमानों के लिए खोल दिए। समूचा गुजरात जल रहा था, लिहाजा इस परिवार ने अगले 10 दिनों तक इन सबको घर में रखा और जब हालात कुछ ठीक हुए तो इन्हें ट्रैक्टरों से कैंप तक पहुंचाया। इतने ही दिनों में इस परिवार का साल भर का अनाज खत्म हो गया। लेकिन इस परिवार को इसका मलाल नहीं। उन्होंने कहा कि उन सबकी दुआ से मेरा भंडार फिर भर गया और खेतों में फसल लहलहा रही हैं।

पुस्तक के अनुसार, 2002 का दंगा कोई साधारण दंगा नहीं, बल्कि सरकार की देखरेख में कराया गया जनसंहार था। इसकी योजना पहले से ही तैयार की गई थी। पुस्तक में मंदर लिखते हैं कि पूरी तरह से तबाह लोगों की मदद करनेवाला कोई नहीं था। अपनी जायदाद की हिफाजत करने के लिए साबरमती आश्रम ने भी दरवाजे बंद कर लिये थे।

भय और नफरत के माहौल में मानवता की उम्मीद की किरण धूराजी और बाबूबेन ही नहीं थे। ऐसे सैंकड़ों लोग हैं, जिन्होंने बेगुनाह लोगों और बच्चों को बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। साबरकांठा जिले के नानापोशिना गांव में बूढे वली भाई अपने जले हुए घर के सामने बैठे रात भर रोते रहे। सुबह उनके पास शौच जाने के लिए लोटा तक नहीं था। एक ठाकुर लड़के ने दबे पांव आकर उसके बगल में एक लोटा रख दिया और चुपचाप चला गया। इस मूक संवाद में कुछ ऐसा था कि वली भाई की जिंदगी चल पड़ी। गांव की ही एक महिला ने अपने समुदाय के विरोध के बावजूद उन्हें आठ दिन तक खाना दिया और एक दोस्त ने उनके मकान के लिए टिन की छत बनवा दी।

आज जब सिख दंगों पर एक पत्रकार का जूता निशाने पर सटीक बैठा है और 25 साल पुराना दर्द हरा हो गया है और इसपर बहस शुरू हो गई है, गुजरात की उस भयावह तस्वीर पर भी बहस तेज होनी चाहिए। गुजरात ने जिस तरह का भयानक दौर देखा है, उसमें टिकाऊ शांति के लिए पश्चाताप, सहानुभूति और न्याय जरूरी है। लेकिन सात साल गुजर जाने के बावजूद फिलहाल तो ये चीजें कहीं दिखाई नहीं देती।

Saturday, January 10, 2009

आजाद भारत में भी प्रताड़ित होते रहे आजाद हिन्द फौज के सिपाही

कांग्रेस की पहली अंतरिम सरकार के कार्यकाल मे अंग्रेजों ने कइयों को चढ़ा दिया फांसी

देश के लोगों को आज इतना भर पता है कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति और इसमें धूरी राष्ट्रों की पराजय के बाद उनके साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रही सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज के केवल तीन युद्धबंदियों - जनरल शाहनवाज खां, कैप्टन प्रेम कुमार सहगल और कैप्टन जी।एस. ढिल्लन को ही भारत में ब्रिटिश शासन के कोर्ट मार्शल का दंश झेलना पड़ा था। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे हजारों सिपाहियों के खिलाफ देश की विभिन्न जेलों में कोर्ट मा्र्शल की कार्रवाई की गयी थी। आजाद हिन्द फौज के ऐसे ही एक सेनानी रहे हैं कैप्टन अब्बास अली, जिन्हें उस समय फांसी की सजा सुनायी गयी थी और 1945 में कांग्रेस की अंतरिम सरकार ने उन्हें राहत दी थी। अब्बास अली ने हाल में ही अपनी आत्मकथा `न रहूं किसी का दस्तनिगर´ लिखी है और उसमें पंडित नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली अंतरिम सरकार द्वारा आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के साथ किये गये बर्ताव का बेबाकी से वर्णन किया है।

इस पुस्तक के अनुसार, स्वतंत्र भारत के पहले सेनाध्यक्ष जनरल के।एम. करियप्पा की नजर में आजाद हिन्द फौज के सिपाही अनुशासनहीन थे और इसीलिए उन्हें आजादी मिलने के बाद भी देश की सेना में शामिल नहीं किया गया। वैसे देशवासियों की नजर में आजादी के लिए अपने तरीके से प्रयास करने की मुहिम में आजाद हिन्द फौज और उसके संस्थापक सुभाष चन्द्र बोस के योगदान को किसी भी कीमत पर कम करके नहीं आंका जा सकता है। लेकिन तथ्य तो यही बताते हैं कि आजाद भारत की पहली ही सरकार ने उनके साथ न्याय नहीं किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना से विद्रोह करने के आरोप में कोर्ट मार्शल के बाद फांसी की सजा सुनाये गये अब्बास अली आजादी के बाद देश में समाजवादी आंदोलन से जुड़ गये। जनता पार्टी के सदस्य के रूप में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे कैप्टन अली लिखते हैं कि विश्वयुद्ध में आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को ब्रिटिश सरकार से बगावत कर जापान का साथ देने के आरोप में कोर्ट मार्शल के दौरान फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद 1946 में बनी अंतरिम सरकार ने अधिकांश सैनिकों की सजा को मुल्तवी कर दिया लेकिन कुछ एक सिपाहियों को ब्रिटिश अधिकारियों ने फिर भी सजा-ए-मौत दे दी और भारत सरकार कुछ न कर सकी। इतना ही नहीं, कोर्ट मा्र्शल की कार्रवाई के दौरान भी उन लोगों के साथ जेलों में बुरा बर्ताव किया गया। कैप्टन अली के मुताबिक, देश की आजादी के लिए आईएनए (आजाद हिंद फौज) में भर्ती हुए सैनिकों को उम्मीद थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन सभी को भारतीय सेना में शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन हमारी ही सरकार ने हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और वह भी नाकाबिल बताकर। पुस्तक में खुलासा किया गया है कि आजाद हिन्द फौज में एक लाख से ज्यादा सैनिक थे और इनमें से 60,000 से अधिक पहले ब्रिटिश फौज में थे।

कैप्टन अली ने पुस्तक में बयां किया है, `बड़े अफसोस के साथ मुझे लिखना पड़ रहा है कि हम बागियों को यह कहकर आजाद भारत की सेना में शामिल नहीं किया गया कि ऐ फौजी अनुशासित नहीं हैं। मुझे याद पड़ता है कि देश के पहले सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा ने बयान दिया था कि चूंकि आईएनए के सिपाही अनुशासित नहीं हैं, इसलिए उन्हें दोबारा सेना में शामिल नहीं किया जाएगा और हमारी सरकार ने उनकी यह बात मान ली। अली की किताब के मुताबिक, आईएनए के इन सिपाहियों को सम्मान दिलाने के लिए देश के नेताओं में सिर्फ डॉ. राम मनोहर लोहिया ने बार-बार आवाज उठायी थी।
उन्होंने लिखा है कि आजादी के बाद आजाद हिन्द के फौजियों को भारतीय सेना में शामिल करने या न करने का सवाल उठाना ही निरर्थक था। खैर, अगर यह सवाल उठाया भी गया तो फिर उन्हें बगावती बताकर सेना में शामिल करने से अयोग्य ठहराये जाते वक्त यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया कि देश की आजादी के इन दीवानों आखिरकार बगावत किसके खिलाफ की थी। अपने देश के खिलाफ या फिर देश के दुश्मनों के खिलाफ ?

पुस्तक में बड़े अफसोस के साथ लिखा गया है कि एक सैनिक के लिए उसके फौजी होने से अयोग्य बताने से बड़ी पीड़ा और कुछ नहीं हो सकती और इस पीड़ा का अंत यहीं नहीं हुआ बल्कि कांग्रेसी सरकार ने इन सिपाहियों और अफसरों को 1972 तक न तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना और न ही पेंशन और कोई सुविधा दी। विपक्षी दलों के संसद से सड़क तक संघर्ष और जद्दोजहद के बाद 1972 में इंदिरा गांधी की सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी माना और पेंशन दी। लेकिन इस समय तक तमाम सिपाही मर चुके थे और जो बचे थे, उनमें से अधिकांश को सरकार ने दस्तावेजी सबूतों के अभाव में आईएनए का सिपाही ही नहीं माना।

Wednesday, December 31, 2008

बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत गाता जाए बनजारा

15 करोड़ खानाबदोश व अर्ध खानाबदोश जनजातियों के बारे में आयोग की रिपोर्ट खटाई में

छठी सदी के संस्कृत के महाकवि दंडी ने अपनी रचना दशकुमार चरित्र में एक जाति का उल्लेख किया है। यह जाति और कोई नहीं आज के युग में भी तंबू-कनात लिए हुए एक जगह से दूसरी जगह अपना आशियाना बदलतीं बनजारा जातियां हैं। भारत सरकार द्वारा गठित खानाबदोश एवं अर्ध खानाबदोश जनजाति राष्ट्रीय आयोग ने जुलाई २००८ के पहले सप्ताह में सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस समय देश में करीब 12 करोड़ ऐसी आबादी है। कुछ अन्य स्रोतों से यह संख्या 15 करोड़ बतायी गयी है। यानि पूरा उत्तर प्रदेश जितनी बड़ी आबादी या यूरोप के कई देशों के बराबर की आबादी भारत में बेघरबार इधर-उधर भटक रही है। इनकी न तो कोई नागरिकता होती है और न ही कोई पहचान। आयोग के अनुसार देश का नागरिक होते हुए भी व्यवहार से बंजारा जातियां न किसी देश का नागरिक है और न ही उसे नागरिक जैसे अधिकार प्राप्त हैं।

बालकृष्ण रेणके की अध्यक्षता में गठित आयोग ने बंजारों की स्थिति में सुधार के लिए 38 अंतरिम सिफारिशें की और उन्हें आवश्यक नीति एवं योजना निर्माण के लिए सामाजिक न्याय मंत्रालय को सौंपा। लेकिन न तो संसद को और न ही इन बनजारों को ही सरकार की ओर से यह बताया गया है कि उनके हालात में बेहतरी के लिए इन सिफारिशों की रोशनी में क्या कुछ किया जा रहा है। आयोग ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की है कि विभिन्न राज्यों में इन जातियों को दलित-आदिवासी या पिछड़ा- किसी वर्ग में शामिल नहीं किया गया है। आयोग ने इन जातियों के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय खोलने तथा उन्हें आवश्यक तकनीकी प्रिशक्षण देने पर बल दिया है और इनके लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया है।

बंजारा मुख्य रूप से देश के दक्षिण और पश्चिम में बसे हैं। वैसे ऐसी घूमन्तु जातियां देश भर में हैं। उत्तर प्रदेश में ये बावरिया और बिहार में करोर, नट, बक्खो आदि कहलाते हैं। दक्षिण के बनजारे अपना उत्स उत्तर भारत की ब्राह्मण और राजपूत जातियों से मानते हैं, तो राजस्थान मूल की गड़िया लोहार नामक बनजारा जाति चित्तौड़ की राजपूत जाति से। इतिहास में इस जाति का पहला उल्लेख 1612 की तारीखे-खाने-जहान लोदी में मिलता है। ग्रियर्सन के अनुसार, बंजारा नाम संभवत: संस्कृत के वाणिज्यकार से आया है। बंजारा जाति को और भी कई नामों से जाना जाता है। इनमें बनजारी, ब्रिजपरी, लभानी, लाबांकी, लबाना, लभाणी, लंबानी, बोइपारी, सुगाली आदि शामिल है।

