प्रख्यात कवि त्रिलोचन बीमार हैं। त्रिलोचन कवि के साथ भारतीय भाषाओं खासकर हिन्दी और उसकी उपभाषाओं के शब्दों के मर्मज्ञ हैं। रामचरितमानस के शब्दों पर उनकी गजब की अचरज में डालने वाली पकड़ और व्याख्या है। फिलहाल शब्दों का ऐसा जादूगर शायद कोई नहीं। हमने महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का त्रिलोचन पर लिखा रेखाचित्र/संस्मरण शुरू किया था। उसकी दो किस्ते दी जा चुकी हैं। संस्मरण की किस्तों के साथ त्रिलोचन की कविताएं भी हमने पोस्ट की हैं। कविताएं संभव हुई तो आगे भी जारी रहेंगी। यह रेखाचित्र `स्थापना´ पत्रिका के सितम्बर 1970 के अंक में छपा था। अब यह भारत यायावर द्वारा संपादित और साहित्य अकादेमी सें प्रकाशित रेणु रचना संचयन तथा सुवास कुमार द्वारा संपादित और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के लिए मेधा प्रकाशन से प्रकाशित रेणु संचयिका में भी पढ़ा जा सकता है। यह संस्मरण हमारे मित्र धर्मेन्द्र सुशांत ने अनुरोध पर हमें उपलब्ध कराया। आज पढ़िये संस्मरण की तीसरी और अंतिम किस्त।
(त्रिलोचन (जी) को देखते ही हर बार मेरे मन के ब्लैक बोर्ड पर, एक `अगणितक´, असाहिित्यक तथा अवैज्ञानिक प्रश्न अपने-आप लिख जाता है : ``वह कौन-सी चीज है, जिसे त्रिलोचन में जोड़ देने पर वह शमशेर हो जाता है और घटा देने पर नागार्जुन...?´´ - इसी संस्मरण की अंतिम पंक्ति)
... उस बार, शम्भूनाथ मिश्र के घर पर त्रिलोचनजी का चिमटा गड़ा था। सुबह, जिस समय पहुंचा- करीब दस बजे त्रिलोचन के `प्रसाद´ पाने का समय था। (कबिराहा बाबाजी लोग भात को `प्रसाद´, जलपान को `बालभोग´ और नमक को `रामरस´ कहते हैं और कबिराहा गृहस्थ प्याज को `राम लड्डू!) ड्राइंग रूम में ही टेबुल के `कवर´ को हटाकर थाली लगा दी गयी। ... हमारे परिवार में, बचपन से ही बड़ों के भोजन के समय पास बैठकर `भोजन´ देखने की आदत डलवायी जाती थी। पंखा झलते हुए, पंखे से मक्खी उड़ाते हुए अथवा गिलास का पानी बदलते हुए, हम बड़ों का भोजन देखा करते। परिवार के `सन्तमति´ कर्ता का विश्वास था कि, इससे बालक परम `सन्तोषी´ होता है और भोजन करने का सही सलीका सीखता है। - सन्तोषी हुआ या नहीं, कह नहीं सकता। किन्तु लोगों के भोजन करने के इतनी तरह के तरीके, ढंग और आदतों को देखकर मानवचरित्र की विचित्रताओं पर मुग्ध अवश्य हुआ हूं। इसलिए, त्रिलोचन के भोजन के समय पहुंचना अच्छा ही हुआ। सोचा, अगर वे, भोजन काल में शरीर को एक `आइलैंड´ यानी `द्वीप´ समझनेवाले जीव हुए तो, मैं तब तक कुछ पढ़ने का बहाना करता हुआ- बैठा रहूंगा और, यदि वे, भोजन का रस लेते हुए प्रेमियों से `रसभरी बतियां´ करनेवाले हुए तो फिर क्या कहने! पापड़ टूटने की कुड़कुड़ाहट! चटनी अथवा अचार खाकर चटखारे लेते और हरी मिर्च को दांत से तनिक खोंटकर `सित्कार´ ...करते बातें करेंगे तो, सबकुछ एक ही साथ देखने-सुनने का मौका मिल जायेगा। (आलू का चोखा सानकर तैयार करना एक `आर्ट´ है और मुझे उसी दिन पता चल गया कि शम्भूनाथ के चौके-चूल्हे तक पर `आर्टिस्टों´ का कब्जा है।)
बहरहाल, खाते-खाते बातें होती रहीं और, उनके भोजन करने के ढंग से यह जानना बाकी नहीं रहा कि, त्रिलोचन का पेट `बुफे´ नामक किसी भोज में मेरी तरह कभी नहीं भर सकेगा। ... दूसरे देशों में क्या होता है, नहीं जानता। अपने देश के कई महानगरों में महाभोजों के इस बुफे (का व्युत्पत्ति) में शरीक होने के समय मुझे बार-बार एहसास हुआ है- `भारत और कितनी भूख है?´ झपट्टे मारते हुए चतुर चीलों (नर-मादा) से त्रिलोचन नहीं जीत सकेंगे। उन्हें कभी भी `चिकन´ का कोई बढ़िया `पीस´ नहीं मिल सकेगा। मुर्गी की मांसल `रान´ कभी हासिल नहीं कर सकेंगे!! इसलिए- ``अजी माल था! तुष्ट हूं यहां´´- कहने का कोई सवाल ही नहीं उठेगा। ``पहले खाना मिला करे तो कठिन नहीं है बात बनाना।´´
