Thursday, April 9, 2009

जूते गुजरात पर भी चले और इस नजीर को सलाम भी करें

अहमदाबाद के निकट कोहा गांव के धूराजी और बाबूबेन ठाकुर को शायद आपमें से कोई नहीं जानता हो। लेकिन इन दोनों ने आजाद भारत के सबसे दुखद दिनों में मानवता को बचाकर एक मिशाल पेश की है। गुजरात में 2002 में हुए एकतरफा जनसंहार के हालात पर अंग्रेजी में पुस्तक ‍"फीयर एंड फोरगिवनेस" में पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर ने इस दंपति के सर्वोत्तम मानवीय कार्य को याद किया है, जो इतिहास में नजीर के रूप में दर्ज हो चुका है।

पुस्तक के मुताबिक, दंगाइयों ने 110 लोगों के घरों से सारा सामान लूटने के बाद उनके घरों को आग लगा दी थी और उन्हें पनाह देनेवाला कोई नहीं था। सारा दिन खेत में छिपे रहने के बाद उन्होंने एक रात गुजारने के लिए धूराजी के घर पर दस्तक दी। धूराजी और बाबूबेन ने एक भी पल सोचे बिना अपने घर के दरवाजे इन मुसीबतजदा मेहमानों के लिए खोल दिए। समूचा गुजरात जल रहा था, लिहाजा इस परिवार ने अगले 10 दिनों तक इन सबको घर में रखा और जब हालात कुछ ठीक हुए तो इन्हें ट्रैक्टरों से कैंप तक पहुंचाया। इतने ही दिनों में इस परिवार का साल भर का अनाज खत्म हो गया। लेकिन इस परिवार को इसका मलाल नहीं। उन्होंने कहा कि उन सबकी दुआ से मेरा भंडार फिर भर गया और खेतों में फसल लहलहा रही हैं।

पुस्तक के अनुसार, 2002 का दंगा कोई साधारण दंगा नहीं, बल्कि सरकार की देखरेख में कराया गया जनसंहार था। इसकी योजना पहले से ही तैयार की गई थी। पुस्तक में मंदर लिखते हैं कि पूरी तरह से तबाह लोगों की मदद करनेवाला कोई नहीं था। अपनी जायदाद की हिफाजत करने के लिए साबरमती आश्रम ने भी दरवाजे बंद कर लिये थे।

भय और नफरत के माहौल में मानवता की उम्मीद की किरण धूराजी और बाबूबेन ही नहीं थे। ऐसे सैंकड़ों लोग हैं, जिन्होंने बेगुनाह लोगों और बच्चों को बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। साबरकांठा जिले के नानापोशिना गांव में बूढे वली भाई अपने जले हुए घर के सामने बैठे रात भर रोते रहे। सुबह उनके पास शौच जाने के लिए लोटा तक नहीं था। एक ठाकुर लड़के ने दबे पांव आकर उसके बगल में एक लोटा रख दिया और चुपचाप चला गया। इस मूक संवाद में कुछ ऐसा था कि वली भाई की जिंदगी चल पड़ी। गांव की ही एक महिला ने अपने समुदाय के विरोध के बावजूद उन्हें आठ दिन तक खाना दिया और एक दोस्त ने उनके मकान के लिए टिन की छत बनवा दी।

आज जब सिख दंगों पर एक पत्रकार का जूता निशाने पर सटीक बैठा है और 25 साल पुराना दर्द हरा हो गया है और इसपर बहस शुरू हो गई है, गुजरात की उस भयावह तस्वीर पर भी बहस तेज होनी चाहिए। गुजरात ने जिस तरह का भयानक दौर देखा है, उसमें टिकाऊ शांति के लिए पश्चाताप, सहानुभूति और न्याय जरूरी है। लेकिन सात साल गुजर जाने के बावजूद फिलहाल तो ये चीजें कहीं दिखाई नहीं देती।

1 टिप्पणियाँ:

श्यामल सुमन said...

ठीक कहा आपने। कहते हैं कि-

नफरत को मुहब्बत का एक शेर सुनाता हूँ।
मैं लाल पिसी मिर्ची पलकों से उठाता हूँ।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com