अंग्रेंजों ने 1871 में अपराधी जनजाति कानून बनाकर सभी बंजारा जातियों को चोर-लूटेरे के रूप में चित्रित किया। यह काला कानून 1952 में रद्द हो गया लेकिन उसकी जगह `आदतन अपराधी कानून 1952´ स्वतंत्र भारत की संसद ने बना दिया, जो आज भी लागू है। इसके अलावा भिक्षा प्रथा निषेध कानून के तहत भी इन जातियों को प्रताड़ित करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति, वर्तमान में राज्यसभा सांसद और उर्दू के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित डॉ। जाबिर हुसैन द्वारा संपादित अर्धवार्षिक पत्रिका `दोआबा´ का दिसंबर 2008 का अंक खानाबदोशों पर ही केंद्रित है।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1930 में लिखा था, ` अपराधी जनजाति कानून के विनाशकारी प्रावधान को लेकर मैं चिंतित हूं। यह नागरिक स्वतंत्रता का निषेध करता है। इसकी कार्यप्रणाली पर व्यापक रूप से विचार किया जाना चाहिए और को्शिश की जानी चाहिए कि उसे संविधान से हटाया जाए। किसी भी जनजाति को अपराधी करार नहीं दिया जा सकता।´ लेकिन लगता है नेहरू के वारिश ही उनकी भावना नहीं समझ पा रहे है या समझ कर भी अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं।

दोआबा में खानाबदोशों पर रिपोर्ट को अगली पोस्टों में जारी रखने की कोशिश करूंगा।

Tuesday, December 30, 2008

इन सैनिकों की भी सुनिए

पूर्व सैनिकों का एक समूह इन दिनों जंतर मंतर पर अनिश्चतकालीन भूख-हड़ताल पर बैठा है। 2008 में सैन्य बलों की छवि जितनी धूमिल हुई उतनी पहले कभी नहीं। पूरे साल भर सैन्य दुनिया की फिजाओं में संकट के बादल उमड़ते रहे हैं।

जंतर-मंतर पर सड़क के किनारे पूर्व सैनिक भूख हड़ताल पर बैठे हैं। एक महिला डॉक्टर इन हड़तालियों के ब्लड प्रेशर, नाड़ी आदि चेक करती हैं। वहां के रजिस्टर में हड़तालियों का ब्लड प्रेशर सामान्य है, नाड़ी भी सामान्य। समूह में सिपाही सुलेमान खान हैं तो पूर्व उप सेना प्रमुख ले। जन. राज कदयान भी हैं।

बरेली का एक रिटायर जेसीओ अपने रिटायर साथियों को 10 मिनट तक फोन पर कांग्रेस और भाजपा दोनों का विरोध करने की सलाह देता है। वहां जो उचित हो वही करने की सलाह भी देता है पर राजनीतिक समझ के साथ। एक कारगिल शहीद की विधवा वहां उपस्थित लोगों से आंसू भरी आंखों से अपील करती हैं कि आशा न छोड़ें, संघषZ कभी न छोड़ें। यहां कोई तमाशा नहीं है। यहां न तो शोर शराबा है और न ही आने पर रोक। लेकिन यह एक ऐसी कहानी है जिससे हर देशवासी को अवगत होना चाहिए। आप इन पूर्व सैनिकों की मांग से सहमत हों या न हों लेकिन आप अन्याय की कटू पीड़ा का अनुभव तो करते ही होंगे। इससे सरकार से इनका भरोसा भी उठ गया है।

याद रखें कि यह ऐसे समय में हो रहा है जब मुंबई हमले से पूरा देश उद्वेलित हो रहा है। इनका नुकसान यह हुआ है कि छठे वेतन आयोग ने सशस्त्र बलों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।
आजकल राजनेताओं को सीधे तौर पर स्वार्थी और बेइमान मान लिया जाता है। नौकरशाह तो पहले से ही भ्रष्ट हैं। पिछले छह दशकों में बलों ने केवल बाबुओं के लिए काम किया है और पिछले कुछ महीनों से यही पानी सिर से ऊपर बहने लगा है।

सैन्य बलों के अधिकांश अधिकारियों का मत है कि संप्रग सरकार ने मालेगांव विस्फोट की जांच के द्वारा देश के लोगों में सेना की यह छवि बनायी है कि लोग जितना ईमानदार सेना को समझते हैं, वह उतनी है नहीं और इसलिए उसक मांगें भी मानने लायक नहीं है। मालेगांव विस्फोट में एक ले। कर्नल आरोपी है।

वह तो भला हो प्रधानमंत्री का, जिन्होंने छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों में सुधार कर सेना में कुछ खुशी आयी है। आगामी साल 2009 भी सेनाओं के लिए संभवत: बहुत खुशी का साल न रहे लेकिन इस साल मे चुनाव और बदलाव की संभावना है जो सेना के लिए खुशखबरी ला सकती है।


(निवेदिता खांडेकर के सहयोग से िशव अरूर की रिपोर्ट पर आधारित)

Thursday, December 11, 2008

भारत गरीब, एम् एल ऐ अमीर

जो यह जानना चाहते हैं कि भारत कितनी तेजी से तरक्की कर रहा है, उनको यह देखना चाहिए कि इस देश के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की संपत्ति कितनी तेजी से बढ़ती जा रही है।

दिल्ली स्थित लाइब्रेरी इंस्टीट्यूट की `सशक्त भारत´ परियोजना के तहत जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उतरे उम्मीदवारों की औसत संंपत्ति 2003 की अपेक्षा 47 फीसदी सालाना के हिसाब से बढ़ी है। इनकी औसत संपत्ति 2003 में 24 लाख थी जो 2008 में बढ़कर 167 लाख हो गई।
हालांकि इस औसत आय से बहुत कुछ साफ नहीं होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली में 2003 में चुनाव लड़े 817 उम्मीदवारों में से 146 ने अपनी संपत्ति शून्य घोषित की थी।

कांग्रेस के उम्मीदवारों की औसत संपत्ति इस दौरान 92 लाख से बढ़कर 321 लाख हो गई जबकि भाजपा उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 56 लाख से बढ़कर 300 लाख।

कर्नाटक विधानसभा के लिए उतरे उम्मीदवारों की औसत आय दो चुनावों के बीच 53 लाख से बढ़कर 204 लाख पर पहुंच गई। इनमें कांग्रेस उम्मीदवारों की संपत्ति 120 लाख से बढ़कर 875 लाख हो गई तो भाजपा उम्मीदवारों की 88 लाख से बढ़कर 384 लाख।

इसमें भी दिलचस्प बात यह रही कि विपक्षी उम्मीदवारों की औसत संपत्ति सत्तारूढ दल के उम्मीदवारों की अपेक्षा तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के तौर दिल्ली में कांग्रेस उम्मीदवारों की संपत्ति की तुलना में भाजपा उम्मीदवारो की संपत्ति अधिक तेजी से बढ़ी, तो वहीं मध्य प्रदेश में भाजपा उम्मीदवारों के मुकाबले कांग्रेस उम्मीदवारों की।

Sunday, November 30, 2008

चोरी जा रहा है नर्मदा का पानी

गुजरात में बहनेवाली नर्मदा नदी के पानी की चोरी गुजरात में ही हो रही है। इस कारण राजस्थान के बड़े इलाके में खेती सूख रही है। राजस्थान के सांचौर इलाके में नहरें सूखने लगी हैं। पुष्ट खबरों के अनुसार गुजरात के रीड़का गांव में लोग राजस्थान आ रही नहर से पंप लगाकर पानी चुरा रहे है और अपने खेतों की सिंचाई कर रहे हैं।

उधर, राजस्थान में नर्मदा नहर की वांक, जैसला और माणकी उपनहरों के सिंचाई क्षेत्र में किसानों ने अपने खेतों में फसलें बो दी हैं। लेकिन इन उपनहरों में पानी नहीं है क्योंकि गुजरात में ही इस पानी की चोरी हो जा रही है।

इस बीच राजस्थान के इन इलाकों के किसानों ने कर्ज लेकर फव्वारा सेट व बीज खरीदा लेकिन पानी न होने के कारण ये सब बेकार पड़े हैं और कर्ज चुकाना भी मुिश्कल हो रहा है।

राजस्थान के किसानों का आरोप है कि गुजरात में पानी चोरी रोकने के कोई उपाय नहीं किए जा रहे हैं। वहां के किसान पाइपों से 10-10 किलोमीटर तक पानी ले जा रहे हैं।

यहां सबसे बड़ी बाधा है कि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। इसलिए एक ओर तो राजस्थान सरकार गुजरात सरकार के खिलाफ कुछ खुलकर बोलना नहीं चाहती तो दूसरी चुनाव की अग्निपरीक्षा दे रही राजस्थान सरकार के लिए किसानों को पानी दिलाना एक चुनौती बन गया है। हालांकि वसुंधरा सरकार इस जुगत में है कि 4 दिसंबर को मतदान हो जाए तो नििश्चंत हो जाएं।

Saturday, November 29, 2008

टला नही है समुद्री खतरा

मुंबई के ताज, ओबेराय-ट्राईडेंट होटल और नरीमन हाउस में पिछले 60 घंटों से आंतकिंयों के साथ तीनों सेनाओं, एनएसजी, नौसेना के मार्कोस कमांडों और मुंबई पुलिस की संयुक्त मुठभेड़ का अंत हो गया। लेकिन यह मुठभेड़ इससे भी बड़े खतरे का संकेत दे गया है। करीब 7000 किलोमीटर की समुद्री सीमा से घिरे भारत पर समुद्र से होनेवाले हमले का खतरा भविष्य में और मजबूत हुआ है। इस आतंकी हमले की प्रारंभिक जांच में ही पता चल गया कि आतंकी समुद्र के रास्ते आए। अवांछित गतिविधियों के लिए समुद्री रास्ते के उपयोग की बात वैसे नई नहीं है। १९९३ में इसी रास्ते दाउद हथियार लाने में सफ़ल रहा था। पेट्रोलियम की तस्करी के लिए यह मार्ग पहले से काफी मुफीद रहा ही है, सोने, ड्रग्स और हथियारों की भी भारी मात्रा में इस रास्ते तस्करी होती रही हैं।

भारत का समुद्री किनारा गुजरात के कांडला पोर्ट से लेकर पश्चिम बंगाल में हल्दिया तक फैला है। यहां बंगाल की खाड़ी और अरब सागर हैं, जहां बड़ी संख्या में आतंकी, उग्रवादी व डाकू समुद्री हमले की क्षमता के साथ सक्रिय हैं। समुद्री मार्ग से भारत पर कौन-कौन कर सकते हैं हमले, कितने सक्षम हैं हमलावर और अन्य गुट या व्यक्ति किस तरह से कर सकते हैं हमले में सहयोग इसपर एक नजर :

- विभिन्न देशों की नौसैनिक गश्त के बावजूद 2004 में समुद्री डाकुओं ने तेल और गैस के 67 जहाजों पर हमले किए।

- 2004 में मालवाहक जहाजों पर 52 हमले। डाकू जहाजों को मलक्का की खाड़ी में ले गए। यह खाडी डाकुओं के लिए स्वर्ग है।

- आतंकी हथियार या जैविक हथियार से भरे जहाजों को तट पर पहुंचाने के बाद सेल्युलर फोन से विस्फोट कर सकते हैं।

- समुद्र में स्थित तेलशोधक संयंत्रों और तटवर्ती परमाणु संयंत्रों पर हमला किया जा सकता है।

- श्रीलंकाई तमिल उग्रवादी संगठन लिट्टे के पास समुद्री युद्ध की परंपरागत और गैर परंपरागत दोनों प्रकार की क्षमता के साथ वाणििज्यक जहाजरानी की क्षमता भी है। इसका उपयोग वह नारकोटिक्स और अस्त्र-शस्त्रों की तस्करी में कर सकता है।

