पहली किस्त, दूसरी किश्त, तीसरी किस्त
समाजवादी विचारक सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा 11 मई को आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र के पुन: सक्रिय होने के मौके पर आयोजित संगोष्ठी में प्रस्तुत पर्चे की चौथी व अंतिम किस्त
अगर हम अपनी संप्रदायवादी (Sectarian के अर्थ में) दृष्टि से ऊपर उठकर विचार करेंगे तो पाएंगे कि मानव श्रम की गरिमा जो माक्र्स के मूल्य के श्रम सिद्धांत का आधार है, वही गांधी की के `ब्रेड लेबर´ का भी आधार है और गांधी का अंतिम आदमी आज माक्र्स के सर्वहारा का असली प्रतिनिधि है। वर्तमान अत्यधिक स्वचालित और कंप्युटरीकृत प्रतिष्ठानों में काम करनेवाला कुशल मजदूर नहीं।
तो फिर आज समाजवाद की चुनौती यह है कि आधुनिक उद्योग और सामाजिक व्यवस्था में हासिये पर डाल दिया गया मजदूर व्यवस्था के केंद्र में फिर कैसे आएगा। इसके लिए कैसे सामाजिक बदलाव और नयी संरचनाओं की जरूरत होगी।
यह परिवर्तन युगान्तरकारी होगा और संसार भर में व्यवस्थाओं में जमे हुए निहित स्वार्थों और उन्हें कायम रखनेवाले संस्थाओं के संगठनों को तोड़ने की जरूरत होगी। पिछले हिंसक क्रांतियों के नतीजों को देखते हुए इस नयी क्रांति को अहिंसक होना होगा लेकिन राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन के संकल्प के साथ।
अहिंसक परिवर्तन के सबसे सशक्त औजार लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया के भरपूर इस्तेमाल को विशाल पैमाने पर सिविल नाफरमानी और सत्याग्रह जैसे संघर्षों से जोड़ना होगा। जो वास्तव में गांधी के आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध हैं उन्हें गांधी के जीवन एवं विचारों को रामलीला और कृष्णलीला की तर्ज पर Ritual (कर्मकांड) बनाने की जगह समाज में सशक्त हस्तक्षेप का हथियार बनाना होगा। माक्र्सवादियों को तो अपने Mind set को आमूलचूल रूप से बदलना होगा। अगर इस दिशा में पहल नहीं हुई तो दोनों ही विचार के लोग वर्तमान चुनौतियों के लिए अप्रासंगिक हो जाएंगे और अपने अलग-अलग जप-जाप में जीवन गुजार देंगे। इधर मानवीय संबंधों के अवमूल्यन और पर्यावरण के क्षय से संसार विनाश की ओर जाएगा।
Thursday, May 22, 2008
समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य 4
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
10:47 AM
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2 टिप्पणियाँ:
भाषण बहुत अच्छा लग रहा है। मगर इसे अमली जामा पहनाना असंभव है।
द्विवेदी जी, १८८५ में काग्रेस की स्थापना के समय भी शायद देश स्वतंत्र होने के बारे में लोगों को यही नाउम्मीदी रही होगी.
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