पहली किश्त और दूसरी किश्त क्रमश:
जो बात पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था को सभी पूर्ववर्ती उत्पादन व्यवस्थाओं से अलग करती है, वह है उत्पादन का आवश्यकताओं से निर्भरता से मुक्त हो जाना। सभी पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं मे चाहे वह कबिलाई, चाहे नगर राज्य चाहे सामंत रही हो, उत्पादन समाज की किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए होता था। चाहे यह आवश्यकता आमजन की हो या अभिजन की। मसलन सामंतो के साज-सज्जा, आभूषण, तख्त-ताज या बख्तर की। आवश्यकता पूर्ति हो जाने पर उत्पादन पर विराम लग जाता था।
लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का एक मात्र लक्ष्य उत्पाद की बिक्री और उससे मुनाफा कमाना होता है। इससे पुरानी कहावत के विपरीत जिसमें आवश्यकता को अविष्कार की जननी माना जाता था, पूंजीवादी व्यवस्था का एक बड़ा उद्यम आवश्यकताओं का आविष्कार है। इसके लिए बड़ी- बड़ी प्रयोगशालाएं अरबों रुपये के खर्च से कार्यरत रहती हैं। चूंकि यह आवश्यकताएं जीवन की किसी मूलभूत जरूरतों को पूर्ति नहीं करतीं, कभी भी इनके उत्पादन पर विराम नहीं लग सकता। कहीं-कहीं ये वस्तुएं जहरीली और घातक भी होती हैं, जैसे तम्बाकू या ठंडे पेय। प्राय: ये आदत डालनेवाली होती हैं, इससे इनकी मांग पर कभी विराम नहीं लगता। अन्ततोगत्वा, चूंकि इनके उत्पादन मे धरती के संसाधनों का इस्तेमाल करना होता है। इन सबका अंतिम परिणाम होता है पर्यावरण का क्षय और स्वयं मानव अस्तित्व का संकट।
दूसरी ओर व्यवस्थापकों और श्रमिकों के बीच घोर विषमता फैल गयी है। यह विषमता देशों, क्षे़त्रो और प्रत्येक क्षेत्र के वर्गों के बीच बढ़ी है। और यह सब उन्मुक्त पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर हो रहा है, जो कम से कम तात्कालिक रूप से उनके द्वारा भी अपनायी जा रही है जो क्रांतिकारी कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी होने का दावा करते रहे हैं। वे वही पुराना राग आज भी अलाप रहे हैं कि पूंजीवाद स्वयं वह आर्थिक आधार तैयार कर रहा है जिस पर समाजवाद की इमारत खड़ी होगी।
लेकिन पूरे परिदृश्य पर नजर डालने पर एक बात स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के तानाबाना की विशालता स्वयं संसाधनों और पर्यावरण के संकट का सबसे बड़ा कारक बन गयी है। फिलहाल कार्बन डायआक्साइड के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत मोटर वाहनों एवं हवाई जहाज का यातायात है। ये दोनों ही सीधा आर्थिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और राजनीतिक संबंधों, (जिनके साथ हथियारों की होड़ भी जुड़ी है) के फैलाव के नतीजे हैं।
इसका विकल्प फिर छोटी और स्वायत्त आर्थिक एवं राजनीतिक इकाइयों की ओर लौटना होगा। यहां पर गांधी की उस दस्तक पर विचार करने की जरूरत हो जाती है, जिसकी शुरू में (प्रथम किश्त देखें) चर्चा की गयी है। यह विचार करने का विषय है कि क्या नये समाजवादी आंदोलन में गांधी और मार्क्स के समन्वय का आधार तैयार हो रहा है ?
... जारी
Tuesday, May 20, 2008
समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य 3
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
7:42 AM
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1 टिप्पणियाँ:
बढ़िया लिख रहे हैं. जारी रहें.
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