- फिलीपींस का अबु सय्याफ आतंकी संगठन जमीन से समुद्र में मार करने की क्षमता से लैस है।

- भारतीय समुद्री क्षेत्र में अलकायदा का सघन नेटवर्क है। उसके सहयोगी अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक फ्रंट भी यहां सक्रिय है। इसी संगठन ने अक्टूबर 2002 में इंडोनेिशया के बाली द्वीप पर हमला कर 200 से अधिक लोगों को मार डाला था।

- अपना समुद्री क्षेत्र हेरोइन की तस्करी का स्वर्ण त्रिकोण और स्वर्ण अर्धचंद्र के नाम से कुख्यात है। अब यहां सिंथेटिक ड्रग्स का उत्पादन और इसका व्यापार होने लगा है।

- इस समुद्र में सक्रिय आतंकी-उग्रवादी गुटों में हमास, हिजबुल्ला, अलकायदा, पाकिस्तान के विभिन्न जिहादी गुट, लिट्टे, बर्मा की यूनाइटेड वे स्टेट आर्मी और दक्षिणी फिलीपींस के जिहादी शामिल हैं।

- थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस में उग्रवादी गुटों के पास भारी मात्रा में हथियार मौजूद हैं। ये आतंकी संगठन सोने व ड्रग्स की तस्करी में लिप्त हैं।

- इस समुद्र में ट्रांस नेशनल माफिया सक्रिय है। इसमें दाउद इब्राहिम की डी कंपनी प्रमुख है। इसके तार अलकायदा और अन्य जिहादी नेटवर्क से जुड़े हैं।

- पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिकों के तार अलकायदा से। ए।क्यू. खान का तो खुलासा हो गया लेकिन बहुत अब भी छिपे रुस्तम हैं। मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात के अनेक वैज्ञानिक भी यहां सक्रिय हैं।

- पाकिस्तान इसी समुद्र के रास्ते एशियाई और दक्षिणी अफ्रीकी देशों में परमाणु उपकरणों की सप्लाई करता है। इससे ऐसे घातक हथियार हमेशा इस समुद्र में मौजूद हैं।

- अरब सागर में सोमालिया के समुद्री डाकुओं के अलावा हिन्द महासागर में दक्षिण चीन और इंडोनेशिया के ड्रग तस्कर व डाकू सक्रिय हैं। इनका अभी आतंकी संगठनों से संपर्क की सूचना नहीं लेकिन भविष्य में जुड़ सकते हैं तार।

- इस समुद्री इलाके में बड़ी संख्या में अज्ञात और अनाम द्वीप मौजूद हैं जिनपर किसी देश का नियंत्रण नहीं है। ये द्वीप वर्तमान में डाकुओं के अड्डे हैं। भविष्य में यहां आतंकियों के ठिकाने हो सकते हैं, जहां से भारतीय तटों पर हमले की आशंका है।

क्या इतने सारे खतरों से निपटने की तैयारी है। क्या इनसे निपटने की सक्षमता हासिल किए बिना हमारा समुद्र तट सुरक्षित माना जाएगा ?

२९ नवंबर को हिन्दुस्तान में प्रकाशित

Friday, November 28, 2008

कितना उचित होगी महिला वाहन सेवा

दिल्ली को सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर का शहर बना दिये जाने का प्रचार जोर-शोर से हुआ है। अगले दो साल में यहां राष्ट्रमंडल खेल होने जा रहे हैं। लेकिन क्या वाकई में दिल्ली सुरक्षित है। आम लोगों की तो जो स्थिति है वह है हीं, सरकारी एजेंसियों और तंत्र के महिलाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होने के दावे भी यहां केवल डपोरशंखी ही साबित हो रहे हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स की संवाददाता निवेदिता खांडेकर ने दिल्ली में सुरक्षित यात्रा के प्रति महिलाओं की धारणा पर एक रिपोर्ट तैयार की है। सरकार चाहे जो कहे, दिल्ली की महिलाओं को महिला मुख्यमंत्री वाली सरकार के दावों पर भरोसा नहीं है। तभी तो वह शाम ढलते ही अकेले ऑटो या टैक्सी में सफर करने से कतराती हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो लड़कियों और महिलाओं को यहां तक नसीहत दे चुकी हैं कि दिल्ली सुरक्षित नहीं इसलिए वह रात को घर से न निकला करें।

ऐसे हालात में पढी-लिखीं और सामाजिक तौर पर सक्रिय महिलाएं दिल्ली में महिलाओं द्वारा पूर्ण रूप से संचालित एक टैक्सी सेवा की वकालत कर रही हैं। लेकिन क्या यह समाज की हार नहीं होगी ? क्या यह इस डर से मुंह चुराना नहीं होगा या यह स्वीकार करने जैसा नहीं होगा कि महिलाओं की दिल्ली में पुरुष संचालित सेवाओं में सुरक्षित रहने के प्रति आश्वस्त नहीं किया जा सकता है।

कुछ महिला एनजीओ तो सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को ही महिलाओं के मुफीद नहीं मानते हैं। दिल्ली का एक एनजीओ आजाद फाउंडेशन कुछ लड़कियों को टैक्सी-ऑटो ड्राइवर की ट्रेनिंग दे रहा है। फाउंडेशन दिल्ली में ऐसी 50-60 महिला ड्राइवरों को तैयार करने की योजना बना रहा है। लेकिन इतना ही क्या काम चल जाएगा। यह तो और उल्टी बात हुई। एक ओर तो हमारे समाज की उपरोक्त नाकामयाबी को स्वीकार करना और दूसरे ऐसी व्यवस्था केवल उन महिलाओं के लिए वहनीय हो पाएंगी जो उच्च वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग की हैं। एनजीओ द्वारा तैयार ऐसे ड्राइवरों की संख्या भी सीमित मुठ्ठी भर महिलाओं को ही सुरक्षित पहुंचा पाएंगी, जो खुद की सुरक्षा के लिए पहले से ही सक्षम होंगी।
क्या इस तरह की महिला यातायात सेवा दिल्ली की लगभग 75 लाख महिलाओं को मुहैया करायी जा सकती है। अगर नहीं तो इसका क्या औचित्य है। क्या इसके बदले इस दिशा मे काम नहीं होना चाहिए कि हमारी सार्वजनिक यातायात प्रणाली ही या्त्रियों की सुरक्षा के लिए सक्षम हो जाए। अगर नहीं तो दो-चार धनी महिलाओं को सुरक्षित करना महिलाओं की सुरक्षा नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा की ढोल पीटने भर माना जाएगा। सार्वजनिक यातायात को संवेदनशील बनाने के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक वाहनों की तादाद बढाकर निजी वाहनों को दिल्ली की सड़कों से विदा कर दिया जाए। नागरिकों को इस बारे में संवेदनशील बनाना और संस्कारित करना इसके अन्य पहलू होंने चाहिए।

Saturday, November 22, 2008

महाराष्ट् क्यों जा रहे हैं बिहारी

शुक्रवार 21 नवंबर को हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरिशप समिट में रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के भाषण का सत्र चल रहा था। एक श्रोता ने सवाल किया बिहार का विकास क्यों नहीं हुआ। लालू ने हल्के ढंग से कह दिया कि आजादी के बाद केंद्र से सौतेला व्यवहार हुआ और बिहार का विकास नहीं हो पाया। यह गलत सरासर गलत जवाब था। जानने वाले जानते होंगे कि आजादी के बाद बिहार देश के अग्रणी और विकासशील राज्यों में शुमार होता था। देश में औद्योगिककरण की प्रक्रिया जब शुरू हुई तो बिहार में कई उद्योग लगे। अब ये उद्योग झारखंड में हैं। दामोदर घाटी परियोजना का निर्माण हुआ। बरौनी में तेलशोधक कारखाना खुला। सिंदरी में खाद, तो दर्जन भर स्थानों पर छोटे उद्योग और चीनी मिलें लगीं।

लेकिन 80 के दशक से बिहार के दुर्दिन शुरू हो गए। इस दुर्दिन की शुरूआत जगन्नाथ मिश्र ने की जिसको अंतिम अंजाम तक खुद लालू ने अपने 15 वर्षों के काले राज में पहुंचा दिया। जब लालू ने कहा कि लोगों के लिए रोजगार नहीं है तो तत्काल हस्तक्षेप करते हुए सत्र के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने कहा कि आपके राज्य के लोग तो पलायन कर हमारे महाराष्ट्र में आ रहे हैं। आपने रोजगार की कोई व्यवस्था ही नहीं की है। लालू का जवाब फिर गैर जिम्मेदाराना रहा। उन्होंने मसखरापन दिखाकर सवाल की धार को ही कुंद कर दिया। कह दिया कि महाराष्ट्र हमारा राज्य है। दिल्ली हमारा राज्य है। हम सब भारतीय हैं। यह कोई जवाब नहीं है। यह बात को टालना है।

बिहार से लोग काम की तलाश में इसलिए मुंबई या महाराष्ट्र में कहीं जाते हैं कि बिहार में उद्योग धंधों को इन राजनेताओं की नीतियों ने चौपट कर दिया है। अगर बिहार के उद्योग बने रहते तो लोग कहीं नहीं जाते और न ही मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों पर भार बढता। इसके लिए राष्ट्रीय नीतियां भी जिम्मेदार हैं, जो उद्योगों का सेज बनाती हैं और देशभर के उद्योग धंधों को खत्म करती हैं।

Thursday, November 20, 2008

पानी पर हिन्दी में पोर्टल, जरूर देखें

अगर आप किसी सुदूर इलाके में बैठे हों और जल संरक्षण व देश में जल की उपलब्धता के बारे में हिन्दी में कुछ जानना चाहते हों तो आपको अब परेशान होने की जरूरत नहीं है। अब जल प्रबंधन के मुद्दे पर हिन्दी में पोर्टल शुरू हो गया है, जिसमें न केवल जल संबंधी सरकार द्वारा रखे गये आंकड़े और विचार ही होंगे बल्कि जन संगठनों एवं समूहों के विचारों को भी स्थान दिया जाएगा।

मंगलवार 18 तारीख को नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में हिन्दी वाटर पोर्टल का शुभारंभ हुआ। यह पोर्टल राष्ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा 2005 में जल, ऊर्जा और िशक्षण-प्रिशक्षण आदि क्षेत्रों में मुक्त सार्वजनिक ज्ञान वाले पोर्टल के विचार के अनुरूप शुरू किया गया है। जनवरी 2007 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अंग्रेजी में इंडिया वाटर पोर्टल का आरंभ एक समारोह में किया था। इसके बाद इसके देशी संस्करणों की मांग होने लगी और सबसे पहले कन्नड में फरवरी 2008 में इसकी शुरुआत हुई।

हिन्दी में इस पोर्टल को तैयार करने का काम वाटर कम्युनिटी इंडिया ने जन संगठन अघ्र्यम के साथ मिलकर अपने हाथ मे लिया और इसमें सफलता हासिल की। कम्युनिटी पानी के मुद्दे पर काम करनेवाला एक ऐसा संगठन है जो सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल सूझ-बूझ के साथ करने की बात करता है। इसका वेब पता है : www.hindi.indiawaterportal.org

वर्तमान में शुरू किये गये हिन्दी पोर्टल का प्रारूप अंग्रेजी पोर्टल की तर्ज पर ही है। फिर भी यह अपन स्वयं का एक अलग स्वरूप लिये हुए हैं इसमें मौसम विज्ञान, डाटा और संगठन अनुप्रयोगों को हिन्दी उपयोगकर्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध कराने की पूरी व्यवस्था की गयी है।

इस पोर्टल में देश में विभिन्न भागों में पानी को लेकर विशेष गतिविधियों और किये गये उपायों पर जोर दिया गया है। पानी को लेकर अच्छी कहानियों को जानने और अधिक से अधिक लोगों तक इसे पहुंचाने के लिए यह पोर्टल प्रयासरत रहेगा।

