दक्षिण एशिया के दो देश, एक राह, पर कितनी जुदा-जुदा
जब भारत के पड़ोस में पाकिस्तान और बांग्लादेश लोकतंत्र के लिए जद्दोजहद कर रहा है, इसके दो अन्य पड़ोसी लोकतंत्र की राह पर अग्रसर हैं। पर एक-दूसरे के पड़ोसी होने के बावजूद दोनों की राह कितनी जुदा हैं, यह बिल्कुल साफ है।
एक ओर नेपाल है, जहां 1950 से ही लोकतंत्र समर्थक आंदोलन चल रहा है। बीच-बीच में यह लोकतंत्र की राह पर कुछ चला भी, लेकिन तुरंत भटक भी गया, गिर भी गया। अभी छह-सात साल पहले काफी जद्दोजहद के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए तैयार हुए राजा वीरेन्द्र की परिवार समेत संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या कर दी गयी और उनके धूर लोकतंत्र विरोधी भाई ज्ञानेन्द्र गद्दी पर बैठे। बैठने के कुछ ही दिनों में उन्होंने वहां के राजनीतिक दलों को तहस-नहस करने का अभियान चलाया और अंन्तत: लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर खुद सत्ता हथिया ली। खैर देश के लोगों द्वारा अदम्य साहस से चलाये आंदोलन के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा और अब वे राजनीति और इतिहास के बियावान में ओझल होते जा रहे हैं।
वहीं दूसरा देश भूटान है जो विशालकाय गैर-लोकतांत्रिक चीन के साथ ही इस नेपाल का भी पड़ोसी है। वहां के लोगों में पहले से लोकतंत्र का कोई संस्कार भी नहीं रहा है। भूटान की दो राजनीतिक पार्टियां कभी भी लोकतंत्र नहीं चाहती थीं। इसका विचार चौथे सम्राट जिग्मे सिग्ए वांग्चुक का था, जिन्होंने दो साल पहले ही गद्दी अपने पुत्र के लिए त्याग दी थी। ऑक्सफोर्ड से शिक्षा पानेवाले पांचवें सम्राट जिग्मे खेसर निम्गेयाल वांग्चुक ने देश में लोकतंत्र लागू करने की योजना बनाई और कार्यरूप में परिणत किया। सोमवार को होनवाले संसदीय चुनाव के मतदान के लिए पिछले सप्ताह उन्होंने सभी मतदाताओं से वोट डालने को कहा था। भूटान की जनता शाही फरमान की अनदेखी नहीं करती और आज के मतदान में बड़ी संख्या में लोगों ने वोट डाले हैं। 47 सदस्यीय नेशनल असेंबली के लिए करीब 80 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले।
इसमें पूर्व प्रधानमंत्री जिग्मे थिंग्ले के नेतृत्व वाली ड्रक फुएनसुम त्शेग्पा नामक पार्टी ने 44 सीटें जीतकर बड़ी विजय पायी है जबकि चौथे राजा के साले और पूर्व प्रधानमंत्री सन्गय न्गेडुप के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को मात्र तीन सीटें मिली हैं। इसी के साथ ही इस हिमालयी देश और भारत के सबसे शालीन पड़ोसी देश में 100 साल पुरानी राजशाही का खात्मा होकर लोकतंत्र का सूरज निकल रहा है।
आइए, हम सब तहेदिल से भूटान में हो रहे इस परिवर्तन का स्वागत करें और इसके स्थायी होने की कामना करें। वाकई है न यह अपूर्व और सुंदर!
जब भारत के पड़ोस में पाकिस्तान और बांग्लादेश लोकतंत्र के लिए जद्दोजहद कर रहा है, इसके दो अन्य पड़ोसी लोकतंत्र की राह पर अग्रसर हैं। पर एक-दूसरे के पड़ोसी होने के बावजूद दोनों की राह कितनी जुदा हैं, यह बिल्कुल साफ है।
एक ओर नेपाल है, जहां 1950 से ही लोकतंत्र समर्थक आंदोलन चल रहा है। बीच-बीच में यह लोकतंत्र की राह पर कुछ चला भी, लेकिन तुरंत भटक भी गया, गिर भी गया। अभी छह-सात साल पहले काफी जद्दोजहद के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए तैयार हुए राजा वीरेन्द्र की परिवार समेत संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या कर दी गयी और उनके धूर लोकतंत्र विरोधी भाई ज्ञानेन्द्र गद्दी पर बैठे। बैठने के कुछ ही दिनों में उन्होंने वहां के राजनीतिक दलों को तहस-नहस करने का अभियान चलाया और अंन्तत: लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर खुद सत्ता हथिया ली। खैर देश के लोगों द्वारा अदम्य साहस से चलाये आंदोलन के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा और अब वे राजनीति और इतिहास के बियावान में ओझल होते जा रहे हैं।
वहीं दूसरा देश भूटान है जो विशालकाय गैर-लोकतांत्रिक चीन के साथ ही इस नेपाल का भी पड़ोसी है। वहां के लोगों में पहले से लोकतंत्र का कोई संस्कार भी नहीं रहा है। भूटान की दो राजनीतिक पार्टियां कभी भी लोकतंत्र नहीं चाहती थीं। इसका विचार चौथे सम्राट जिग्मे सिग्ए वांग्चुक का था, जिन्होंने दो साल पहले ही गद्दी अपने पुत्र के लिए त्याग दी थी। ऑक्सफोर्ड से शिक्षा पानेवाले पांचवें सम्राट जिग्मे खेसर निम्गेयाल वांग्चुक ने देश में लोकतंत्र लागू करने की योजना बनाई और कार्यरूप में परिणत किया। सोमवार को होनवाले संसदीय चुनाव के मतदान के लिए पिछले सप्ताह उन्होंने सभी मतदाताओं से वोट डालने को कहा था। भूटान की जनता शाही फरमान की अनदेखी नहीं करती और आज के मतदान में बड़ी संख्या में लोगों ने वोट डाले हैं। 47 सदस्यीय नेशनल असेंबली के लिए करीब 80 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले।
इसमें पूर्व प्रधानमंत्री जिग्मे थिंग्ले के नेतृत्व वाली ड्रक फुएनसुम त्शेग्पा नामक पार्टी ने 44 सीटें जीतकर बड़ी विजय पायी है जबकि चौथे राजा के साले और पूर्व प्रधानमंत्री सन्गय न्गेडुप के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को मात्र तीन सीटें मिली हैं। इसी के साथ ही इस हिमालयी देश और भारत के सबसे शालीन पड़ोसी देश में 100 साल पुरानी राजशाही का खात्मा होकर लोकतंत्र का सूरज निकल रहा है।
आइए, हम सब तहेदिल से भूटान में हो रहे इस परिवर्तन का स्वागत करें और इसके स्थायी होने की कामना करें। वाकई है न यह अपूर्व और सुंदर!




1 टिप्पणियाँ:
इस विषय पर मेरा एक शाही चुटकुला पढ़ें.
"सोनिया गाँधी - भूटान नरेश, आपने अपने देश में चुनाव करा कर एक सराहनीय काम किया है. अब आपका देश भी एक प्रजातांत्रिक देश हो गया है. इस के लिए आपको मेरी वधाई.
भूटान नरेश - महोदया आप का बहुत बहुत धन्यवाद. आपका देश तो पहले से ही एक प्रजातांत्रिक देश है, पर आप उस में प्रजातंत्र कब लागू कर रही हैं?"
link to blog -
http://kavya-kunj.blogspot.com/2008/03/blog-post_2782.html
Post a Comment