Saturday, September 1, 2007

आदमी पर ३ कविताएँ

क्या देखा है तुमने
नर को नर के आगे हाँथ पसारे
क्या देखा है तुमने
उसकी आंखों में खारे फव्वारे
हाँ, देखा है, फिर भी कहते हों
तुम नहीं हो विप्लव कारी
फिर तो तुम कायर हो
या महा भयंकर अत्याचारी.
- बाल कृष्ण शर्मा "नवीन"
साधारणतः मौन अच्छा है,
किन्तु मनन के लिए
जब शोर हो चारों ओर
सत्य के हनन के लिए।
तब तुम्हें अपनी बात
जोरदार शब्दों में करनी चाहिए
सर कटाना पडे या न पडे
तैयारी तो उसकी
होनी ही चाहिए।
- भवानी प्रसाद मिश्र
एक आदमी रोटी खाता है
एक आदमी रोटी बेलता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी खाता है न रोटी बेलता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता हैं।
मैं पूछता हूँ यह तीसरा
आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन हैं।
- सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

Friday, August 31, 2007

राष्ट्र को देखने का नजरिया

अतुल कुमार
भी कुछ साल पूर्व ही भारत के राष्ट्रगान को लेकर बडा विवाद छिड़ गया था। एक प्रसिद्ध खिलाड़ी ने सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा भी कर दिया कि गान से सिंध शब्द हटा देना चाहिए। देश की आबादी का एक हिस्सा भी इससे सहमत लगता है। कोर्ट द्वारा यह याचिका खारिज कर देने के बाद विवाद तो खत्म हो गया लेकिन इस बहाने राष्ट्र और इसके विकास पर बहस जरूरी है। ताकि लोगों में इस बारे में सही तस्वीर रखी जा सके। उस याचिका में मांग की गयी थी कि सिंध चूंकि पाकिस्तान में चला गया है, इसलिए देश के राष्ट्रगान में इसे रखने से पड़ोसी की संप्रभुता का उल्लंघन होता है। लेकिन उन्हें शायद यह पता नहीं है कि भारत की 1 अरब 10 करोड़ आबादी में से करीब 80 फीसदी लोग हिन्दू कहलाते हैं जो सिंधू शब्द के मुगलों द्वारा किया गया उच्चारण है।
इसके अलावे यूरोपियनों द्वारा प्रयुक्त इंडिया शब्द भी इसी सिंधू और हिंदू का परिवर्तित रुप है। हिमालय से निकलने सिंधू नदी जो पाकिस्तान होते हुए अरब सागर में गिरती है, भारत में 300 किलोमीटर लंबी बहती है। लेकिन इन सबसे जरूरी है उस मानसिकता को समझना जिसके कारण इस तरह के सवाल अकारण ही उत्पन्न होते रहते हैं। दरअसल राष्ट्र को राज्य की सीमाओं में बंांधकर कर देखने की प्रवृत्ति उस खतरनाक मानसिकता का परिणाम है जिसका विस्तार हिटलर के राष्ट्रवाद और नस्लीय आधार पर व्यापक जनसंहार में देखा जा सकता है। या फिर जीती गयी आबादी को समाप्त करने या खदेड़ दिये जाने की यूरोप की प्राचीन प्रवृत्ति में देखने को मिलता है। इसका फैलाव भारत मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके विभिन्न आनुषंगिक संगठनों द्वारा किया गया है।
दरअसल आज राष्ट्र को जिस नजरिये से देखा जाता है वह यूरोप की उस राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर आधारित है जिसकी पूर्णता नेपोलियन के युद्धों में देखा जा सकता है। यूरोप का मध्यकाल का इतिहास आपसी घृणा, और लोमहर्षक रक्तपात का रहा है। यहां सभ्यता का विस्तार ही किसी स्थान पर बसी आबादी को दास बनाकर, संहार कर या वहां से खदेड़कर हुआ है। इसी प्रक्रिया में अपने लोगों को एक साथ इकट्ठा रखने के लिए भावनात्म्क रूप से एक क्षेत्र विशेष को चिहि्नत कर अपनी सत्ता स्थापित की गयी और उसे एक नेशन का नाम दिया गया। भारत में आजादी के बाद समाजवादी विचारकों ने इस मुद्दे को शिद्दत से उठाया। चाहे वह 1962 के चीन से युद्ध के बाद की परिस्थिति हो या कट्टर हिंदूवादी संगठनों के विचारों का मुकाबला। स्व. किशन पटनायक ने अपनी पुस्तक `भारत शुद्रों का होगा´ और समाजवादी विचारक सfच्चदानंद सिंहा ने अपनी पुस्तक `मानव सभ्यता और राष्ट्र-राज्य´ में इस मुद्दे पर स्पष्टता से विचार किया है। भारत में राष्ट्र का विकास राज्य की सीमाओं से कहीं विस्तृत आधार पर सदियों की परंपरा और सांस्कृतिक आधार पर हुआ है। इसमें सैंकड़ों राज्यों का अस्तित्व साथ साथ स्वीकृत रहा है।