इसमें `प्रश्न पूछें´ सेवा भी है जिसमें कोई भी व्यक्ति पानी संबंधी किसी भी समस्या के बारे में प्रश्न पूछ सकता है। जैसे, पानी की कमी, प्रदूषण अथवा वर्षा जल संचयन आदि को लागू करने संबंधी सवाल। विशेषज्ञों के पैनल इन सवालों के जवाब देंगे।

Thursday, November 6, 2008

ओबामा का ऐतिहासिक भाषण

इस बार के चुनावों में कई बातें ऐसी हुई हैं, जो इससे पहले कभी नहीं हुई। इससे कई ऐसी कहानियां जुड़ी हैं, जो आनेवाली पीढ़ियों को सुनाई जाती रहेंगी।

इस समय मेरे दिमाग मे एक महिला की छवि कौंध रही है जो एटलांटा में वोट देने के लिए लाइन में खड़ी थीं। 106 वर्षीय एन. निक्सन कूपर एक सदी का समय देख चुकी हैं। वह तब पैदा हुई थीं, जब बहुत अधिक कारें नहीं थीं, न आकाश में बहुत अधिक विमान हुआ करते थे। उस समय दो वजहों से निक्सन जैसे लोगे वोट नहीं डाल पाते थे- एक, उनका महिला होना और दूसरा, उनकी त्वचा का रंग। इस रात मैं सोचता हूं कि इस महिला ने एक सदी में काफी कुछ देख लिया है। दिल में उम्मीद की किरण से लेकर पीड़ा के नासूर तक, संघर्ष से लेकर प्रगति तक।

उसने वह समय भी देखा जब महिलाओं की आवाज दबाई जाती थी औ यह समय भी जब महिलाएं अपनी आवाज बुलंद कर सकती हैं, वोट दे सकती हैं। इतने सालों मे उसने अमेरिका का सर्वश्रेष्ठ समय भी देखा और बदतर समय भी। वह जानती है कि कैसे अमेरिका बदल सकता है। जी हां, हम अमेरिका को बदल सकते हैं।

(बुधवार की सुबह शिकागों में दिया बराक ओबामा के ऐतिहासिक भाषाण का एक अंश। यह भाषण ओबामा ने मार्टिन लूथर किंग को समर्पित किया है।)

Friday, September 19, 2008

दबगों को दाल-भात-सब्जी, दलितों को माड़-नमक-भात

बिहार के पूर्वी-उत्तरी हिस्से में बहनेवाली कोसी नदी में पिछले एक डेढ महीने से आयी भयंकर बाढ़ से बड़े इलाके में तांडव मचा हुआ है। लेकिन इस विषम परिस्थिति में भी वहां छूआछूत और जातीय व्यवस्था मजबूती से अपने निर्ममतम रूप में जमी हुई है। अखबारों में खबरें आ रही हैं कि दलित जाति के लोगों व बच्चों को न केवल यहां ठीक से खाना नहीं दिया जा रहा है बल्कि दलितों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार भी हो रहा है। उन्हें मारापीटा तक जा रहा है। दलितों के साथ दुव्र्यवहार करनेवाले सरकारी अमले तो हैं ही, वे भी हैं जो खुद इस बाढ का कहर झेल रहे हैं।

दलित वाच नामक संगठन के लोग सुपौल के राहत शिविरों में व्यवस्था देखने गए थे। इसके बाद उन्होंने गुरुवार 18 सितम्बर को पटना में संवाददाता सम्मेलन किया। इसमें इन्होंने यह खुलासा किया है कि राहत शिविरों में जाति के आधार पर भोजन परोसा जा रहा है। दबंग जाति के लोगों को दाल-भात और सब्जी तथा दलितों को माड़-भात व नमक खाने को दिया जा रहा है। सभी प्रकार के राहत कार्यों में दलितों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। दलित परिवारों के साथ दुर्व्यवहार की भी अनेक घटनाएं सामने आईं हैं।

दलित वाच की ओर से पद्मश्री सुधा वर्गीज ने बताया कि सुपौल जिले के प्रतापगंज प्रखंड के बांसचौक शिविर में दलित समुदाय के भोकूराम ने अपने बच्चों के लिए भोजन की मांग की तो बीडीओ के सुरक्षा गार्ड ने उसकी पिटाई कर दी। इसी प्रकार मधेपुरा के शंकरपुर प्रखंड के मौरा भारती गांव के एक शिविर में दलितों को माड़-भात व नमक दिया गया, जबकि दबंग समुदाय के लोगों को दाल-भात व सब्जी दी गई। इसी जिले के बिहारीगंज में स्थित 43 नंबर शिविर में मुसहर जाति की सोनी कुमारी को चापाकल से पानी भरने के दौरान छेड़छाड़ का सामना करना पड़ा। सहरसा जिले के सौरबाजार मध्य विद्यालय में चल रहे शिविर में नंदकिशोर पासवान से दबंगों ने 2200 रुपये लूट लिए।

दलित वाच के 110 कार्यकर्ताओं ने 204 राहत शिविरों में जाकर दो सप्ताह तक सघन निगरानी की है।

Friday, August 29, 2008

ऊंचे डैम से उम्मीदें बहुत नीची

नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर डैम की ऊंचाई तो बढ़ती जा रही है लेकिन इससे अपेक्षित लाभ की माऋा दिनोंदिन घटती जा रही है। इसपर हो रहे अध्ययन के परिणाम लगातार डैम की बुरी खबर ही सुनाते हैं। कभी मानवीय त्रासदी के रूप में तो विस्थापन और और कभी इसके लक्ष्य से भटकने से संबंधित खबरें आ रहीं हैं। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी निहित स्वार्थ में अंधे हुए नीति नियंता डैम के साथ देश को गहरी खाई की ओर ही ले जाने पर अमादा हैं। नहीं विश्वास हो तो हाल ही में मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस की एक अध्ययन रिपोर्ट पर नजर डाल सकते हैं।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि डैम की ऊंचाई को वर्तमान की 121.92 मीटर से आगे बढ़ाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अभी पिछले लक्ष्यों को ही पाना दुश्वार हुआ पड़ा है। रिपोर्ट कहती है कि इसके समर्थक लोग सरकार और अन्य संगठन जितना शोर मचा रहे हैं डैम उतनी ही दूर पर अटका हुआ है। `परफर्मेंस एंड डेपलंपमेंट इफेकिटवनेस आफ़ द सरदार सरोवर प्रोजेक्ट´ शीर्षक से तैयार इस रिपोर्ट में डैम से होनेवाली सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा जैसे लाभों का आकलन इसकी लागत, मानवीय व पर्यावरणीय क्षति के आधार पर किया जाना चाहिए। पिछले 20 अगस्त को यह रिपोर्ट इंदौर में फिल्म अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने जारी किया।

रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना से गुजरात में अधिक से अधिक 1.53 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई ही हो पाएगी। यह दिसंबर 2007 में गुजरात में जारी उस दावे की पोल खोल देता है जिसमें परियोजना से 17.92 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की बात कही गयी थी। पेयजल क्षमता भी मूल दावे की मात्र 29 से 33 फीसदी ही रहनेवाली है, क्योंकि पेयजल का अधिकांश हिस्सा ऊर्जा संयंत्रों और औद्योगिक कार्यों के लिए मोड़ दिया गया है।

इंस्टीट्यूट के हिमांशु उपाध्याय, जया गोयल और सुबोध वागले द्वारा किए इस अध्ययन में कहा गया है कि नदी के खादर में पावरहाउस और पावर टरबाइन जेनरेटरों की स्थापना में हुई देरी के कारण बिजली मिलने का दावा किया गया था जो डैम की वर्तमान ऊंचाई के अनुकूल ही नहीं बैठता है। क्रियान्वयन एजेंसियां पर्यावरण की क्षति का आकलन करने में भी विफल रही हैं। जलग्रहण क्षेत्र में जलाशयों में कटाव और बाहर से आई मिट्टी के लिए उचित प्रबंध नहीं किया गया है। अब तक इस पर 45,673.86 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और 2012 तक इसकी लागत बढ़कर 70,000 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इस कर्ज का पूरा भुगतान जनता की जेब से ही होना है।

Monday, July 28, 2008

परमाणु करार के खतरे ही खतरे

नाभिकीय करार पर यूपीए सरकार और विपक्षी दलों के बीच खींचातानी और जोड़तोड़ की आतुरता और वामपंथियों के विरोध ने कम से कम इतना तो साफ कर ही दिया है कि यह मुद्दा जितना संवेदनशील है, उतना ही जटिल भी। ऊपर से, इस परिदृश्य पर अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनावों की मंडराती हुई छाया और भारतीय संसद के आगामी चुनावों के नजदीक आते जाने की भी अपनी भूमिका है। फिलहाल इन नाटकीय दांवपेंचों से अलग मामला भारत के अमेरिकाकरण और अमेरिका की साम्राज्यवादी इच्छा को मंजूरी देने और उसके विरोध का है। यह बात अब शीशे की तरह साफ है कि इस समझौते का परमाणु ईंधन या ऊर्जा जरूरत से कोई खास लेना देना नहीं है।

दरअसल पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जिस तरह से भाग्य वधू से भारत को आजाद कराने की एक प्रतिज्ञा की थी और उसे 15 अगस्त 194७ को पूरा किया, उसी तरह मनमोहन सिंह और उनके पीछे खड़े भारतीय मध्यवर्ग ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को भारत के अमेरिकीकरण का एक वचन दिया था और उसे वे हर कीमत पर 2008 मे पूरा करके मानेंगे। भारतीय राजनीति में शायद उसे रोक पाने की सामथ्र्य नहीं दिखती। वामपंथी दलों ने अपनी संसदीय ताकत के बूते पर जितना विरोध करना था किया। अब यह मामला भारतीय जनता के हाथो में है कि वह अपने आंदोलन की विराट शक्ति और मताधिकार के प्रयोग से इस प्रक्रिया कोकहां तक रोक सकती है। पुस्तक `परमाणु करार के खतरे´ उसी उद्देश्य के लिए चेतना को जगाने का एक प्रयास और साम्राज्यवाद का विरोध करनेवाली ताकतो को एकजुट करने का एक आह्वान है। और इसीलिए इन स्थितियों को ध्यान मे रखते हुए पुस्तक में नाभिकीय ऊर्जा की साम्राज्यवादी राजनीति, उसके आर्थिक और वैज्ञानिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की गई है।

प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी और पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी द्वारा संपादित यह पुस्तक तथ्यों और विश्लेषण की बौदि्धक भूख को लेकर तैयार की गई है। क्योंकि उसके तथाकथित मित्र के रूप में तेजी से बढ़ रहा प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसे इन गंभीर और बेहद जरूरी मुद्दों की जानकारी देने से ही परहेज करता है तो विश्लेषण की बात ही दूर है।

Tuesday, July 1, 2008

दोआबा के जून अंक में राजन की कविता

छह महीने में एक बार निकलनेवाली दोआबा पत्रिका का जून 2008 अंक वाकई में बेमिशाल है। विभाजन पर केंद्रित रचनाओं से भरे इस अंक में विभाजन के दर्द को फिर से ताजा कर दिया गया है। वैस विभाजन की त्रासदी को वह कोई अनुभव नही कर सकता जिसने इसकी विभीषिका न झेली हो, लेकिन हिन्दी-उर्दू के दोआब को उर्वर बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध इस पत्रिका में संपादक जाबिर हुसैन ने कहानियोंं-कविताओ का संकलन कर पाठकों को इस त्रासदी को अनुभव करने के लिए मजबूर कर दिया है। प्रसिद्ध कथाकारों की विभाजन की त्रासदी के सुक्ष्म पहलुओं को उभार कर लिखी कहानियां सचमुच में उस दर्द को उनके दिल में भी तरोताजा कर देती हैं जो मानवता के इस भयंकरतम विभीषिका से कोसों और दशकों दूर बैठे हैं।

