Saturday, September 1, 2007
आदमी पर ३ कविताएँ
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
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10:14 AM
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मैत्री मैत्री
Friday, August 31, 2007
राष्ट्र को देखने का नजरिया
मणिपुर से महाराष्ट्र तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक चैतन्य, कल्हण, विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, नामदेव, नानक, रैदास से लेकर सुब्रह्मणियम भारती तक भाषा, क्षेत्र आदि की अनेकता के बावजूद अनायास एक स्वर में गा रहे थे। आजादी के बाद शुद्ध धार्मिक कट्टरता के आधार पर हुए विभाजन ने देश में संकीर्ण मानसिकता को फैलने का जो मौका दिया उसमें राष्ट्र के इन तत्वों का स्थान गौण होता चला गया और यूरोप से आयातित राष्ट्रवाद ने पैर फैला लिये। मुस्लिम लीग से लेकर आरएसएस तक ने धर्म और राज्य आधारित सीमाओं को राष्ट्र के रूप में स्वीकार कर पश्चिमी विचारधारा को ही मजबूत किया। इसमें यह प्रश्न भी गौण हो गया कि आखिर इस्लाम के नाम पर बना पाकिस्तान भीे क्षेत्रीय शोषण-दमन के कारण अपने को एक नहीं रख सका। अब भी पाकिस्तान के बलोचिस्तान, पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत और सिंध उससे मन से नहीं जुड़े हैं। यही हाल भारत के कश्मीर, पूर्वोत्तर के कई राज्यों का है। यदि देश में एकता स्थापित करने की बात करनेवालों को संस्कृति आधारित राष्ट्र की दिशा में ही बढ़ना चाहिए। लेकिन यह उस संकीर्ण विचाराधारा से अलग होगी जिसमें उप राष्ट्रीयताओं का सर्वग्रास कर बहुसंख्यकों की मनमाफिक संस्कृति थोपने की बात की जाती है। यह बिल्कुल सामन्जस्य और सहअस्तित्व पर आधारित होनी चाहिए। तभी भविष्य में कई राज्यों के होने के बावजूद तक्षशिला और विक्रमशिला को, गोवा और गुवाहाटी को, बोधगया और सिfक्कम के बौद्ध मठों को, गंगा- सिंधू और गोदावरी को हजरत बल और हुबली को, बद्रिकाश्रम-शृंगेरी- द्वारिका- पुरी को, अरुणाचल और उर्वशी को, सोमनाथ और कामरूप को तथा अमरनाथ और कन्याकुमारी को एक सूत्र मे पिरो कर रखा जा सकता है।
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
9:51 AM
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मैत्री मैत्री
दक्षिण एशिया के लिए
इसी कमी को पूरा करने के लिए और जनता से जनता के बीच अनजानापन को खत्म कर उन्हें एक-दूसरे को करीब लाने के उद्देश्य से `साउथ एशिया पीस एलायंस´ का गठन जन संगठनों के स्तर पर किया गया है। इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के विभिन्न जनसंगठनों को जोड़कर उनमे आपसी समझ पैदा करना है। एलायंस में फिलहाल भारत की दो संस्थाएं- गांधी शांति प्रतिष्ठान और एकता परिषद है। नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका के भी कई जनसंगठन इसके सदस्य हैं। एलायंस की कोशिश भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान में संपर्क सूत्रों को स्थापित और क्रियाशील करने की है। पर कई देशों में लोकतंत्र की कमी व सरकारी हस्तक्षेप के कारण एलायंस की राह बड़ी मुश्किल भरी है।
दfक्षिण एशिया में एका के लिए जरूरी है कि क्षेत्र के नागरिकों को अपनी सरकारों के खिलाफ जन जागरूकता पैदा करनी चाहिए। इन देशों में अहिंसक संघर्ष और शंति के लिए योगदान देने वाले प्रतीक पुरूषों का चयन कर उनके बारे में अन्य देश के सदस्यों को जानकारी दी जानी चाहिए। महात्मा गांधी, खान अब्दुल गफ्फार खान, आन सान सू की तथा अन्य देशों के ऐसे व्यक्तित्वों पर डाक्यूूमेंटरी तैयार कराकर सभी सदस्य देशों में व्यापक तौर पर प्रसारित की जानी चाहिए। सरकारों द्वारा राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और गोपनीयता के नाम पर एक देश के नागरिकों को दूसरे देशों में जाने से रोक देने की प्रवृत्ति का भी कड़ा विरोध नागरिक संगठनों के स्तर पर होना चाहिए। दरअसल सरकारें इन्हीं मुद्दों को उभारकर अपनी विफलता को छुपाती है खासकर तब जब उनके खिलाफ जन असंतोष भड़क रहा हो। संगठनों को पूरे दक्षिण एशिया में मुक्त आवागमन की छूट के लिए आंदेालन करना चाहिए। ऐसा होने से लोग दूसरे देशों में नागरिक अधिकार, लोकतंत्र, शिक्षा, विचारों आदि के क्षे़त्र में हो रहे विकास को देख-समझ पाएंगे।
इससे भी बड़ी बात यह होगी कि क्षेत्र के लोग सरकारी जुबान से नहीं, बल्कि अपनी आंखों से देखकर और अनुभव कर दूसरे देश के लोगों का अपने प्रति व्यवहारों का आकलन कर पाएंगे। फिलहाल जो आंशिक स्तर पर ही आवागमन चल रहा है उसके बड़े उत्साहजनक परिणम आ रहे हैं। यह अनुभव सरकारी नजरिये से भिन्न है। यदि एक बार दक्षिण एशिया में जनता के स्तर पर मुक्त आवागमन शुरू हो गया तो निश्चित है कि क्षेत्र के किसी देश में न तो सैनिक शासन या तानाशाही रह पाएगी और ही लोकतंत्र, मानवाधिकारों और सभ्य कानूनों का ही गला घोंटा जा सकेगा। लेकिन इस सीमा रूपी पहाड़ को तोड़ने के लिए जनजागरण रूपी विशाल हथौड़े की पहल की जरूरत है।
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
3:19 AM
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मैत्री मैत्री
अधिनायक
राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत भाग्य विधाता है
फटा सुथान्ना पहने जिसका
गुन हर चरना गाता है।
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
टॉप छुड़ा कर ढोल बजा कर
जय - जय कौन कराता है।
पूरब पश्चिम से आते हैं
नंगे बूचे नर कंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गन-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।
- रघुवीर सहाय
राष्ट्र गीत पर एक लेख अगले अंक मे
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
2:04 AM
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मैत्री मैत्री



