Friday, November 28, 2008

कितना उचित होगी महिला वाहन सेवा

दिल्ली को सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर का शहर बना दिये जाने का प्रचार जोर-शोर से हुआ है। अगले दो साल में यहां राष्ट्रमंडल खेल होने जा रहे हैं। लेकिन क्या वाकई में दिल्ली सुरक्षित है। आम लोगों की तो जो स्थिति है वह है हीं, सरकारी एजेंसियों और तंत्र के महिलाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होने के दावे भी यहां केवल डपोरशंखी ही साबित हो रहे हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स की संवाददाता निवेदिता खांडेकर ने दिल्ली में सुरक्षित यात्रा के प्रति महिलाओं की धारणा पर एक रिपोर्ट तैयार की है। सरकार चाहे जो कहे, दिल्ली की महिलाओं को महिला मुख्यमंत्री वाली सरकार के दावों पर भरोसा नहीं है। तभी तो वह शाम ढलते ही अकेले ऑटो या टैक्सी में सफर करने से कतराती हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो लड़कियों और महिलाओं को यहां तक नसीहत दे चुकी हैं कि दिल्ली सुरक्षित नहीं इसलिए वह रात को घर से न निकला करें।

ऐसे हालात में पढी-लिखीं और सामाजिक तौर पर सक्रिय महिलाएं दिल्ली में महिलाओं द्वारा पूर्ण रूप से संचालित एक टैक्सी सेवा की वकालत कर रही हैं। लेकिन क्या यह समाज की हार नहीं होगी ? क्या यह इस डर से मुंह चुराना नहीं होगा या यह स्वीकार करने जैसा नहीं होगा कि महिलाओं की दिल्ली में पुरुष संचालित सेवाओं में सुरक्षित रहने के प्रति आश्वस्त नहीं किया जा सकता है।

कुछ महिला एनजीओ तो सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को ही महिलाओं के मुफीद नहीं मानते हैं। दिल्ली का एक एनजीओ आजाद फाउंडेशन कुछ लड़कियों को टैक्सी-ऑटो ड्राइवर की ट्रेनिंग दे रहा है। फाउंडेशन दिल्ली में ऐसी 50-60 महिला ड्राइवरों को तैयार करने की योजना बना रहा है। लेकिन इतना ही क्या काम चल जाएगा। यह तो और उल्टी बात हुई। एक ओर तो हमारे समाज की उपरोक्त नाकामयाबी को स्वीकार करना और दूसरे ऐसी व्यवस्था केवल उन महिलाओं के लिए वहनीय हो पाएंगी जो उच्च वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग की हैं। एनजीओ द्वारा तैयार ऐसे ड्राइवरों की संख्या भी सीमित मुठ्ठी भर महिलाओं को ही सुरक्षित पहुंचा पाएंगी, जो खुद की सुरक्षा के लिए पहले से ही सक्षम होंगी।
क्या इस तरह की महिला यातायात सेवा दिल्ली की लगभग 75 लाख महिलाओं को मुहैया करायी जा सकती है। अगर नहीं तो इसका क्या औचित्य है। क्या इसके बदले इस दिशा मे काम नहीं होना चाहिए कि हमारी सार्वजनिक यातायात प्रणाली ही या्त्रियों की सुरक्षा के लिए सक्षम हो जाए। अगर नहीं तो दो-चार धनी महिलाओं को सुरक्षित करना महिलाओं की सुरक्षा नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा की ढोल पीटने भर माना जाएगा। सार्वजनिक यातायात को संवेदनशील बनाने के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक वाहनों की तादाद बढाकर निजी वाहनों को दिल्ली की सड़कों से विदा कर दिया जाए। नागरिकों को इस बारे में संवेदनशील बनाना और संस्कारित करना इसके अन्य पहलू होंने चाहिए।

0 टिप्पणियाँ: