अंग्रेजी दमन से प्रथम साक्षात्कार
एक घटना जिनसे मेरी सोच को काफी प्रभावित किया वह था, अंग्रेजी शासन और दमन से साक्षात्कार। 1932 की बात है, तब मैं शायद चार साल के लगभग का रहा होऊंगा। मैं उन दिनों अपने ननिहाल बीहट में अपनी मां के साथ था। मेरे छोटे मामा चन्द्र प्रकाश नारायण जो मुझसे लगभग डेढ़ महीने बड़े थे, वहीं थे और हम दोनों प्राय: साथ होते थे। उसी समय मेरे नाना श्री रामचरित्र सिंह को गिरफ्तार करने पुलिस वाले आये। मैं और मेरे मामा चन्द्रप्रकाश एक घर की दीवार की ओट से झांक रहे थे, जब पुलिस वाले एक टमटम या तांगा के साथ मेरे नाना के बंगले पर आये और उन्हें गिरफ्तार कर टमटम पर ले गये। हमलोगों को अंग्रेजी सरकार के दमन और ताकत का थोड़ा एहसास हुआ लेकिन हम ज्यादा कुछ नहीं समझते थे। लेकिन उन दिनों गांव में प्राय: लोग लाइन बना प्रभात फेरी करते थे और गाते थे। (गाना की ये पंक्तियां आज भी मुङो याद है) ‘‘ आओ वीरों मर्द बनो अब जेल तुम्हें जाना होगा।’’ इसके साथ कुर्की-जब्ती, गिरफ्तारी आदि का जो दौर रहा होगा वह सब हमारी समझ में नहीं आता था। लेकिन, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक भावना और दमन का खौफ जरूर मालूम होता था।
गांधी जी : एक पारिवारिक विरासत
महात्मा गांधी मुङो पारिवारिक विरासत के रूप में मिले, वैसे ही जैसे अपने दादाजी। मेरे पिताजी गांधी जी के भक्त थे और 1920 में उनके आह्वान पर सरकारी स्कूल छोड़ सदाकत आश्रम में पढ़ाई करने चले गये थे। बाद में भी जब उन्होंने स्कूल में शिक्षक का काम शुरू किया तो गांधी के प्रति निष्ठा गयी नहीं और उनके कई छात्र उनके प्रभाव से आजादी के आंदोलन मे कूदे। बचपन में मैं प्राय: मुजफ्फरपुर में पिताजी के साथ रहता था, जिनसे मिलने और विचार लेने अनेक छात्र आते थे। राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध में मेरी प्रारंभिक धारणाएं पिताजी के विचारों से प्रभावित थीं। बाद में जब उन्होंने गांव में चरखा का प्रचार करना शुरू किया तो एक चरखा मास्टर मेरे घर रहते थे और मैंने भी लगभग दस-ग्यारह साल की उम्र में चरखा चलाना शुरू किया और खादी पहनना भी। मैंने अपनी काती हुई सूत की एक गड्डी महात्मा गांधी को भी भेंट की थी, जब वे रामगढ़ कांग्रेस के पहले कांग्रेस वर्किंग कमिटी की मीटिंग में भाग लेने पटना आये थे। उनसे साक्षात्कार तो नहीं हो पाया लेकिन जब वे गाड़ी में जा रहे थे तो सूत की एक लड़ी उनके गले में लटक रही थी। मैंने अंदाज किया कि वह मेरा दिया हुआ सूत ही था। मेरे पिताजी नियमित रूप से ‘हरिजन’ मंगाते थे और उसकी प्रतियों को जिन्द बंधवा कर रखते थे। लेकिन मैं उन्हें पढ़ता नहीं था। शायद मेरी समझ मे कुछ आता भी नहीं। लेकिन एक तरह का भक्तिभाव गांधीजी के प्रति जरूर था।
बचपन की कल्पनाशीलता
जीवन में प्रारंभ की कुछ घटनाएं और उससे जुड़ी प्रतिक्रियाएं शायद आदमी की मूल प्रवृत्तियों और बाद के जीवन के रुझानों को समझने में सहायक हो सकती है। इसलिए बचपन के एक अनुभव का, जो सात दशक से अधिक बीत जाने पर भी मुङो साफ-साफ याद हैं, जिक्र करना चाहता हूं।