इसी क्रम में गुलजार और राजेन्द्र राजन की 11 कविताएं भी शामिल की गयी है। राजेन्द्र राजन की कविताएं वैसे तो सीधे विभाजन पर नही हैं लेकिन वह वैसी ही स्थितियों में मनुष्य के सामने उपस्थित त्रासदी को सजीव कर देती हैं। इस अंक में सामग्री चयन तथा प्रति संवाद खंड के लिए डॉण् कमाल अहमद ने सहयोग किया है। कुल मिलाकर दोआबा का 450 पृष्ठों का यह अंक (कंधों पर सलीबें) इतिहास की शायद सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी पर काफी कुछ कह जाता है।
यहां राजेन्द्र राजन की बामियान में बुद्ध प्रतिमा को ध्वस्त करने की तालिबान की करतूत पर लिखी कविता पेश करते हैं जिसमें तालिबान के अलावा सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फार का बुद्ध से साक्षात्कार है।

बामियान में बुद्ध
निंश्चिंत होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से
अपनी बंदूकों, तोपों, बचे हुए विस्फोटकों
और अट्टहासो के साथ
अपनी समझ और हुकूमत के बीच
कि उनके मुल्क की जमीन पर
उसके इतिहास में
अब कहीं नहीं हैं बुद्ध
जहां वे खड़े थे सबसे ज्यादा मजबूती से
वहां से भी मिटा दिए गए उनके नामोनिशान
अब कोई नहीं था उस सुनसान जगह में
जहां पत्थर भी कुद कहते जान पड़ते थे
वहां हर शब्द था डरा हुआ
हर चीज खामोश थी दहशत से दबी हुई
बस हवा में एक सामूहिक अट्टहास था बेखौफ
जो बामियान के पहाड़ों को रह-रह कर सुनाई देता था
तप रही थी जमीन तप रहा था आसमान
पहाड़ के टूटने की आवाज
धरती की दरारों मे समा गई थी
हवा में भर गई बारूद की गंध
सब दिशाओं में फैल गई थी
तीन दिन बाद जब वहां कोई नहीं था
हर तरफ डरावना सन्नाटा था वहां नमूदार हुआ
लंबी नाक और चौड़ी ठोड़ी वाला एक पठान
वह तपती जमीन पर नंगे पांव बढ़ा उस तरफ
तीन दिन पहले जहां पर्वताकार बुद्ध थे
और अब एक बड़ा-सा शून्य था
उस खाली अंधेरी जगह के पास जाकर वह रुक गया
कुछ पल खामोश रह कर उसने सिर झुका कर कहा-
क्षमा करें भगवन् ! हमें क्षमा करें !
बुद्ध ने आवाज पहचानी
यह खान अब्दुल गफ्फार खां होंगे
फिर वे अपनी कोमल संयत गंभीर आवाज में बोले-
आप अवश्य आएंगे, मैं जानता था भंते !
कृपया इधर चले आएं इधर छाया में
आपके पांव जल रहे होंगे
सकुचाए लज्जित-से खान अब्दुल गफ्फार खां
बुद्ध के और निकट गए
फिर सुना
किसी को क्षमा करने का अधिकारी मैं नहीं
जो क्षमा कर सकते थे अब नहीं हैं
वे विलुप्त पथिक अक्षय शांति के खोजी
जिनकी खोज और साधना के स्मारक नष्ट किए गए
खान अब्दुल गफ्फार खां की आवाज अब भी नम थी :
यहां जो हआ उससे पीड़ा हुई होगी भगवन !
पीड़ा नहीं
दुख हुआ है भंते
जब कोई सृजन विध्वंस के उन्माद का शिकार होता है
दुख होता है
पर पीड़ा का प्रश्न नहीं
जब मैं शरीर में था एक दिन अंगुलिमाल गरजा था :
रुक जाओ भिक्षुक
वहीं रुक जाओ
पर मैं रुका नहीं
जैसे कुछ हुआ न हो मेरे कदम आगे बढ़े निष्कंप
जो कंप सकता था वह मेरे भीतर से विदा हो चुका था
अब तो वह शरीर भी नहीं
खान अब्दुल गफ्फार खां थोड़ा सहज हुए
बुद्ध ने उनकी आंखों में झांका :
यह क्या, आपकी आंखें गीली क्यों हैं भंते ?
मुल्क की हालत ठीक नहीं है भगवन् !
बरसों से हर तरफ
खून से सने हाथ दिखाई देते हैं
मारकाट जैसे रोज का धंधा है
सब किसी न किसी नशे में डूबे हैं
होश का एक कतरा भी खोजना मुश्किल है
डर का ऐसा पहरा है कि कोई कुछ बोलता नहीं है
कोई कुछ सुनता नहीं
जो बोलते हैं मारे जाते हैं
अभी तीन रोज पहले यहां जो हुआ उससे
इत्तिफाक न रखनेवाले चार युवक पकड़ लिए गए
सुना है उन्हें सरेआम फांसी पर लटकाया जाएगा
कुछ पल के लिए एक स्तब्ध मौन में डूब गए बुद्ध
जैसे ढाई साल बाद
नए सिरे से हो रहा हो दुख से सामना
फिर सोच मेंं डूबा उनका प्रश्न उभरा -
और, स्त्रियों की क्या दशा है भंते
उनका हाल बयान नहीं किया जा सकता भगवन्
वे पशुओं से भी बदतर हालत में जीती हैं
डर और गुलामी और सजा की नकेल से बंधी हैं वे
बुद्ध असमंजस में डूबे रहे कुछ पल
कि आगे कुछ पूछें या न पूछें
फिर उन्होंने पूछा :
और किसान किस हाल में हैं भंते
खान अब्दुल गफ्फार खां की अनुभव पकी आंखों में
गांवों के रोजमर्रा के चित्र तैर गए :
फसलें सूख रही हैं भगवन्
किसानों की कोई नहीं सुनता
फाकाकशी की छाया लोटती है मेनतकश घरों में
हुक्मरान हथियार खरीदने के अलावा और कुछ नहीं करते
बुद्ध और खान अब्दुल गफ्फार खां के बीच एक सन्नाटा
खिंच गया
बुद्ध को चिंतित देख
शर्म की जमीन पर खड़े बूढ़े पठान ने कहा :
भारत आपके लिए ठीक जगह है भगवन्
नहीं भंते
हथियारों के पीछे पागे हैं वहां के शासक भी
बहुत छद्म और पाखंड है वहां
मानवता के संहार का उपाय कर
वे कहते हैं : मैं मुस्करा रहा हूं
इसके बाद खामोश रहे दो दुख
सहसा खान अब्दुल गफ्फार खां का ध्यान हटा
उन्होंने सूखे आसमान की तरफ नजर फिराई
लगा जैसेकिसी बाज के फड़फड़ाने की आवाज आई हो
मगर चुंधियाती धूप मे कुछ दिखाई नहीं पड़ा
फिर उनका ध्यान लौटा उस जगह
जो तीन दिन पहले हमेशा के लिए खाली हो गई थी
वहां न बुद्ध के होने का स्वप्न था न उनके शब्दों का अर्थ
खान अब्दुल गफ्फार खां खड़े थे अकेले
बामियान के पथरीले सन्नाटे में

Saturday, June 7, 2008

संगठन व साइंस की एका से किसानों का भला

कन्याकुमारी से कश्मीर तक के किसानों का एक ही दर्द है। वह यह कि दुनिया भर में उत्पादित सामानों की कीमत तय करने का अधिकार तो उनके उत्पादकों का होता है जबकि उनके द्वारा पैदा किए जानेवाले अनाजों का मूल्य खरीदनेवाला अपनी मर्जी से तय करता है। उन्हें इस बात का भी दु:ख है कि कहने को तो वे आजाद देश के नागरिक हैं पर एक चिट्ठी पर उनकी जमीन छीन ली जाती हैं।

जमीनों को लेकर जो कानून अंग्रेजो ने बनाए थे, आज की सरकार उसी कानून पर चल रही है। देश में कृषि के लिए कोई कानून नहीं है और न इसपर आधारित कोई उद्योग। आज तक उनके उत्पादों की खरीद-बिक्री के लिए कोई सहकारी समिति तक नहीं बनायी गयी हैं और न ही उन्हें उत्पादों का सही मूल्य ही मिल पाता है। किसानों का मानना है कि बिना उनका राष्ट्रव्यापी संगठन बने उनकी बात कोई सुननेवाला नहीं है और विज्ञान व तकनीक का किसानोन्मुखी बनें बिना उसका फायदा उन्हें मिलनेवाला नहीं। उनका कहना है कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन पर आज बहुत बहस-मुबाहिसा हो रहा है जबकि उन्होंने इस तरह के जलवायु परिवर्तन को रोज झेला है। लेकिन इसकी कोई सुध लेनेवाला नहीं है। उनकी मांग हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तरह ही सार्वजनिक खरीद प्रणाली स्थापित होनी चाहिए, जिससे किसान अपने गांव या क्षेत्र के केंद्र पर ही अपनी जिंसों को बिना बिचौलिये के बेच और खरीद सकें। उनकी मांग है कि उनकी जरूरतों की पूर्ति और जानकारी देने के लिए एकल खिड़की प्रणाली भी स्थापित की जाए।

किसानों द्वारा व्यक्त इस तरह के विचार उस समय सामने आए जब देहरादून स्थित हेस्को नामक संगठन के प्रमुख प्रोफेसर अनिल जोशी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय दल इसी साल 12 जनवरी से 16 मार्च तक कन्याकुमारी से देहरादून तक कि `किसान साइकिल यात्रा´ पर था। प्रो। जोशी जाने-माने पर्यावरणविद है और 2006 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने 1976 से 1997 तक गढ़वाल विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र का अध्यापन किया। इसी दौरान उन्होंने अपने शोध छात्रों को लेकर 1979 मे एक संगठन बनाया और बाद में विश्वविद्यालय से इस्तीफा देकर देहरादून के पास शुक्लापुर गांव में संगठन का काम कर रहे है। जोशी का कहना है कि संगठन और साइंस को जोड़ कर ही देश और किसानों का भला हो सकता है।

अपनी या़त्रा का विवरण देते हुए जोशी बताते है। कि लगभग हर जगह किसानों ने एक ही मांग की कि देश में एक कृषि कानून बने, वाटर बॉडी एक्ट बने और कृषि को संघ सूची में रखा जाए। किसान पानी की समस्या के निपटने के लिए तालाबों का उद्धार और उसका उपयोग सुनिश्चित करना चाहते हैं जिसमें सरकार सहायता और नीति का सहयोग मिलना आवश्यक है। वे एक किसान बैंक भी चाहते हैं जो उन्हें बीज खाद से लेकर हर तरह की जानकारी और ऋण प्रदान करे।

जोशी अपना अनुभव बताते हैं कि केवल सेज के कारण ही नहीं, बल्कि हाईवे के कारण भी बड़ी मात्रा में कृषि जमीन घटी है। हाईवे के किनारे की लगभग जमीन रिएल इस्टेट में चली गयी है। किसानों की मांग है कि अगर जरूरी कारणों से उनकी जमीन उद्योगों के लिए ली जाती है तो उन्हें नगद मुआवजा देने के बजाये उन उद्योगों में शेयर दिया जाए।