इतिहास का सिंहावलोकन करें तों लगभग छठी शताब्दी ईसा के आसपास जब इस क्षेत्र में सैंकड़ों राज्य स्थापित थे और अपने विस्तार के लिए एक-दूसरे पर आक्रमण करते रहते थे, उस समय राष्ट्र की एक अलग अवधारणा विकसित हो चुकी थी। इसकी अभिव्यक्ति विष्णु पुराण में भी एक श्लोक में मिलती है जिसका अर्थ है `उत्तर में जिसके हिमालय है और दक्षिण में समुद्र, उसे ही भारतवर्ष कहा जाता है और इसमें बसने वाले सभी भारतीय हैं।´ सिन्हा के अनुसार `भारत में राष्ट्र भाव का विकास अलग तरह से हुआ। यहां तथाकथित आर्य, यूनानी, शक, हूण, शिथियन, तुर्क, अफगान, मंगोल और दूसरी कितनी ही कबायली जमातें आती गयीं लेकिन यह नहीं हुआ कि एक जमात ने बाकी को खदेड़ कर किसी खास इलाके में अपने को स्थापित कर लिया हो। ़़़़़़़ भारत के विशेष इतिहास और यहां की विशेष परंपरा ने एक राष्ट्र या एक जन होने का बोध पैदा किया लेकिन एक राजकीय इकाई को जन्म नहीं दिया। ़़़़ कभी कभी जरूर ऐसा हुआ है, जैसा अशोक के समय, जब देश के ज्यादातर हिस्से में सम्राट की मातहती कबूल की गयी हो, पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि जिन्हें हम भारतीय उप महादेश कहते है, किसी एक भारत राज्य के हिस्से रहे हों। ़...... हमारी राष्ट्रीय चेतना राजकीय नहीं सांस्कृतिक रही है। हमारे लिए राष्ट्र का अर्थ कभी नेशन-स्टेट नहीं हुआ। ( वही, पृ. 3-4)।´ अगर हम राष्ट्रीय सोच को सही आकार देना चाहते हैं तो हमें इससे राज्य को अलग कर देखना होगा। भारतीय राष्ट्र इन भौतिक सत्ताधारित राज्यों की सीमारेखा से निरपेक्ष मानवीय संवेदनाओं, सांस्कृतिक संवाद, धार्मिक-वैचारिक सहिष्णुता और आसेतु हिमालय फैले विशाल क्षेत्र में बह रही मौलिक मानवीय गुणों की अंतर्धारा में रहा है। यही कारण है कि प्राचीन काल में गांधार से मथुरा तक बुद्ध की मूर्तियां एक साथ बन रही थीं तो मध्ययुग में भक्ति आंदोलन मानवता के उच्च शिखर की ओर उन्मुख था।
मणिपुर से महाराष्ट्र तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक चैतन्य, कल्हण, विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, नामदेव, नानक, रैदास से लेकर सुब्रह्मणियम भारती तक भाषा, क्षेत्र आदि की अनेकता के बावजूद अनायास एक स्वर में गा रहे थे। आजादी के बाद शुद्ध धार्मिक कट्टरता के आधार पर हुए विभाजन ने देश में संकीर्ण मानसिकता को फैलने का जो मौका दिया उसमें राष्ट्र के इन तत्वों का स्थान गौण होता चला गया और यूरोप से आयातित राष्ट्रवाद ने पैर फैला लिये। मुस्लिम लीग से लेकर आरएसएस तक ने धर्म और राज्य आधारित सीमाओं को राष्ट्र के रूप में स्वीकार कर पश्चिमी विचारधारा को ही मजबूत किया। इसमें यह प्रश्न भी गौण हो गया कि आखिर इस्लाम के नाम पर बना पाकिस्तान भीे क्षेत्रीय शोषण-दमन के कारण अपने को एक नहीं रख सका। अब भी पाकिस्तान के बलोचिस्तान, पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत और सिंध उससे मन से नहीं जुड़े हैं। यही हाल भारत के कश्मीर, पूर्वोत्तर के कई राज्यों का है। यदि देश में एकता स्थापित करने की बात करनेवालों को संस्कृति आधारित राष्ट्र की दिशा में ही बढ़ना चाहिए। लेकिन यह उस संकीर्ण विचाराधारा से अलग होगी जिसमें उप राष्ट्रीयताओं का सर्वग्रास कर बहुसंख्यकों की मनमाफिक संस्कृति थोपने की बात की जाती है। यह बिल्कुल सामन्जस्य और सहअस्तित्व पर आधारित होनी चाहिए। तभी भविष्य में कई राज्यों के होने के बावजूद तक्षशिला और विक्रमशिला को, गोवा और गुवाहाटी को, बोधगया और सिfक्कम के बौद्ध मठों को, गंगा- सिंधू और गोदावरी को हजरत बल और हुबली को, बद्रिकाश्रम-शृंगेरी- द्वारिका- पुरी को, अरुणाचल और उर्वशी को, सोमनाथ और कामरूप को तथा अमरनाथ और कन्याकुमारी को एक सूत्र मे पिरो कर रखा जा सकता है।

