Friday, August 29, 2008

ऊंचे डैम से उम्मीदें बहुत नीची

नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर डैम की ऊंचाई तो बढ़ती जा रही है लेकिन इससे अपेक्षित लाभ की माऋा दिनोंदिन घटती जा रही है। इसपर हो रहे अध्ययन के परिणाम लगातार डैम की बुरी खबर ही सुनाते हैं। कभी मानवीय त्रासदी के रूप में तो विस्थापन और और कभी इसके लक्ष्य से भटकने से संबंधित खबरें आ रहीं हैं। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी निहित स्वार्थ में अंधे हुए नीति नियंता डैम के साथ देश को गहरी खाई की ओर ही ले जाने पर अमादा हैं। नहीं विश्वास हो तो हाल ही में मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस की एक अध्ययन रिपोर्ट पर नजर डाल सकते हैं।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि डैम की ऊंचाई को वर्तमान की 121.92 मीटर से आगे बढ़ाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अभी पिछले लक्ष्यों को ही पाना दुश्वार हुआ पड़ा है। रिपोर्ट कहती है कि इसके समर्थक लोग सरकार और अन्य संगठन जितना शोर मचा रहे हैं डैम उतनी ही दूर पर अटका हुआ है। `परफर्मेंस एंड डेपलंपमेंट इफेकिटवनेस आफ़ द सरदार सरोवर प्रोजेक्ट´ शीर्षक से तैयार इस रिपोर्ट में डैम से होनेवाली सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा जैसे लाभों का आकलन इसकी लागत, मानवीय व पर्यावरणीय क्षति के आधार पर किया जाना चाहिए। पिछले 20 अगस्त को यह रिपोर्ट इंदौर में फिल्म अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने जारी किया।

रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना से गुजरात में अधिक से अधिक 1.53 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई ही हो पाएगी। यह दिसंबर 2007 में गुजरात में जारी उस दावे की पोल खोल देता है जिसमें परियोजना से 17.92 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की बात कही गयी थी। पेयजल क्षमता भी मूल दावे की मात्र 29 से 33 फीसदी ही रहनेवाली है, क्योंकि पेयजल का अधिकांश हिस्सा ऊर्जा संयंत्रों और औद्योगिक कार्यों के लिए मोड़ दिया गया है।

इंस्टीट्यूट के हिमांशु उपाध्याय, जया गोयल और सुबोध वागले द्वारा किए इस अध्ययन में कहा गया है कि नदी के खादर में पावरहाउस और पावर टरबाइन जेनरेटरों की स्थापना में हुई देरी के कारण बिजली मिलने का दावा किया गया था जो डैम की वर्तमान ऊंचाई के अनुकूल ही नहीं बैठता है। क्रियान्वयन एजेंसियां पर्यावरण की क्षति का आकलन करने में भी विफल रही हैं। जलग्रहण क्षेत्र में जलाशयों में कटाव और बाहर से आई मिट्टी के लिए उचित प्रबंध नहीं किया गया है। अब तक इस पर 45,673.86 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और 2012 तक इसकी लागत बढ़कर 70,000 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इस कर्ज का पूरा भुगतान जनता की जेब से ही होना है।

1 टिप्पणियाँ:

दिनेशराय द्विवेदी said...

बांधों की ऊंचाई बढ़ाने का कोई लाभ नहीं। फिर बांध खतरा भी तो हैं। हम बिहार का विप्लव नहीं देख रहे हैं?