किसानों ने रास्ते में बताया कि कृषि क्षेत्र में आ रही समस्या और खाद्यान्न की कमी अब केवल किसान की समस्या नहीं रही बल्कि यह आम आदमी की समस्या बन गयी है। वह भारत हो या हैती-सेनेगल, हर जगह कृषि क्षेत्र में आ रही समस्याओं और नुकसान का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा हैं। उन्होंने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश से लेकर कश्मीर और उत्तराखंड के किसानों के बातचीत के आधार पर बताया कि उन्हें कृषि ऋण माफी की बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिला है और समर्थन मूल्य जेसी सरकारी योजनाओं से उनका कोई लेना-देना नहीं, क्योंकि देश का 79 फीसदी किसान सीमांत है जो बहुत कम ही अपना अनाज बेचता है। बेचता भी है तो उसकी मजबूरी देख व्यापारी अपनी कीमत पर उसे खरीदते हैं, जो समर्थन मूल्य से आधी तक होती है।

Thursday, May 22, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य 4

पहली किस्त, दूसरी किश्त, तीसरी किस्त

समाजवादी विचारक सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा 11 मई को आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र के पुन: सक्रिय होने के मौके पर आयोजित संगोष्ठी में प्रस्तुत पर्चे की चौथी व अंतिम किस्त

अगर हम अपनी संप्रदायवादी (Sectarian के अर्थ में) दृष्टि से ऊपर उठकर विचार करेंगे तो पाएंगे कि मानव श्रम की गरिमा जो माक्र्स के मूल्य के श्रम सिद्धांत का आधार है, वही गांधी की के `ब्रेड लेबर´ का भी आधार है और गांधी का अंतिम आदमी आज माक्र्स के सर्वहारा का असली प्रतिनिधि है। वर्तमान अत्यधिक स्वचालित और कंप्युटरीकृत प्रतिष्ठानों में काम करनेवाला कुशल मजदूर नहीं।

तो फिर आज समाजवाद की चुनौती यह है कि आधुनिक उद्योग और सामाजिक व्यवस्था में हासिये पर डाल दिया गया मजदूर व्यवस्था के केंद्र में फिर कैसे आएगा। इसके लिए कैसे सामाजिक बदलाव और नयी संरचनाओं की जरूरत होगी।

यह परिवर्तन युगान्तरकारी होगा और संसार भर में व्यवस्थाओं में जमे हुए निहित स्वार्थों और उन्हें कायम रखनेवाले संस्थाओं के संगठनों को तोड़ने की जरूरत होगी। पिछले हिंसक क्रांतियों के नतीजों को देखते हुए इस नयी क्रांति को अहिंसक होना होगा लेकिन राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन के संकल्प के साथ।

अहिंसक परिवर्तन के सबसे सशक्त औजार लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया के भरपूर इस्तेमाल को विशाल पैमाने पर सिविल नाफरमानी और सत्याग्रह जैसे संघर्षों से जोड़ना होगा। जो वास्तव में गांधी के आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध हैं उन्हें गांधी के जीवन एवं विचारों को रामलीला और कृष्णलीला की तर्ज पर Ritual (कर्मकांड) बनाने की जगह समाज में सशक्त हस्तक्षेप का हथियार बनाना होगा। माक्र्सवादियों को तो अपने Mind set को आमूलचूल रूप से बदलना होगा। अगर इस दिशा में पहल नहीं हुई तो दोनों ही विचार के लोग वर्तमान चुनौतियों के लिए अप्रासंगिक हो जाएंगे और अपने अलग-अलग जप-जाप में जीवन गुजार देंगे। इधर मानवीय संबंधों के अवमूल्यन और पर्यावरण के क्षय से संसार विनाश की ओर जाएगा।

Tuesday, May 20, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य 3

पहली किश्त और दूसरी किश्त क्रमश:

जो बात पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था को सभी पूर्ववर्ती उत्पादन व्यवस्थाओं से अलग करती है, वह है उत्पादन का आवश्यकताओं से निर्भरता से मुक्त हो जाना। सभी पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं मे चाहे वह कबिलाई, चाहे नगर राज्य चाहे सामंत रही हो, उत्पादन समाज की किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए होता था। चाहे यह आवश्यकता आमजन की हो या अभिजन की। मसलन सामंतो के साज-सज्जा, आभूषण, तख्त-ताज या बख्तर की। आवश्यकता पूर्ति हो जाने पर उत्पादन पर विराम लग जाता था।

लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का एक मात्र लक्ष्य उत्पाद की बिक्री और उससे मुनाफा कमाना होता है। इससे पुरानी कहावत के विपरीत जिसमें आवश्यकता को अविष्कार की जननी माना जाता था, पूंजीवादी व्यवस्था का एक बड़ा उद्यम आवश्यकताओं का आविष्कार है। इसके लिए बड़ी- बड़ी प्रयोगशालाएं अरबों रुपये के खर्च से कार्यरत रहती हैं। चूंकि यह आवश्यकताएं जीवन की किसी मूलभूत जरूरतों को पूर्ति नहीं करतीं, कभी भी इनके उत्पादन पर विराम नहीं लग सकता। कहीं-कहीं ये वस्तुएं जहरीली और घातक भी होती हैं, जैसे तम्बाकू या ठंडे पेय। प्राय: ये आदत डालनेवाली होती हैं, इससे इनकी मांग पर कभी विराम नहीं लगता। अन्ततोगत्वा, चूंकि इनके उत्पादन मे धरती के संसाधनों का इस्तेमाल करना होता है। इन सबका अंतिम परिणाम होता है पर्यावरण का क्षय और स्वयं मानव अस्तित्व का संकट।

दूसरी ओर व्यवस्थापकों और श्रमिकों के बीच घोर विषमता फैल गयी है। यह विषमता देशों, क्षे़त्रो और प्रत्येक क्षेत्र के वर्गों के बीच बढ़ी है। और यह सब उन्मुक्त पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर हो रहा है, जो कम से कम तात्कालिक रूप से उनके द्वारा भी अपनायी जा रही है जो क्रांतिकारी कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी होने का दावा करते रहे हैं। वे वही पुराना राग आज भी अलाप रहे हैं कि पूंजीवाद स्वयं वह आर्थिक आधार तैयार कर रहा है जिस पर समाजवाद की इमारत खड़ी होगी।

लेकिन पूरे परिदृश्य पर नजर डालने पर एक बात स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के तानाबाना की विशालता स्वयं संसाधनों और पर्यावरण के संकट का सबसे बड़ा कारक बन गयी है। फिलहाल कार्बन डायआक्साइड के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत मोटर वाहनों एवं हवाई जहाज का यातायात है। ये दोनों ही सीधा आर्थिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और राजनीतिक संबंधों, (जिनके साथ हथियारों की होड़ भी जुड़ी है) के फैलाव के नतीजे हैं।

इसका विकल्प फिर छोटी और स्वायत्त आर्थिक एवं राजनीतिक इकाइयों की ओर लौटना होगा। यहां पर गांधी की उस दस्तक पर विचार करने की जरूरत हो जाती है, जिसकी शुरू में (प्रथम किश्त देखें) चर्चा की गयी है। यह विचार करने का विषय है कि क्या नये समाजवादी आंदोलन में गांधी और मार्क्स के समन्वय का आधार तैयार हो रहा है ?

... जारी

Monday, May 19, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं, नये लक्ष्य २

पहली किश्त क्रमश:

यह मोटामोटी माना जाता था कि उत्पादन की तकनीक या तकनीक की दिशा वही होगी जो पूंजीवाद ने विकसित की है। सिर्फ स्वामित्व और उत्पादित वस्तुओं के वितरण की व्यवस्था बदलेगी स्वामित्व सामाजिक होगा और वितरण पूर्ण समता पर आधारित।

लेकिन न तो उन देशों में जहां समाजवादी बदलाव के लिए हिंसक क्रांतियां हुई और न पश्चिमी यूरोप की संपन्न अर्थव्यवस्थाओं में, जहां चुनावी प्रक्रिया से समाजवादी पार्टियां सत्ता में आईं और समाजवाद की दिशा में परिवर्तन का प्रयास किया, समतावादी समाज स्थापित करने में विशेष सफलता मिल पायीं। जहां हिंसक क्रांतियां हुईं, वहां तो घोर तानाशाही पैदा हुई और इसमें जिनके हाथ में अनियंत्रित सत्ता आयीं उन्हें अनियंत्रित सुविधाएं भी मिलने लगीं। जहां चुनाव प्रक्रिया से समाजवादी कहे जानेवाले लोगों को सत्ता मिली, वहां संपत्ति के समाजीकरण के प्रयास आधे-अधूरे ही हुए और पार्टी के शीर्ष पर स्थापित समूह और राज्य की नौकरशाही मे विशिष्ट स्थान बनाये लोगों की सुविधाएं और आय काफी बढ़ गयीं। समता का लक्ष्य तो गौण ही होता गया। पर इससे भी बढ़कर चिंता की बात थी उत्पादन की दिशा जो अंतत: पर्यावरण के संकट की जनक बनी और अंतहीन विकास की कल्पना भी कोरा सपना लगने लगी।

परिवर्तन के लिए किये गये प्रयासों की स्थितियों यथा हिंसक क्रांतियों के साथ केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में सत्ता के केन्द्रीकरण या तानाशाही रूझान के अलावा दो कारक और थे जिनसे क्रांतियां अपने लक्ष्यों से दूर होती गयीं। एक तो स्वचालन और कम्प्युटरीकरण के कारण श्रमिकों के काम की समान स्थिति की जगह मजदूरों या कर्मचारियों में ही अत्यधिक सोपानवत (Hierarchical) व्यवस्था में विभाजन हो गया। इससे व्यवस्थापकों का महत्व उद्योगों और विनिमय दोनों ही स्तर पर अत्यधिक बढ़ गया। इसी अनुपात में आय और सुविधाओं के बंटवारे में भी अत्यधिक विषमता आ गयी। आज जिस तरह की आय कम्युटरीकृत व्यवस्था के चलते प्रबंधकों को मिल रही है वह पहले कल्पना से परे थी। अगर श्रमिकों और प्रबंधकों की भूमिका में यह गैर बराबरी निहित हो तो इस तरह के श्रम विभाजन में समता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसमें संपत्ति के स्वामित्व की भूमिका कुछ खास नहीं होती। प्राय: स्वामित्व और प्रबंधन एक ही व्यक्ति या समूह के हाथ मे होता है। विशाल धन अर्जन करनेवाली अनेक संस्थाएं तो सिर्फ प्रबंधन के ही व्यवसाय में लगी होती हैं। प्राय: इनमें अनेक काम सेवा क्षेत्र में आते हैं- मसलन बैंकिंग या होटल। इनमें अत्यधिक आय होती है लेकिन कार्यरत लोगों की संख्या अपेक्षातया बहुत कम होती है। अगर पूरी व्यवस्था ऐसी संस्थाओं के साथ में हो तो पूर्ण समता की कोई कल्पना नहीं कर सकता। लेकिन जो सबसे मारक स्थिति है वह पूंजीवादी उत्पादन के मूलभूत चरित्र में है।

.... जारी

Sunday, May 18, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य

मुजफ्फरपुर में 1965 में आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र की स्थापना की गयी थी। उस समय कांग्रेसी सरकार के आतंक इतने बढ़ गये थे कि लोग उसे अघोषित इमरजेंसी की तरह आज भी याद करते हैं। मुजफ्फरपुर में राजनीतिक आंदोलनों के केंद्र आर. डी. एस. कॉलेज में 10 दिसंबर 1966 को हुई पुलिस फायरिंग में गुरु-शिष्य शहीद हो गए थे। उस समय समाजवादी आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए एक तरह से संवाद केंद्र और शरण स्थली के रूप में उपयोग होता था इस केंद्र का। आंदोलन के पर्चे पोस्टर के अलावा यहां से कई महत्वपूर्ण प्रकाशन भी हुए। लेकिन बाद में समय के साथ यह निष्क्रिय हो गया। हाल ही में प्रोफेसर उदय शंकर जी ने इस केन्द्र को पु्नर्जीवित करने की पहल की और इसका फिर से शुभारंभ किया गया। 11 मई को इसकी उद्घाटन संगोष्ठी आयोजित की गयी, जिसमें 50 से अधिक लोग खासकर युवा उपस्थित थे। इस संगोष्ठी को समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा ने संबोधित किया। वर्तमान संदर्भ में समाजवाद का उपयोग और उसकी प्रासंगिकता पर उन्होंने एक संक्षिप्त नोट यहां पढ़ा। यहां हम 11 मई को प्रस्तुत संक्षिप्त नोट को किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं।

आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र की पुनर्स्थापना को हमें समाजवादी आंदोलन की नयी स्थापनाओं के साथ जोड़ना चाहिए। आचार्य नरेन्द्रदेव मा्र्क्सवादी थे और उनके या जेपी के प्रभाव में हमारी पीढ़ी के समाजवादियों ने समाजवाद का प्रथम पाठ मार्क्सवादी परंपरा में ही लिया था। इसमें शुरू करते थे स्वप्नवादी समाजवाद से फिर इस प्रक्रिया की परिणति वैज्ञानिक समाजवाद से और फिर सोवियत यूनियन या अन्यत्र इसमें जो विकृतियां आयीं, उनको क्रांति, देश और समाज की विशेष स्थितियों से जोड़कर समझने की कोशिश करते थे। आचार्य नरेन्द्रदेव केंद्र से ही प्रकाशित मेरी पुस्तक `समाजवाद के बढ़ते चरण´ में भी इसी परंपरा में समाजवादी आंदोलन और बाद की इसकी विकृतियों को समझने की कोशिश है।

इस पुस्तक के आधार में मूलत: मार्क्सवादी मान्यताएं हैं लेकिन गांधी के विचारों की दस्तक भी यत्र तत्र सुनी जा सकती है। मार्क्सवादी विचार की एक मूल स्थापना थी कि पूंजीवाद अपने विकास के क्रम में उत्पादन की वह व्यवस्था स्थापित करेगा जिसके आधार पर समाजवादी समाज की ओर संक्रमण होगा। समस्या एक ही रहेंगी, उत्पादन के साधनों पर से पूंजीवादी स्वामित्व को समाप्त करना। इसके साथ ही गैर-बराबरी, वर्गीय वर्चस्व और फिर शोषण की व्यवस्था को कायम रखने वाली राज्य व्यवस्था का विघटन शुरू होगा और एक ऐसा समाज बनेगा जिसमें सभी क्षमता के हिसाब से काम करेंगे और सबको आवश्यकता के हिसाब से आपूर्ति होगी।
.... जारी

Tuesday, April 29, 2008

पहले यह दीवार तो गिरे

गुवाहाटी से शिवसागर जाते समय नेशनल हाईवे के दाएं किनारे लंबी-ऊंची दीवार के बारे में पूछने पर सहयात्रियों ने बताया कि यह मेघालय और असम के बीच खड़ी की गई दीवार है। पूर्वोत्तर में इस तरह की स्थितियों को लोग वहां के परिप्रेक्ष्य में सामान्य घटना मान सकते हैं। लेकिन पिछले दिनों महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक गांव में इसी तरह की स्थिति दिखी, जो काफी गंभीर है।

भीमनगर और दरे नामक गांवों में इसी तरह की दीवार बनाई गई है। यह दीवार दो गांवों के बीच आपसी रंजिश के कारण नहीं बल्कि एक गांव के दलित होने के कारण खड़ी की गई है। जब कोयना बांध बन रहा था तो वहां से विस्थापितों को बसाने के लिए भीमनगर बसाया गया था। शुरू में यहां कुछ दलित परिवार ही थे। बाद में यहां मराठों को लाकर बसाया गया। इसके बाद दलितों के पास वाले हिस्से का नाम दे दिया गया दरे और यहां मराठे आ गए। दलितों की कम्युनिटी हॉल को भी दरे में कर लिया गया। अब दरे के मराठों ने दलित बस्ती भीमनगर को अलग करने के लिए 10 फीट ऊंची और करीब 150 फीट लंबी दीवार खड़ी कर दी है। इसके बारे में मराठों की ओर से बताया गया है कि स्कूल के मैदान की रक्षा के लिए दीवार बनाई गई है, लेकिन यह केवल बहाना है।

यह तो सतारा के एक गांव की घटना है लेकिन अगर हम गौर से देखें तो पूरे देश में समाज का कमोबेश यही हाल है। देश को एक करने के लिए पहले इन बांटनेवाली दीवारों को गिराने की जरूरत है। चाहे वह मेघालय और असम के बीच हो या दरे व भीमनगर के बीच।

Monday, April 28, 2008

मौत के नाले

देश भर में गंदे नालों की सफाई में लगे नगर निगमों के कर्मचारियों की दशा सुधारने के काम में लगी एक संस्था नेशनल कंपेन फॉर डिग्निटी एंड राइट ऑफ सीवेज वर्कर्स ने पिछले महीने दिल्ली में जन सुनवाइयों का आयोजन किया। इनमें नाले साफ करनेवाले बहुत से कर्मचारी शामिल हुए और उन्होंने अपनी परेशानियां भी बतायीं। संगठन और कुछ दूसरे सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों के आधार पर कुछ सरकारी त्रुटि तो कुछ इन कर्मचारियों की लापरवाही की बातें भी की।

राजधानी के चारों दिशाओं में पहले जन सुनवाई के बाद इनका निष्कर्षात्मक सम्मेलन गांधी शांति प्रतिष्ठान में 6 अप्रैल को हुआ। इस बारे में हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रकार निवेदिता खांडेकर की एक रिपोर्ट अखबार में प्रकाशित हुईं। यह रिपोर्ट निवेदिता ने मुझे मेल किया है। इससे पहले की दो जन सुनवाइयों में मैं खुद भी शामिल हुआ था। इससे पहले भी गुजरात हाईकोर्ट के इस संबंध में दिशा-निर्देश वाले फैसले के आलोक मे दो लेख मैंने जनसत्ता में लिखे थे। तीसरा लेख यहां ब्लॉग पर प्रकाशित किया था। इस बार प्रस्तुत है विभिन्न जन सुनवाइयों और निवेदिता की रिपोर्ट पर आधारित यह संक्षिप्त पोस्ट।

सीवेज वर्कर्स को एक प्लेटफार्म मुहैया कराने के उद्देश्य से उक्त संस्था ने राजधानी के विभिन्न इलाकों में जो जन सुनवाइयां आयोजित की उनमें शामिल होने आए सीवेज कर्मियों ने अपनी समस्याओं और इस खतरनाक काम के माहौल को विस्तार से प्रस्तुत किया। दुखद बात यह है कि अनेक बार दिशा निर्देश जारी होने के बावजूद इन कर्मियों को सुरक्षा उपकरण नहीं दिए जाते और ये लोग मूलभूत मानवीय सम्मान, स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन यापन के मौलिक अधिकारों से भी वंचित किए जाते हैं।
इस संस्था ने दिल्ली के डाबरी इलाके में 2006 में तीन मजदूरों की सीवर के अंदर हुई मौत के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में 2007 में एक जनहित याचिका दायर की थी। दिल्ली जलबोर्ड ने इस याचिका पर अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि पिछले दो सालों में सीवरो में 36 कर्मियों की मौत हुई हैं। लेकिन संस्था की समन्वयक हेमलता कंसोटिया के अनुसार असल में प्रति वर्ष केवल दिल्ली में 100 सीवर कमीZ अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। उनका कहना है कि अधिकारी केवल उन्हीं मौतों को सीवर मौत मानते हैं जो सीवर के अंदर काम करते हुए होती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अनेक कर्मी सीवर में घुसने के कारण हुई दूसरी तरह की बीमारियों से भी मर जाते हैं। इनमें जहरीली गैंसों से होनेवाली स्वास्थ्य की क्षति और संबंधित अन्य बीमारियों के कारण हुईं मौतें भी नहीं गिनी जातीं।

दिल्ली असंगठित मजदूर यूनियन के महासचिव मोहम्मद अमजद हसन गुजरात हाईकोर्ट के दिशा निर्देश को इस दिशा में मील का पत्थर मानते हैं, लेकिन जरूरत इसके लागू करने की हैं। कर्मियों और इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के अनुभवों से जो बातें निकल कर आई, उनमें प्रमुख यह थी कि कर्मियों को सीवर में उतरते वक्त कई सुरक्षात्मक उपकरण उपलब्ध कराएं जाएं और सीवर के लिए कई बातों की जानकारी भी उन्हें देकर निगमों द्वारा उसका पालन कराया जाए। साथ ही 1999 से कर्मियों की खाली जगहों को भी नियुक्ति द्वारा भरा जाना चाहिए। क्योंकि समुचित संख्या में कर्मचारी न होने के कारण एक ही कर्मी को कई कर्मियों के बदले सीवर में उतरना पड़ता है जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। सुरक्षा संबंधी जागरुकता न होने के कारण 90 फीसदी से अधिक सीवर कर्मी रिटायर होने से पहले ही स्वर्ग सिधार जाते हैं। कोशिश करने के बावजूद दिल्ली जल बोर्ड के मुख्य कार्यकारी टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं हुए हैं।

Thursday, April 24, 2008

हिंसा की अप्रासंगिकता पर कुछ संदर्भ

समाजिक और राजनीतिक उद्देश्य के लिए हिंसा आम जनता के व्यापक हित में कितनी अप्रासंगिकता, निरर्थक और आत्मघाती होती है, इतिहास में इसके प्रमाण भरे पड़े हैं। मैंने कल कुछ का जिक्र भर किया था। आज यहां प्रस्तुत है समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिंन्हा की पुस्तक से कुछ उद्धरण। सच्चिदा जी ने सन 2000 में `नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट´ नामक पुस्तक लिखी थी। उसका नया संस्करण हाल में ही रोशनाई प्रकाशन, उत्तर कांचड़ापाड़ा से प्रकाशित हुआ है। इस नये संस्करण में उन्होंने दो अध्याय जोड़े हैं जिनमें से एक है `हिंसा और समाज परिवर्तन´। इसी अध्याय के कुछ प्रसंग यहां दे रहा हूं।

... कार्ल मार्क्स ने फायरबाख पर अपनी अत्यंत संक्षिप्त टिप्पणी पर बहुचर्चित थीसिस में लिखा था, `सामाजिक जीवन मूलत: व्यवहार पर आधारित है। सभी गु्त्थियां जो सिद्धांत को रहस्यवादिता की ओर ले जाती है अपना बुदि्धसंगत समाधान व्यवहार में और इस व्यवहार की समझ में पा जाती हैं।´ यह दृष्टि बिल्कुल वैज्ञानिक है और किसी अवधारणा की सत्यता को प्रयोग की कसौटी पर परखने का सुझाव देती हैं। वर्तमान राजनीति के सामने, विशेषकर उस राजनीति के सामने, जो सिर्फ सत्ता का खेल होने के बजाय अपना लक्ष्य कुछ उदात्त मूल्य बतलाती हैं, परिवर्तन का साधन हिंसक हो या अहिंसक यह समस्या इसी तरह की अनिर्णीत गुत्थी बनी हुई है। इस तरह की गुत्थी को पिछले व्यवहारों के नतीजों की रोशनी में ही सुलझाया जा सकता है। यह विचार अनेक जटिलताएं इसलिए भी पैदा करता है क्योंकि सामाजिक लक्ष्यों के अलावा व्यक्तिगत जीवन और इसमें पैदा होनेवाली स्थितियों में भी आदमी इस दुविधा में रहता है कि वह हिंसा का रास्ता अख्तियार करे या अहिंसा का।