दक्षिण एशिया के लिए

अतुल कुमार
क्षिण एशिया के देशों के बीच आपसी संबंध सुधारने को लेकर 20 वर्ष पहले दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन अस्तित्व में आया। यह संगठन सरकार स्तर है और इनके सरोकार कूटनयिक व सरकारी स्तर पर ही तय होते है। कारण इसमें बहुत सारे पेंच फंसते रहते हैं। मसलन भारत-पाकिस्तान के बीच का तनाव या कूटनयिक पैंतरेबाजियां इसको आगे बढ़ने में रोड़ा अटकाती रहती हैं। म्यांमार में सैनिक तानाशाही, नेपाल में लोकतांत्रिक गतिविधियों और स्वतंत्रता पर राजशाही के हमले, बांग्लादेश में सत्ता-सरकार पर सेना की कुंडली तथा श्रीलंका में तमिल-सरकार संघर्ष की काली छाया इस संगठन पर मंडराती ही रहती है। इसी कारण कई बार इसकी नियत बैठकें भी स्थगित होती रही हैं। इसमें गोपनीय मसलों, दाव-पेंचों के कारण जनता के लिए इसका खुला इस्तेमाल नहीं हो सकता है। साथ ही दक्षिण एशिया में शांति, सद्भाव और एका तभी संभव हो सकती है जब इस क्षेत्र में देशों की आम जनता के बीच राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, व्यापारिक, शैक्षणिक, सामाजिक स्तर पर मेल-मिलाप और संपर्क के अवसर खोजे जाएं।
इसी कमी को पूरा करने के लिए और जनता से जनता के बीच अनजानापन को खत्म कर उन्हें एक-दूसरे को करीब लाने के उद्देश्य से `साउथ एशिया पीस एलायंस´ का गठन जन संगठनों के स्तर पर किया गया है। इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के विभिन्न जनसंगठनों को जोड़कर उनमे आपसी समझ पैदा करना है। एलायंस में फिलहाल भारत की दो संस्थाएं- गांधी शांति प्रतिष्ठान और एकता परिषद है। नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका के भी कई जनसंगठन इसके सदस्य हैं। एलायंस की कोशिश भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान में संपर्क सूत्रों को स्थापित और क्रियाशील करने की है। पर कई देशों में लोकतंत्र की कमी व सरकारी हस्तक्षेप के कारण एलायंस की राह बड़ी मुश्किल भरी है।
पिछले दिनों 5 से 8 जुलाई तक ग्वालियर में हुई एलायंस की बैठक के लिए बांग्लादेश और श्रीलंका के प्रतिनिधियों को भारत सरकार ने अंतिम समय में वीजा नही दिया। भूटान में फिलहाल राजशाही और नागरिक संगठनों के अभाव के कारण वहां सदस्य नही मिल रहे। इस संगठन में शामिल नया देश अफगानिस्तान घोर अशांति के दौर से गुजर रहा है। लेकिन जनसंगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थापित और स्थिर देशों की सरकारों का भी नागरिक समाज के स्तर पर चल रहे इस तरह के कायक्रमों के प्रति नकारात्मक रवैया हे( पिछले साल भी जब एलायंस की बैठक पाकिस्तान में निर्धारित थी, भारत और कई अन्य देशों के प्रतिनिधियों को पाकिस्तान सरकार ने वीजा देने से मना कर दिया था।
