कन्याकुमारी से कश्मीर तक के किसानों का एक ही दर्द है। वह यह कि दुनिया भर में उत्पादित सामानों की कीमत तय करने का अधिकार तो उनके उत्पादकों का होता है जबकि उनके द्वारा पैदा किए जानेवाले अनाजों का मूल्य खरीदनेवाला अपनी मर्जी से तय करता है। उन्हें इस बात का भी दु:ख है कि कहने को तो वे आजाद देश के नागरिक हैं पर एक चिट्ठी पर उनकी जमीन छीन ली जाती हैं।
जमीनों को लेकर जो कानून अंग्रेजो ने बनाए थे, आज की सरकार उसी कानून पर चल रही है। देश में कृषि के लिए कोई कानून नहीं है और न इसपर आधारित कोई उद्योग। आज तक उनके उत्पादों की खरीद-बिक्री के लिए कोई सहकारी समिति तक नहीं बनायी गयी हैं और न ही उन्हें उत्पादों का सही मूल्य ही मिल पाता है। किसानों का मानना है कि बिना उनका राष्ट्रव्यापी संगठन बने उनकी बात कोई सुननेवाला नहीं है और विज्ञान व तकनीक का किसानोन्मुखी बनें बिना उसका फायदा उन्हें मिलनेवाला नहीं। उनका कहना है कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन पर आज बहुत बहस-मुबाहिसा हो रहा है जबकि उन्होंने इस तरह के जलवायु परिवर्तन को रोज झेला है। लेकिन इसकी कोई सुध लेनेवाला नहीं है। उनकी मांग हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तरह ही सार्वजनिक खरीद प्रणाली स्थापित होनी चाहिए, जिससे किसान अपने गांव या क्षेत्र के केंद्र पर ही अपनी जिंसों को बिना बिचौलिये के बेच और खरीद सकें। उनकी मांग है कि उनकी जरूरतों की पूर्ति और जानकारी देने के लिए एकल खिड़की प्रणाली भी स्थापित की जाए।
किसानों द्वारा व्यक्त इस तरह के विचार उस समय सामने आए जब देहरादून स्थित हेस्को नामक संगठन के प्रमुख प्रोफेसर अनिल जोशी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय दल इसी साल 12 जनवरी से 16 मार्च तक कन्याकुमारी से देहरादून तक कि `किसान साइकिल यात्रा´ पर था। प्रो। जोशी जाने-माने पर्यावरणविद है और 2006 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने 1976 से 1997 तक गढ़वाल विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र का अध्यापन किया। इसी दौरान उन्होंने अपने शोध छात्रों को लेकर 1979 मे एक संगठन बनाया और बाद में विश्वविद्यालय से इस्तीफा देकर देहरादून के पास शुक्लापुर गांव में संगठन का काम कर रहे है। जोशी का कहना है कि संगठन और साइंस को जोड़ कर ही देश और किसानों का भला हो सकता है।
अपनी या़त्रा का विवरण देते हुए जोशी बताते है। कि लगभग हर जगह किसानों ने एक ही मांग की कि देश में एक कृषि कानून बने, वाटर बॉडी एक्ट बने और कृषि को संघ सूची में रखा जाए। किसान पानी की समस्या के निपटने के लिए तालाबों का उद्धार और उसका उपयोग सुनिश्चित करना चाहते हैं जिसमें सरकार सहायता और नीति का सहयोग मिलना आवश्यक है। वे एक किसान बैंक भी चाहते हैं जो उन्हें बीज खाद से लेकर हर तरह की जानकारी और ऋण प्रदान करे।
जोशी अपना अनुभव बताते हैं कि केवल सेज के कारण ही नहीं, बल्कि हाईवे के कारण भी बड़ी मात्रा में कृषि जमीन घटी है। हाईवे के किनारे की लगभग जमीन रिएल इस्टेट में चली गयी है। किसानों की मांग है कि अगर जरूरी कारणों से उनकी जमीन उद्योगों के लिए ली जाती है तो उन्हें नगद मुआवजा देने के बजाये उन उद्योगों में शेयर दिया जाए।
किसानों ने रास्ते में बताया कि कृषि क्षेत्र में आ रही समस्या और खाद्यान्न की कमी अब केवल किसान की समस्या नहीं रही बल्कि यह आम आदमी की समस्या बन गयी है। वह भारत हो या हैती-सेनेगल, हर जगह कृषि क्षेत्र में आ रही समस्याओं और नुकसान का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा हैं। उन्होंने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश से लेकर कश्मीर और उत्तराखंड के किसानों के बातचीत के आधार पर बताया कि उन्हें कृषि ऋण माफी की बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिला है और समर्थन मूल्य जेसी सरकारी योजनाओं से उनका कोई लेना-देना नहीं, क्योंकि देश का 79 फीसदी किसान सीमांत है जो बहुत कम ही अपना अनाज बेचता है। बेचता भी है तो उसकी मजबूरी देख व्यापारी अपनी कीमत पर उसे खरीदते हैं, जो समर्थन मूल्य से आधी तक होती है।




5 टिप्पणियाँ:
मैं तो कहूंगा कि किसान को अर्थशास्त्र का भी उतना ही सहयोग मिलना चाहिये,जितना साइंस का।
इस देश के किसानों को जितना मार्गदर्शन की जरुरत है शायद किसी ओर को नही...
किसानों को दया नहीं, संवेदना की जरूरत है। वरना जिस दिन किसानों ने हाथ खड़े कर दिये, सबको आटा-चावल का भाव पता चल जाएगा। किसानों के लिए संगठन, सहकारी समितियां, कानून - इन सब चीजों की हमारे यहां कोई कमी नहीं। समस्या यह है कि किसानों के लिए जो भी हुआ है, दिखावे के लिए हुआ है। जिन्होंने भी किसानों का नाम लिया, सिर्फ अपने फायदे के लिए।
किसानो के एकता की समस्या एक व्यावहारिक समस्या है। किसानों की संख्या इतनी अधिक है कि उन्हें किसी बात पर एकमत करना बहुत कठिन है। दूसरा किसान फटेहाल है, अशिक्षित है, सीधा-साधा है - ऐसे लोगों को आन्दोलन के लिये इकट्ठा करना बहुत टेढ़ी खीर है। चार चोर एकट्ठा होकर चोरी कर जाते हैं किन्तु सौउ गांव वाले इकठा ही नहीं हो पाते कि चोर/उचक्कों का मुकाबला कर सकें।
badi smajhdari ki baat karte hain, Atulji.
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