Sunday, May 18, 2008

समाजवाद की नयी स्थापनाएं- नये लक्ष्य

मुजफ्फरपुर में 1965 में आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र की स्थापना की गयी थी। उस समय कांग्रेसी सरकार के आतंक इतने बढ़ गये थे कि लोग उसे अघोषित इमरजेंसी की तरह आज भी याद करते हैं। मुजफ्फरपुर में राजनीतिक आंदोलनों के केंद्र आर. डी. एस. कॉलेज में 10 दिसंबर 1966 को हुई पुलिस फायरिंग में गुरु-शिष्य शहीद हो गए थे। उस समय समाजवादी आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए एक तरह से संवाद केंद्र और शरण स्थली के रूप में उपयोग होता था इस केंद्र का। आंदोलन के पर्चे पोस्टर के अलावा यहां से कई महत्वपूर्ण प्रकाशन भी हुए। लेकिन बाद में समय के साथ यह निष्क्रिय हो गया। हाल ही में प्रोफेसर उदय शंकर जी ने इस केन्द्र को पु्नर्जीवित करने की पहल की और इसका फिर से शुभारंभ किया गया। 11 मई को इसकी उद्घाटन संगोष्ठी आयोजित की गयी, जिसमें 50 से अधिक लोग खासकर युवा उपस्थित थे। इस संगोष्ठी को समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा ने संबोधित किया। वर्तमान संदर्भ में समाजवाद का उपयोग और उसकी प्रासंगिकता पर उन्होंने एक संक्षिप्त नोट यहां पढ़ा। यहां हम 11 मई को प्रस्तुत संक्षिप्त नोट को किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं।

आचार्य नरेन्द्रदेव अध्ययन केंद्र की पुनर्स्थापना को हमें समाजवादी आंदोलन की नयी स्थापनाओं के साथ जोड़ना चाहिए। आचार्य नरेन्द्रदेव मा्र्क्सवादी थे और उनके या जेपी के प्रभाव में हमारी पीढ़ी के समाजवादियों ने समाजवाद का प्रथम पाठ मार्क्सवादी परंपरा में ही लिया था। इसमें शुरू करते थे स्वप्नवादी समाजवाद से फिर इस प्रक्रिया की परिणति वैज्ञानिक समाजवाद से और फिर सोवियत यूनियन या अन्यत्र इसमें जो विकृतियां आयीं, उनको क्रांति, देश और समाज की विशेष स्थितियों से जोड़कर समझने की कोशिश करते थे। आचार्य नरेन्द्रदेव केंद्र से ही प्रकाशित मेरी पुस्तक `समाजवाद के बढ़ते चरण´ में भी इसी परंपरा में समाजवादी आंदोलन और बाद की इसकी विकृतियों को समझने की कोशिश है।

इस पुस्तक के आधार में मूलत: मार्क्सवादी मान्यताएं हैं लेकिन गांधी के विचारों की दस्तक भी यत्र तत्र सुनी जा सकती है। मार्क्सवादी विचार की एक मूल स्थापना थी कि पूंजीवाद अपने विकास के क्रम में उत्पादन की वह व्यवस्था स्थापित करेगा जिसके आधार पर समाजवादी समाज की ओर संक्रमण होगा। समस्या एक ही रहेंगी, उत्पादन के साधनों पर से पूंजीवादी स्वामित्व को समाप्त करना। इसके साथ ही गैर-बराबरी, वर्गीय वर्चस्व और फिर शोषण की व्यवस्था को कायम रखने वाली राज्य व्यवस्था का विघटन शुरू होगा और एक ऐसा समाज बनेगा जिसमें सभी क्षमता के हिसाब से काम करेंगे और सबको आवश्यकता के हिसाब से आपूर्ति होगी।
.... जारी

1 टिप्पणियाँ:

अफ़लातून said...

हर प्रविष्टि में शीर्षक में सच्चिदा बाबू का नाम देना चाहिए था ।