दfक्षिण एशिया में एका के लिए जरूरी है कि क्षेत्र के नागरिकों को अपनी सरकारों के खिलाफ जन जागरूकता पैदा करनी चाहिए। इन देशों में अहिंसक संघर्ष और शंति के लिए योगदान देने वाले प्रतीक पुरूषों का चयन कर उनके बारे में अन्य देश के सदस्यों को जानकारी दी जानी चाहिए। महात्मा गांधी, खान अब्दुल गफ्फार खान, आन सान सू की तथा अन्य देशों के ऐसे व्यक्तित्वों पर डाक्यूूमेंटरी तैयार कराकर सभी सदस्य देशों में व्यापक तौर पर प्रसारित की जानी चाहिए। सरकारों द्वारा राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और गोपनीयता के नाम पर एक देश के नागरिकों को दूसरे देशों में जाने से रोक देने की प्रवृत्ति का भी कड़ा विरोध नागरिक संगठनों के स्तर पर होना चाहिए। दरअसल सरकारें इन्हीं मुद्दों को उभारकर अपनी विफलता को छुपाती है खासकर तब जब उनके खिलाफ जन असंतोष भड़क रहा हो। संगठनों को पूरे दक्षिण एशिया में मुक्त आवागमन की छूट के लिए आंदेालन करना चाहिए। ऐसा होने से लोग दूसरे देशों में नागरिक अधिकार, लोकतंत्र, शिक्षा, विचारों आदि के क्षे़त्र में हो रहे विकास को देख-समझ पाएंगे।
इससे भी बड़ी बात यह होगी कि क्षेत्र के लोग सरकारी जुबान से नहीं, बल्कि अपनी आंखों से देखकर और अनुभव कर दूसरे देश के लोगों का अपने प्रति व्यवहारों का आकलन कर पाएंगे। फिलहाल जो आंशिक स्तर पर ही आवागमन चल रहा है उसके बड़े उत्साहजनक परिणम आ रहे हैं। यह अनुभव सरकारी नजरिये से भिन्न है। यदि एक बार दक्षिण एशिया में जनता के स्तर पर मुक्त आवागमन शुरू हो गया तो निश्चित है कि क्षेत्र के किसी देश में न तो सैनिक शासन या तानाशाही रह पाएगी और ही लोकतंत्र, मानवाधिकारों और सभ्य कानूनों का ही गला घोंटा जा सकेगा। लेकिन इस सीमा रूपी पहाड़ को तोड़ने के लिए जनजागरण रूपी विशाल हथौड़े की पहल की जरूरत है।

अधिनायक

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत भाग्य विधाता है
फटा सुथान्ना पहने जिसका
गुन हर चरना गाता है।

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
टॉप छुड़ा कर ढोल बजा कर
जय - जय कौन कराता है।

पूरब पश्चिम से आते हैं
नंगे बूचे नर कंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।

कौन-कौन है वह जन-गन-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

- रघुवीर सहाय
राष्ट्र गीत पर एक लेख अगले अंक मे