कुछ क्रांतियों पर

.... पहली क्रांति इंग्लैंड में सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में हुई जिसमें निरंकुश राजा चार्ल्स प्रथम के खिलाफ पार्लियामेंट के अधिकारों के लिए युद्ध हुए। इसमें टैक्स लगाने के पार्लियामेंट के अधिकार से लेकर धार्मिक आजादी तक का मुद्दा जुड़ गया था। राजा के राज्य करने के ईश्वर प्रदत्त अधिकार के साथ-साथ केंद्रीय राजधर्म का सबों द्वारा पालन करने की अनिवार्यता का मुद्दा भी जुड़ा हुआ था। क्रांति में राजा की पराजय हुई और उसे मृत्युदंड दिया गया। लेकिन इस हथियारी जंग के साथ धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता भी जुड़ती गयी। अंतत: सत्ता वहीं केंद्रित हुई जहां सबल सैन्य शक्ति थी। नतीजा हुआ क्रामवेल की तानाशाही की स्थापना। .... बाद में क्रामवेल की तानाशाही के खिलापफ ऐसा जन मानस बना कि क्रांतिकारियों की सत्ता फिर समाप्त हो गयी और राजशाही अपनी अति के साथ कायम हो गयी।

.... होता यह है कि हिंसक संघर्षों से उन मुद्दों को सदा नजरंदाज किया जाता है जो लोगों की समान मानवीयता को रेखांकित करते हैं और इसकी जगह भिन्नता के तत्वों को - जैसे धर्म, रंग, रहन-सहन के तौर-तरीके, भोजन- लिबास आदि के फर्क को चिहि्नत किया जाता है, जिससे प्रतिद्वंद्वी अमानवीय या हीन मानव दिखाई देने लगते हैं। ऐसी मानसिकता में विरोधियों के अस्तित्व को मिटाने का उन्माद पैदा होता है। मूल उच्छेद (Ethnic cleansing) वर्ग शत्रुओं का उन्मूलन आदि इसी मानसिकता की अभिव्यक्ति हैं।
.... दूसरी महान क्रांति 1789 में फ्रांस में हुई। यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के तीन लक्ष्यों ने, जिसका उद्घोष इस क्रांति में हुआ, संसार में न सिर्फ अन्याय के प्रतिकार मे हुए पूर्ववर्ती आंदोलनों के लक्ष्यों को अपने में समेटा बल्कि उस आधार को भी खड़ा किया जिस पर बाद में होनेवाली क्रांतियों ने अपने उद्देश्यों को अमली जामा पहनाने की कोशिश की। ... राजा लुई सोलहवें को फांसी दी गयी और रॉब्सपियर के नेतृत्व में गरीब तबकों पर आधारित जैकोबिन का राज कायम हुआ। ... ये लोग अपना आतंक का राज स्थापित करते हैं जिसके तहत भारी संख्या में संदेह के आधार पर लोगों को गिलोटिन पर मृत्युदंड दिया जाता है। इस तरह दांते, रेमूली तथा पूर्व के अनेक नेताओं को मौत के घाट उतार दिया जाता है। लेकिन इस अति की प्रतिक्रिया होती है। ... बारा और तालिएं जैसे नेताओं द्वारा षडयंत्र कर और इसमें सैनिकों को शामिल कर रॉब्सपीयर को घेर लिया गया और घायल कर दिया गया। इसी घायल अवस्था में घसीट कर उसे भी गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया। इस आतंरिक संघर्ष में सैनिक हस्तक्षेप की परिणति हुई नेपोलियन के उदय में। ... इस तरह महान लोकतांत्रिक आदर्शों के लिए शुरू की गयी क्रांति का अंत हुआ नेपोलियन के साम्राज्य में।


..... तीसरी महान क्रांति बीसवी सदी की बोल्शेविक क्रांति थी, जिसका उद्देश्य फ्रांस की लोकतांत्रिक क्रांति से एक कदम और आगे बढ़कर समता के सिद्धांत को राजनीति से आगे बढ़ा आर्थिक क्षेत्र में भी स्थापित करने का था। ... रूस की विशेष परिस्थिति में एक बिखरी राज्य व्यवस्था के मुकाबले बोल्शेविकों की संगठित जमात ने जन मानस को अपनी ओर मोड़ सत्ता अपने हाथ में ले ली। लेकिन वे समूह जिनकी आकांक्षाएं इससे ध्वस्त हुईं थीं, इससे आहत थे और सोवियत सरकार की वैधता को नकारते हुए उन्होंने इसके खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया। इस तरह वह गृहयुद्ध शुरू हुआ जो चार वर्षों तक चला। इस दौरान प्रतिद्वंद्वियों के बंदियों को हॉस्टेज बनाने तक की नीति अपनाई गयी( प्रारंभिक दौर में इसे प्रजातांत्रिक युद्ध कहा गया। लेकिन आत्मरक्षा और विजय की लालसा ने उन्हें उन सारी मान्यताओं को ताक पर रखने को मजबूर कर दिया जिसके लिए लोकतांत्रिक क्रांति की जरूरत महसूस की जाती है। .... 1928 मे भूमि के सामूहिकीकरण की नीति अपनाई गयी। किसानों के विरोध को घोर दमन से दबाया गया। इस प्रक्रिया में विरोध करने के अपराध में लाखों किसानों को उजाड़कर दूरदराज के स्थानों पर तरह-तरह के श्रम में, लगाया गया। अनुमान है कि इसमें लगभग एक से डेढ़ करोड़ लोग भोजन की कमी या दूसरे कारणों से मर गए। आखिर में हिंसक शक्ति के बल एक आदर्श समाज स्थापित करने की परिणति हुई स्टालिन की घोर तानाशाही में। जब लोगों ने दशकों बाद इस तानाशाही को नकारा तो व्यवस्था इतनी बिगड़ चुकी थी कि समाज का पूरा ढांचा बिखरने लगा और पुनर्स्थापना उसी पूंजीवादी व्यवस्था में हुई जिसे खत्म करने के संकल्प के साथ बोल्शेविक क्रांति हुई थी।

..... रूस की क्रांति से प्रेरणा ले चीन, वियतनाम, क्यूबा, कंपूचिया आदि कई देशों में, स्थितियों की भिन्नता से रणनीतियों के कुछ फेर-बदल के साथ, समाजवाद लाने के ऐसे ही प्रयास हुए। लेकिन लोकतांत्रिक और मानवीय समाज बनने के ऐसे सभी असफल हुए। ... परिणामों के आधार पर तो यही दिखाई देता है कि पिछले साढे़ तीन सौ वर्षों में हिंसा के बल समाज परिवर्तन के सभी महान प्रयास अपने उदात्त लक्ष्यों से भटकते गए हैं।

... जब सामाजिक लक्ष्य हासिल करने के लिए हिंसा को नकारा जाता है तब उन लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए दूसरे रास्तों की तलाश शुरू होती है। इसके बाद सत्याग्रह, असहयोग, सामूहिक हड़ताल जैसे माध्यमों का अवलंबन अपरिहार्य हो जाता है। हमारे समाज में महात्मा गांधी संयोग से उस बिंदु पर आते हैं जब संसार हिंसा के मार्ग पर चल विनाश के कगार पर पहुंच गया। इस अर्थ में वे वह प्रस्थान बिंदु हैं जहां से हमें आगे बढ़ना है। पिछले अनुभवों के मद्देनजर मानव अस्तित्व की रक्षा या किसी मानवीय समाज रचना का एकमात्र मार्ग अहिंसा ही दिखाई देती है। हिंसक माध्यमों के हजारों वर्ष के विकास की तुलना में यह बिल्कुल नया प्रयोग है। इसके नए रूपों की तलाश करनी है।

Wednesday, April 23, 2008

न ही वेरेन वेरानि संमंतिध कुदाचन

न ही वेरेन वेरानि संमंतिध कुदाचन।

अवेरेन ही संमंतिध ऐस धम्मो संनंतनो।।

(वैर से वैर को शांत नहीं किया जा सकता। अवैर या प्रेम ही इसका समाधान अच्छी तरह से कर सकता है और यही सनातन धर्म है। - धम्मपद)

ज्ञात मानव इतिहास में नैतिकता, समता और करुणा के शिखर पर बैठे भगवान बुद्ध ने अपनी इन पंक्तियों में हिंसा- अहिंसा को सर्वाधिक स्पष्ट किया है। वैसे सभी परंपराओं में इस तरह की अहिंसात्मक विचार ही मिलते हैं, जो केवल उपदेश या आचार संहिता के स्तर पर नहीं बल्कि मानव व्यवहार भूमि से अनुभव लेकर रचे गये हैं। यहां तक कि विध्वसात्मक महाकाव्य महाभारत का स्थायी भाव शांत इसलिए कहा गया है कि इस भारी विध्वंस और हिंसात्मक प्रकरण का अंतिम नतीजा निराशाजनक रहा। लक्षणा में महाभारत के बाद कलियुग का आगमन इस महाविनाशक युद्ध का ही नतीजा माना जा सकता है।

गांधी के अहिंसा संबंधी विचार को मैंने जिस हथियार के रूप रखा है, रियाजुल भाई उसे कोई तेजहीन और मजबूरी का दर्शन मान बैठे। दरअसल गांधी की अहिंसा जो हमारी भी प्रेरणास्रोत है, कोई मजबूरी न होकर एक अकाट्य हथियार है और इसीलिए मैंने उसे ब्रह्मास्त्र लिखा है। दुनिया में निरंकुश हो रहे सत्ता प्रतिष्ठानों के पास उपलब्ध असीमित हथियारो के सामने उससे कहीं घटिया हथियारों से संघर्ष करना न केवल बेवकूफी है बल्कि सफलता की भी बहुत ही क्षीण संभावना होती है। दुश्मन से लड़ने के लिए पहली जरूरत है कि उससे उम्दा हथियार हमारे पास हो और अहिंसात्मक संघर्ष के विभिन्न प्रकार निहत्थों को यह हथियार सर्वसुलभ कराते हैं। इस संबंध में भगत सिंह के विचार भी देखे जा सकते हैं। मुझे इस समय नक्सल कवि आलोक धन्वा की एक पंक्ति याद आ रही है " जब भगत सिंह फ़ांसी के तख्ते की ओर बढ़े/ तो अहिंसा ही थी उनका सबसे मुश्किल सरोकार।"

वैसे आधुनिक दुनिया में हम पाते हैं कि जहां कहीं भी हिंसा से जोर-जुल्म, जिसमें सत्ता द्वारा थोपे गए जोर-जुल्म भी शामिल हैं, को खत्म करने की कोशिश की गयी, उसका नतीजा भी कुछ महाभारत जैसा ही हुआ है। दुनिया में महान क्रांतियां में शुमार फ्रांस, रूस और चीन की क्रांतियों के बाद सत्ता प्राप्त करनेवालों ने वहां के आमलोगों पर कितना जुल्म किया, इसपर कुछ अलग से कहने की जरूरत नहीं। यह सब इतिहास में दर्ज है।

दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की अवधारणा जिस अहिंसात्मक संघर्ष पर आधारित थी, उसने न केवल उस समय के सबसे ताकतवर साम्राज्य से लोहा लेने में यहां के साधनहीन लोगों का मनोबल बढ़ाया बल्कि भविष्य की दुनिया को भी ऐसी सत्ताओं और साम्राज्यवाद से लोहा लेने का एक बेहतरीन हथियार उपलब्ध करा गया। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग, दक्षिण अफ्रीका में नेलशन मंडेला और बर्मा में आन सान सू की इसकी ज्वलंत मिशाल बन गई हैं। हाल के दिनों में पाकिस्तान और नेपाल में जनता के अहिंसात्मक संघर्षों का परिणाम दुनिया देख रही है।

हो सका तो हम इस बारे में कल भी कुछ संदर्भ सामग्री उपलब्ध कराएंगे।