कांग्रेस की पहली अंतरिम सरकार के कार्यकाल मे अंग्रेजों ने कइयों को चढ़ा दिया फांसी
देश के लोगों को आज इतना भर पता है कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति और इसमें धूरी राष्ट्रों की पराजय के बाद उनके साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रही सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज के केवल तीन युद्धबंदियों - जनरल शाहनवाज खां, कैप्टन प्रेम कुमार सहगल और कैप्टन जी।एस. ढिल्लन को ही भारत में ब्रिटिश शासन के कोर्ट मार्शल का दंश झेलना पड़ा था। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे हजारों सिपाहियों के खिलाफ देश की विभिन्न जेलों में कोर्ट मा्र्शल की कार्रवाई की गयी थी। आजाद हिन्द फौज के ऐसे ही एक सेनानी रहे हैं कैप्टन अब्बास अली, जिन्हें उस समय फांसी की सजा सुनायी गयी थी और 1945 में कांग्रेस की अंतरिम सरकार ने उन्हें राहत दी थी। अब्बास अली ने हाल में ही अपनी आत्मकथा `न रहूं किसी का दस्तनिगर´ लिखी है और उसमें पंडित नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली अंतरिम सरकार द्वारा आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के साथ किये गये बर्ताव का बेबाकी से वर्णन किया है।
इस पुस्तक के अनुसार, स्वतंत्र भारत के पहले सेनाध्यक्ष जनरल के।एम. करियप्पा की नजर में आजाद हिन्द फौज के सिपाही अनुशासनहीन थे और इसीलिए उन्हें आजादी मिलने के बाद भी देश की सेना में शामिल नहीं किया गया। वैसे देशवासियों की नजर में आजादी के लिए अपने तरीके से प्रयास करने की मुहिम में आजाद हिन्द फौज और उसके संस्थापक सुभाष चन्द्र बोस के योगदान को किसी भी कीमत पर कम करके नहीं आंका जा सकता है। लेकिन तथ्य तो यही बताते हैं कि आजाद भारत की पहली ही सरकार ने उनके साथ न्याय नहीं किया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना से विद्रोह करने के आरोप में कोर्ट मार्शल के बाद फांसी की सजा सुनाये गये अब्बास अली आजादी के बाद देश में समाजवादी आंदोलन से जुड़ गये। जनता पार्टी के सदस्य के रूप में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे कैप्टन अली लिखते हैं कि विश्वयुद्ध में आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को ब्रिटिश सरकार से बगावत कर जापान का साथ देने के आरोप में कोर्ट मार्शल के दौरान फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद 1946 में बनी अंतरिम सरकार ने अधिकांश सैनिकों की सजा को मुल्तवी कर दिया लेकिन कुछ एक सिपाहियों को ब्रिटिश अधिकारियों ने फिर भी सजा-ए-मौत दे दी और भारत सरकार कुछ न कर सकी। इतना ही नहीं, कोर्ट मा्र्शल की कार्रवाई के दौरान भी उन लोगों के साथ जेलों में बुरा बर्ताव किया गया। कैप्टन अली के मुताबिक, देश की आजादी के लिए आईएनए (आजाद हिंद फौज) में भर्ती हुए सैनिकों को उम्मीद थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन सभी को भारतीय सेना में शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन हमारी ही सरकार ने हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और वह भी नाकाबिल बताकर। पुस्तक में खुलासा किया गया है कि आजाद हिन्द फौज में एक लाख से ज्यादा सैनिक थे और इनमें से 60,000 से अधिक पहले ब्रिटिश फौज में थे।
कैप्टन अली ने पुस्तक में बयां किया है, `बड़े अफसोस के साथ मुझे लिखना पड़ रहा है कि हम बागियों को यह कहकर आजाद भारत की सेना में शामिल नहीं किया गया कि ऐ फौजी अनुशासित नहीं हैं। मुझे याद पड़ता है कि देश के पहले सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा ने बयान दिया था कि चूंकि आईएनए के सिपाही अनुशासित नहीं हैं, इसलिए उन्हें दोबारा सेना में शामिल नहीं किया जाएगा और हमारी सरकार ने उनकी यह बात मान ली। अली की किताब के मुताबिक, आईएनए के इन सिपाहियों को सम्मान दिलाने के लिए देश के नेताओं में सिर्फ डॉ. राम मनोहर लोहिया ने बार-बार आवाज उठायी थी।
उन्होंने लिखा है कि आजादी के बाद आजाद हिन्द के फौजियों को भारतीय सेना में शामिल करने या न करने का सवाल उठाना ही निरर्थक था। खैर, अगर यह सवाल उठाया भी गया तो फिर उन्हें बगावती बताकर सेना में शामिल करने से अयोग्य ठहराये जाते वक्त यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया कि देश की आजादी के इन दीवानों आखिरकार बगावत किसके खिलाफ की थी। अपने देश के खिलाफ या फिर देश के दुश्मनों के खिलाफ ?
पुस्तक में बड़े अफसोस के साथ लिखा गया है कि एक सैनिक के लिए उसके फौजी होने से अयोग्य बताने से बड़ी पीड़ा और कुछ नहीं हो सकती और इस पीड़ा का अंत यहीं नहीं हुआ बल्कि कांग्रेसी सरकार ने इन सिपाहियों और अफसरों को 1972 तक न तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना और न ही पेंशन और कोई सुविधा दी। विपक्षी दलों के संसद से सड़क तक संघर्ष और जद्दोजहद के बाद 1972 में इंदिरा गांधी की सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी माना और पेंशन दी। लेकिन इस समय तक तमाम सिपाही मर चुके थे और जो बचे थे, उनमें से अधिकांश को सरकार ने दस्तावेजी सबूतों के अभाव में आईएनए का सिपाही ही नहीं माना।




2 टिप्पणियाँ:
आजाद हिन्द फौज की अनुशासन हीनता की बात तो नहीं मालुम, पर आजादी के बाद के नेताओं की अक्षमता तो बाद में पता चली ही। कुछ ही थे जो कुशल थे और अपने परिवारवाद के ऊपर निकले।
बहुत ज्यादा नोस्टाल्जिया भी खास काम का नहीं। उन लोगों ने त्याग किया था तो ताम्रपत्र या बाद में फौज की नौकरी के लिये?
आपने जो तथ्य उजागर किये हैं, कांग्रेस की भारत-विरोधी नीति का ही एक घृणित रूप है। जिन लोगों ने भारत की गुलामी की जंजीरों पर प्रहार करने का बीड़ा उठाया था, उन्हे तो आदरपूर्वक भारतीय सेना की बागडोर सम्हालने के लिये निमन्त्रण मिलना चाहिये था। किन्तु यह शर्मनाक है कि हुआ इसके विपरीत।
इसीलिये बहुत से लोगों का मत है कि जवाहरलाल नेहरू भारत के अन्तिम ब्रिटिश प्रधानमन्त्री थे। आज भी शंका होती है कि कहीं आजादी के नाम पर अंग्रेजों की 'बी-टीम' को तो सत्ता नहीं सौंप दी गयी?
Post a Comment