पहली किश्त क्रमश:
यह मोटामोटी माना जाता था कि उत्पादन की तकनीक या तकनीक की दिशा वही होगी जो पूंजीवाद ने विकसित की है। सिर्फ स्वामित्व और उत्पादित वस्तुओं के वितरण की व्यवस्था बदलेगी स्वामित्व सामाजिक होगा और वितरण पूर्ण समता पर आधारित।
लेकिन न तो उन देशों में जहां समाजवादी बदलाव के लिए हिंसक क्रांतियां हुई और न पश्चिमी यूरोप की संपन्न अर्थव्यवस्थाओं में, जहां चुनावी प्रक्रिया से समाजवादी पार्टियां सत्ता में आईं और समाजवाद की दिशा में परिवर्तन का प्रयास किया, समतावादी समाज स्थापित करने में विशेष सफलता मिल पायीं। जहां हिंसक क्रांतियां हुईं, वहां तो घोर तानाशाही पैदा हुई और इसमें जिनके हाथ में अनियंत्रित सत्ता आयीं उन्हें अनियंत्रित सुविधाएं भी मिलने लगीं। जहां चुनाव प्रक्रिया से समाजवादी कहे जानेवाले लोगों को सत्ता मिली, वहां संपत्ति के समाजीकरण के प्रयास आधे-अधूरे ही हुए और पार्टी के शीर्ष पर स्थापित समूह और राज्य की नौकरशाही मे विशिष्ट स्थान बनाये लोगों की सुविधाएं और आय काफी बढ़ गयीं। समता का लक्ष्य तो गौण ही होता गया। पर इससे भी बढ़कर चिंता की बात थी उत्पादन की दिशा जो अंतत: पर्यावरण के संकट की जनक बनी और अंतहीन विकास की कल्पना भी कोरा सपना लगने लगी।
परिवर्तन के लिए किये गये प्रयासों की स्थितियों यथा हिंसक क्रांतियों के साथ केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में सत्ता के केन्द्रीकरण या तानाशाही रूझान के अलावा दो कारक और थे जिनसे क्रांतियां अपने लक्ष्यों से दूर होती गयीं। एक तो स्वचालन और कम्प्युटरीकरण के कारण श्रमिकों के काम की समान स्थिति की जगह मजदूरों या कर्मचारियों में ही अत्यधिक सोपानवत (Hierarchical) व्यवस्था में विभाजन हो गया। इससे व्यवस्थापकों का महत्व उद्योगों और विनिमय दोनों ही स्तर पर अत्यधिक बढ़ गया। इसी अनुपात में आय और सुविधाओं के बंटवारे में भी अत्यधिक विषमता आ गयी। आज जिस तरह की आय कम्युटरीकृत व्यवस्था के चलते प्रबंधकों को मिल रही है वह पहले कल्पना से परे थी। अगर श्रमिकों और प्रबंधकों की भूमिका में यह गैर बराबरी निहित हो तो इस तरह के श्रम विभाजन में समता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसमें संपत्ति के स्वामित्व की भूमिका कुछ खास नहीं होती। प्राय: स्वामित्व और प्रबंधन एक ही व्यक्ति या समूह के हाथ मे होता है। विशाल धन अर्जन करनेवाली अनेक संस्थाएं तो सिर्फ प्रबंधन के ही व्यवसाय में लगी होती हैं। प्राय: इनमें अनेक काम सेवा क्षेत्र में आते हैं- मसलन बैंकिंग या होटल। इनमें अत्यधिक आय होती है लेकिन कार्यरत लोगों की संख्या अपेक्षातया बहुत कम होती है। अगर पूरी व्यवस्था ऐसी संस्थाओं के साथ में हो तो पूर्ण समता की कोई कल्पना नहीं कर सकता। लेकिन जो सबसे मारक स्थिति है वह पूंजीवादी उत्पादन के मूलभूत चरित्र में है।
.... जारी
Monday, May 19, 2008
समाजवाद की नयी स्थापनाएं, नये लक्ष्य २
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
10:08 AM
Subscribe to:
Post Comments (Atom)




3 टिप्पणियाँ:
जारी रहें, पढ़ रहे हैं.
हम भी समीर जी के पीछे बैठे है......
........
.... जारी
Post a Comment