नाभिकीय करार पर यूपीए सरकार और विपक्षी दलों के बीच खींचातानी और जोड़तोड़ की आतुरता और वामपंथियों के विरोध ने कम से कम इतना तो साफ कर ही दिया है कि यह मुद्दा जितना संवेदनशील है, उतना ही जटिल भी। ऊपर से, इस परिदृश्य पर अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनावों की मंडराती हुई छाया और भारतीय संसद के आगामी चुनावों के नजदीक आते जाने की भी अपनी भूमिका है। फिलहाल इन नाटकीय दांवपेंचों से अलग मामला भारत के अमेरिकाकरण और अमेरिका की साम्राज्यवादी इच्छा को मंजूरी देने और उसके विरोध का है। यह बात अब शीशे की तरह साफ है कि इस समझौते का परमाणु ईंधन या ऊर्जा जरूरत से कोई खास लेना देना नहीं है।
दरअसल पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जिस तरह से भाग्य वधू से भारत को आजाद कराने की एक प्रतिज्ञा की थी और उसे 15 अगस्त 194७ को पूरा किया, उसी तरह मनमोहन सिंह और उनके पीछे खड़े भारतीय मध्यवर्ग ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को भारत के अमेरिकीकरण का एक वचन दिया था और उसे वे हर कीमत पर 2008 मे पूरा करके मानेंगे। भारतीय राजनीति में शायद उसे रोक पाने की सामथ्र्य नहीं दिखती। वामपंथी दलों ने अपनी संसदीय ताकत के बूते पर जितना विरोध करना था किया। अब यह मामला भारतीय जनता के हाथो में है कि वह अपने आंदोलन की विराट शक्ति और मताधिकार के प्रयोग से इस प्रक्रिया कोकहां तक रोक सकती है। पुस्तक `परमाणु करार के खतरे´ उसी उद्देश्य के लिए चेतना को जगाने का एक प्रयास और साम्राज्यवाद का विरोध करनेवाली ताकतो को एकजुट करने का एक आह्वान है। और इसीलिए इन स्थितियों को ध्यान मे रखते हुए पुस्तक में नाभिकीय ऊर्जा की साम्राज्यवादी राजनीति, उसके आर्थिक और वैज्ञानिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की गई है।
प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी और पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी द्वारा संपादित यह पुस्तक तथ्यों और विश्लेषण की बौदि्धक भूख को लेकर तैयार की गई है। क्योंकि उसके तथाकथित मित्र के रूप में तेजी से बढ़ रहा प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसे इन गंभीर और बेहद जरूरी मुद्दों की जानकारी देने से ही परहेज करता है तो विश्लेषण की बात ही दूर है।
Monday, July 28, 2008
परमाणु करार के खतरे ही खतरे
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
3:00 AM
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2 टिप्पणियाँ:
इस करार की उपयोगिता को तमाम बडे बडे पत्रकार शान से लोगों को बता रहे है । सरकार इसे उर्जा की जरुरतों से जोड कर पब्लिक को भरमाने का प्रयास कर रही है । मैने एक बार एबी बध्ॆन से सवाल किया कि आप इस जचिल मुद्दे को जनता के सामने कैसे समझा पायेंगे कि यह करार देश के हित में कतइ नही है ..उनका जबाब था कि आप जैसे पत्रकारों को समझाने की कोइ आवश्कता नही जनता समझदार है और देश को आजादी साँभ्रांत वर्ग ने नही आम जनता ने दिलाइ थी वो खूब समझता है भला और बुरा । चलिये बहुत बढिया अतुल भाइ नो टू न्यूक्लियर डील .....
एक तथ्यात्मक भूल की तरफ इशारा करना चाहूंगा- नेहरू के सन्दर्भ में वह बात १९४५ नहीं १९४७ है.
दूसरी बात यह कि एबी बर्धन जैसे लोगों की वजह से ही आज कम्युनिस्ट पार्टियों का सत्यानाश है. ये कहते हैं कि जनता समझदार है. अगर जनता की समझदारी पर इतना ही भरोसा है तो यूपी में इनका क्या हुआ? घोसी सीट, जो कम्युनिस्टों का गढ़ थी, वह शक्कर घोटाले के दैत्य कल्पनाथ राय ने छीन ली थी.
आप कृपया एक काम करें- वह पुस्तक धारावाहिक रूप में छापना शुरू करें और सम्भव हो तो उसके अंश अखबारात में छपवायें. जनता तक यह सच्चाई पहुंचानी ही चाहिए.
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