भोजन कर चुकने के बाद त्रिलोचन अन्य आगत सज्जनों से साहित्य-विषयक बातें करने लगे। हमारे एक भाषा-शास्त्री मित्र, अपनी पत्नी द्वारा लिखित व्यक्तिगत निबन्धों की सद्य:प्रकाशित पुस्तक ले आये थे। एक निबन्ध में `कैक्टस´ की चर्चा करते हुए-उसकी पुष्पहीनता पर तरस खाकर कुछ कहा गया था। मैंने कहा- ``किन्तु कैक्टस के भी फूल होते हैं। यानी फूलनेवाले कैक्टस भी होते हैं।´´... मैं कहना चाहता था- उदाहरण सामने है। अर्थात् त्रिलोचन, फूलनेवाला कैक्टस। कहा नहीं, क्योंकि इसके कुछ क्षण पूर्व ही, मुझे उनके उस सॉनेट की पंक्तियां याद आयीं थीं- जिसमें दशाश्वमेध घाट के `चित्र-कल्प´ हैं। सो मेरे लिए तो -
दशाश्वमेध घाट पर गंगा की धारा है
तट पर जल के ऊपर ऊंचे (भवन नहीं)
त्रिलोचन खड़े हैं ...।
कबीर को पढ़ते समय मेरा मन `भाई साधो´ का हो जाता है। फारसी के कवि जलालुद्दीन रूमी का मैंने नाम सुना ही है। अर्थात् विद्वानों के लेखों में उद्धृत उनकी कुछ पंक्तियों के भावानुवाद को पढ़कर ही रोम-रोम बजने लगते हैं। बंगाल के प्रसिद्ध बाउल-गायक लालन फकीर के गीतों को सुनते समय `देहातीत सुख´ का परस-सा पाया है और त्रिलोचन के सॉनेट पढ़ते समय यह देह-यन्त्र `रामुरा झिं झिं´ बजने लगता है और तन्मय-मन को लगता है -
वाणी से सावन फूटा ऋतुओं सहित,
भक्ति की गांठ कस गयी भींग-भींगकर,
आत्म-व्यंजना को जगा...।
(मैंने `आत्म-व्यंजना´ ही लिखा है न? आत्म-वंचना´ तो नहीं?)
सा-हे-ब! बं-द-गी!
बहरहाल, खाते-खाते बातें होती रहीं और, उनके भोजन करने के ढंग से यह जानना बाकी नहीं रहा कि, त्रिलोचन का पेट `बुफे´ नामक किसी भोज में मेरी तरह कभी नहीं भर सकेगा। ... दूसरे देशों में क्या होता है, नहीं जानता। अपने देश के कई महानगरों में महाभोजों के इस बुफे (का व्युत्पत्ति) में शरीक होने के समय मुझे बार-बार एहसास हुआ है- `भारत और कितनी भूख है?´ झपट्टे मारते हुए चतुर चीलों (नर-मादा) से त्रिलोचन नहीं जीत सकेंगे। उन्हें कभी भी `चिकन´ का कोई बढ़िया `पीस´ नहीं मिल सकेगा। मुर्गी की मांसल `रान´ कभी हासिल नहीं कर सकेंगे!! इसलिए- ``अजी माल था! तुष्ट हूं यहां´´- कहने का कोई सवाल ही नहीं उठेगा। ``पहले खाना मिला करे तो कठिन नहीं है बात बनाना।´´
भोजन कर चुकने के बाद त्रिलोचन अन्य आगत सज्जनों से साहित्य-विषयक बातें करने लगे। हमारे एक भाषा-शास्त्री मित्र, अपनी पत्नी द्वारा लिखित व्यक्तिगत निबन्धों की सद्य:प्रकाशित पुस्तक ले आये थे। एक निबन्ध में `कैक्टस´ की चर्चा करते हुए-उसकी पुष्पहीनता पर तरस खाकर कुछ कहा गया था। मैंने कहा- ``किन्तु कैक्टस के भी फूल होते हैं। यानी फूलनेवाले कैक्टस भी होते हैं।´´... मैं कहना चाहता था- उदाहरण सामने है। अर्थात् त्रिलोचन, फूलनेवाला कैक्टस। कहा नहीं, क्योंकि इसके कुछ क्षण पूर्व ही, मुझे उनके उस सॉनेट की पंक्तियां याद आयीं थीं- जिसमें दशाश्वमेध घाट के `चित्र-कल्प´ हैं। सो मेरे लिए तो -
दशाश्वमेध घाट पर गंगा की धारा है
तट पर जल के ऊपर ऊंचे (भवन नहीं)
त्रिलोचन खड़े हैं ...।
कबीर को पढ़ते समय मेरा मन `भाई साधो´ का हो जाता है। फारसी के कवि जलालुद्दीन रूमी का मैंने नाम सुना ही है। अर्थात् विद्वानों के लेखों में उद्धृत उनकी कुछ पंक्तियों के भावानुवाद को पढ़कर ही रोम-रोम बजने लगते हैं। बंगाल के प्रसिद्ध बाउल-गायक लालन फकीर के गीतों को सुनते समय `देहातीत सुख´ का परस-सा पाया है और त्रिलोचन के सॉनेट पढ़ते समय यह देह-यन्त्र `रामुरा झिं झिं´ बजने लगता है और तन्मय-मन को लगता है -
वाणी से सावन फूटा ऋतुओं सहित,
भक्ति की गांठ कस गयी भींग-भींगकर,
आत्म-व्यंजना को जगा...।
(मैंने `आत्म-व्यंजना´ ही लिखा है न? आत्म-वंचना´ तो नहीं?)
सा-हे-ब! बं-द-गी!
(मैत्री की ओर से भी, इस कामना के साथ कि त्रिलोचन जल्द ही स्वस्थ होकर फिर से काव्य रचना क्षेत्र में विचरण करेंगे)




1 टिप्पणियाँ:
तीनों भाग पढ़ लिये. इस सुन्दर कार्य के लिये साधुवाद.
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