Tuesday, July 1, 2008

दोआबा के जून अंक में राजन की कविता

छह महीने में एक बार निकलनेवाली दोआबा पत्रिका का जून 2008 अंक वाकई में बेमिशाल है। विभाजन पर केंद्रित रचनाओं से भरे इस अंक में विभाजन के दर्द को फिर से ताजा कर दिया गया है। वैस विभाजन की त्रासदी को वह कोई अनुभव नही कर सकता जिसने इसकी विभीषिका न झेली हो, लेकिन हिन्दी-उर्दू के दोआब को उर्वर बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध इस पत्रिका में संपादक जाबिर हुसैन ने कहानियोंं-कविताओ का संकलन कर पाठकों को इस त्रासदी को अनुभव करने के लिए मजबूर कर दिया है। प्रसिद्ध कथाकारों की विभाजन की त्रासदी के सुक्ष्म पहलुओं को उभार कर लिखी कहानियां सचमुच में उस दर्द को उनके दिल में भी तरोताजा कर देती हैं जो मानवता के इस भयंकरतम विभीषिका से कोसों और दशकों दूर बैठे हैं।

इसी क्रम में गुलजार और राजेन्द्र राजन की 11 कविताएं भी शामिल की गयी है। राजेन्द्र राजन की कविताएं वैसे तो सीधे विभाजन पर नही हैं लेकिन वह वैसी ही स्थितियों में मनुष्य के सामने उपस्थित त्रासदी को सजीव कर देती हैं। इस अंक में सामग्री चयन तथा प्रति संवाद खंड के लिए डॉण् कमाल अहमद ने सहयोग किया है। कुल मिलाकर दोआबा का 450 पृष्ठों का यह अंक (कंधों पर सलीबें) इतिहास की शायद सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी पर काफी कुछ कह जाता है।
यहां राजेन्द्र राजन की बामियान में बुद्ध प्रतिमा को ध्वस्त करने की तालिबान की करतूत पर लिखी कविता पेश करते हैं जिसमें तालिबान के अलावा सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फार का बुद्ध से साक्षात्कार है।

बामियान में बुद्ध
निंश्चिंत होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से
अपनी बंदूकों, तोपों, बचे हुए विस्फोटकों
और अट्टहासो के साथ
अपनी समझ और हुकूमत के बीच
कि उनके मुल्क की जमीन पर
उसके इतिहास में
अब कहीं नहीं हैं बुद्ध
जहां वे खड़े थे सबसे ज्यादा मजबूती से
वहां से भी मिटा दिए गए उनके नामोनिशान
अब कोई नहीं था उस सुनसान जगह में
जहां पत्थर भी कुद कहते जान पड़ते थे
वहां हर शब्द था डरा हुआ
हर चीज खामोश थी दहशत से दबी हुई
बस हवा में एक सामूहिक अट्टहास था बेखौफ
जो बामियान के पहाड़ों को रह-रह कर सुनाई देता था
तप रही थी जमीन तप रहा था आसमान
पहाड़ के टूटने की आवाज
धरती की दरारों मे समा गई थी
हवा में भर गई बारूद की गंध
सब दिशाओं में फैल गई थी
तीन दिन बाद जब वहां कोई नहीं था
हर तरफ डरावना सन्नाटा था वहां नमूदार हुआ
लंबी नाक और चौड़ी ठोड़ी वाला एक पठान
वह तपती जमीन पर नंगे पांव बढ़ा उस तरफ
तीन दिन पहले जहां पर्वताकार बुद्ध थे
और अब एक बड़ा-सा शून्य था
उस खाली अंधेरी जगह के पास जाकर वह रुक गया
कुछ पल खामोश रह कर उसने सिर झुका कर कहा-
क्षमा करें भगवन् ! हमें क्षमा करें !
बुद्ध ने आवाज पहचानी
यह खान अब्दुल गफ्फार खां होंगे
फिर वे अपनी कोमल संयत गंभीर आवाज में बोले-
आप अवश्य आएंगे, मैं जानता था भंते !
कृपया इधर चले आएं इधर छाया में
आपके पांव जल रहे होंगे
सकुचाए लज्जित-से खान अब्दुल गफ्फार खां
बुद्ध के और निकट गए
फिर सुना
किसी को क्षमा करने का अधिकारी मैं नहीं
जो क्षमा कर सकते थे अब नहीं हैं
वे विलुप्त पथिक अक्षय शांति के खोजी
जिनकी खोज और साधना के स्मारक नष्ट किए गए
खान अब्दुल गफ्फार खां की आवाज अब भी नम थी :
यहां जो हआ उससे पीड़ा हुई होगी भगवन !
पीड़ा नहीं
दुख हुआ है भंते
जब कोई सृजन विध्वंस के उन्माद का शिकार होता है
दुख होता है
पर पीड़ा का प्रश्न नहीं
जब मैं शरीर में था एक दिन अंगुलिमाल गरजा था :
रुक जाओ भिक्षुक
वहीं रुक जाओ
पर मैं रुका नहीं
जैसे कुछ हुआ न हो मेरे कदम आगे बढ़े निष्कंप
जो कंप सकता था वह मेरे भीतर से विदा हो चुका था
अब तो वह शरीर भी नहीं
खान अब्दुल गफ्फार खां थोड़ा सहज हुए
बुद्ध ने उनकी आंखों में झांका :
यह क्या, आपकी आंखें गीली क्यों हैं भंते ?
मुल्क की हालत ठीक नहीं है भगवन् !
बरसों से हर तरफ
खून से सने हाथ दिखाई देते हैं
मारकाट जैसे रोज का धंधा है
सब किसी न किसी नशे में डूबे हैं
होश का एक कतरा भी खोजना मुश्किल है
डर का ऐसा पहरा है कि कोई कुछ बोलता नहीं है
कोई कुछ सुनता नहीं
जो बोलते हैं मारे जाते हैं
अभी तीन रोज पहले यहां जो हुआ उससे
इत्तिफाक न रखनेवाले चार युवक पकड़ लिए गए
सुना है उन्हें सरेआम फांसी पर लटकाया जाएगा
कुछ पल के लिए एक स्तब्ध मौन में डूब गए बुद्ध
जैसे ढाई साल बाद
नए सिरे से हो रहा हो दुख से सामना
फिर सोच मेंं डूबा उनका प्रश्न उभरा -
और, स्त्रियों की क्या दशा है भंते
उनका हाल बयान नहीं किया जा सकता भगवन्
वे पशुओं से भी बदतर हालत में जीती हैं
डर और गुलामी और सजा की नकेल से बंधी हैं वे
बुद्ध असमंजस में डूबे रहे कुछ पल
कि आगे कुछ पूछें या न पूछें
फिर उन्होंने पूछा :
और किसान किस हाल में हैं भंते
खान अब्दुल गफ्फार खां की अनुभव पकी आंखों में
गांवों के रोजमर्रा के चित्र तैर गए :
फसलें सूख रही हैं भगवन्
किसानों की कोई नहीं सुनता
फाकाकशी की छाया लोटती है मेनतकश घरों में
हुक्मरान हथियार खरीदने के अलावा और कुछ नहीं करते
बुद्ध और खान अब्दुल गफ्फार खां के बीच एक सन्नाटा
खिंच गया
बुद्ध को चिंतित देख
शर्म की जमीन पर खड़े बूढ़े पठान ने कहा :
भारत आपके लिए ठीक जगह है भगवन्
नहीं भंते
हथियारों के पीछे पागे हैं वहां के शासक भी
बहुत छद्म और पाखंड है वहां
मानवता के संहार का उपाय कर
वे कहते हैं : मैं मुस्करा रहा हूं
इसके बाद खामोश रहे दो दुख
सहसा खान अब्दुल गफ्फार खां का ध्यान हटा
उन्होंने सूखे आसमान की तरफ नजर फिराई
लगा जैसेकिसी बाज के फड़फड़ाने की आवाज आई हो
मगर चुंधियाती धूप मे कुछ दिखाई नहीं पड़ा
फिर उनका ध्यान लौटा उस जगह
जो तीन दिन पहले हमेशा के लिए खाली हो गई थी
वहां न बुद्ध के होने का स्वप्न था न उनके शब्दों का अर्थ
खान अब्दुल गफ्फार खां खड़े थे अकेले
बामियान के पथरीले सन्नाटे में

4 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार छौक्कर said...

जानकारी और यह रचना पढवाने के लिए धन्यवाद।

Udan Tashtari said...

बहुत आभार. उम्दा रचना पेश की है.

श्रद्धा जैन said...

ये विषय हम सभी की दुखती रग के जैसा है
आँख रो पड़ती है और दिल काँप जाता है इंसानियत का मारना आख़िर देखा भी नही जाता
और ये सब तो हुआ है लोगों ने सहा है

E-Guru Maya said...

उच्च कोटि की रचना.