जो यह जानना चाहते हैं कि भारत कितनी तेजी से तरक्की कर रहा है, उनको यह देखना चाहिए कि इस देश के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की संपत्ति कितनी तेजी से बढ़ती जा रही है।
दिल्ली स्थित लाइब्रेरी इंस्टीट्यूट की `सशक्त भारत´ परियोजना के तहत जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उतरे उम्मीदवारों की औसत संंपत्ति 2003 की अपेक्षा 47 फीसदी सालाना के हिसाब से बढ़ी है। इनकी औसत संपत्ति 2003 में 24 लाख थी जो 2008 में बढ़कर 167 लाख हो गई।
हालांकि इस औसत आय से बहुत कुछ साफ नहीं होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली में 2003 में चुनाव लड़े 817 उम्मीदवारों में से 146 ने अपनी संपत्ति शून्य घोषित की थी।
कांग्रेस के उम्मीदवारों की औसत संपत्ति इस दौरान 92 लाख से बढ़कर 321 लाख हो गई जबकि भाजपा उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 56 लाख से बढ़कर 300 लाख।
कर्नाटक विधानसभा के लिए उतरे उम्मीदवारों की औसत आय दो चुनावों के बीच 53 लाख से बढ़कर 204 लाख पर पहुंच गई। इनमें कांग्रेस उम्मीदवारों की संपत्ति 120 लाख से बढ़कर 875 लाख हो गई तो भाजपा उम्मीदवारों की 88 लाख से बढ़कर 384 लाख।
इसमें भी दिलचस्प बात यह रही कि विपक्षी उम्मीदवारों की औसत संपत्ति सत्तारूढ दल के उम्मीदवारों की अपेक्षा तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के तौर दिल्ली में कांग्रेस उम्मीदवारों की संपत्ति की तुलना में भाजपा उम्मीदवारो की संपत्ति अधिक तेजी से बढ़ी, तो वहीं मध्य प्रदेश में भाजपा उम्मीदवारों के मुकाबले कांग्रेस उम्मीदवारों की।
Thursday, December 11, 2008
भारत गरीब, एम् एल ऐ अमीर
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
9:39 AM
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1 टिप्पणियाँ:
सही है, ऐसे आंकड़े मैंने भी देखे थे । ये यह दर्शाते हैं कि विपक्षी दल पैसे का बेहतर निवेश करते हैं । :D
घुघूती बासूती
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