इतने दिनों बाद ठीक-ठीक तो नहीं कह सकता, मैं सात या आठ वर्ष का रहा होऊंगा। हीरा, मोती और दूसरे जवाहिरात का विवरण तो बातचीत और किस्से-कहानियों में सुनता था लेकिन उन्हें कभी प्रत्यक्ष चमकते हुए नहीं देखा था। सिर्फ उनके संबंध में कुछ कल्पना कर सकता था। मेरे घर से लगभग आधा से एक किलोमीर की दूरी पर हमलोगों का एक आम का बगान हुआ करता था, जिसे हमलोग बड़का गाछी कहते थे। अंदाज है कि आश्विन -कार्तिक के महीने में मैं हर रोज वहां सूर्योदय के बाद बिना किसी काम के घूमने जाया करता था। सड़क की दोनों ओर घास और जंगली फूलों और उनके पत्तों पर ओस की बूंदें प्रात:कालीन सूरज की रोशनी मे चमकते रहते थे और रंग-बिरंगी आभा बिखेरते रहते थे- नीले, पीले, नारंगी, लाल- सभी रंग की। अपनी कल्पना में मैं उन चमकती बूंदों में विविध रत्नों को देखने की कल्पना किया करता था। लेकिन विशेष बात यह थी कि हर रोज मैं सोचता कि किसी दिन रंगीन आभा बिखेरती ये बूंदे वास्तव में रत्न बन जाएंगी, जिनका मैं स्पर्श कर पाऊंगा और जिन्हें हाथों में उठा पाऊंगा। अब सोचता हूं कि समाजवाद या कोई काल्पनिक आदर्श समाज बन पाएगा, इसकी आश्वस्ति का मेरे भीतर का आधार कहीं न कहीं उन प्रारंभिक अनुभवों और रूझानों में था। यह सब रुमानियत लगेगी। शायद है भी। लेकिन कुछ ऐसे ही प्रारंभिक अनुभव लोगों की गहरी आस्थाओं के पीछे होते हैं। मेरे कई परिचित लोग सामने दिखनेवाली हकीकत की पृष्ठभूमि में समाजवाद संबंधी मेरे विश्वास को महज रूमानियत समझते हैं। शायद उनका सोचना सही है। लेकिन अगर ऐसी कल्पनाओं और आशाओं को मिटा दिया जाये तो क्या मानव जीवन मानवीय रह पाएगा ?
पुराण, दर्शन, विज्ञान
जो भी कारण रहा हो, गांव के स्कूल में दाखिले के कुछ महीनों के बाद से ही मेरी स्कूली पढ़ाई बंद हो गयी और मैं या तो गांव में घर ही पर रहता या पिताजी के साथ मुजफ्फरपुर जहां वे बी़बी कॉलेजियट स्कूल में शिक्षक थे। स्कूली शिक्षा की जगह मैं घर में उपलब्ध धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने लगा। इन ग्रंथों में रामचरितमानस, जिसका गद्य अनुवाद ही समझ सकता था, कई जिल्दों में उपलब्ध महाभारत, सुखसागर, भागवत पुराण आदि पढ़ने में विशेष रुचि थी। ध्रुव, प्रहलाद आदि की कहानियां भी पढ़ी और इनकी बातों पर अंध आस्था थी। हमारे यहां कम पढ़े पर विद्या व्यसनी कुछ पंडित आया करते और उनमें शास्त्रर्थ होता। उन्हें सुनना अच्छा लगता और उन्हें समझने की कोशिश करता, इससे कई लोकों के अस्तित्व की बात मन में आयी।
मेरे पिताजी एमएससी में गणित के छात्र रहे थे और उन्हें भारतीय ज्योतिष शास्त्र का भी कुछ ज्ञान था, जिनके बीच वे कुछ संगति बैठा सकते थे। प्राय: गर्मियों में जब हम आंगन में बैठे होते तो वे सप्तर्षि और ध्रुवतारा और उसकी ओर इशारा करनेवाले दो तारों तथा मृगशिरा आदि तारा समूहों को बतलाते और फिर नक्षत्रों और आकाशगंगा आदि के संबंध में कुछ बातें बतलाते। ध्रुव और ध्रुवतारे के संबंध को मैं कभी समझ नहीं पाया लेकिन आकाश और नक्षत्रों के संबंध में जानने की जो जिज्ञासा जगी वह बनी रही और में न्यूटन, आईन्सटीन आदि के विचारों की तरफ ले गयी। इसी जिज्ञासा के कारण मुझे कान्ट का समग्रता का दर्शन सदा आकर्षित करता रहा, जिसमें “The starry heaven above and the moral sense within” दोनों को समझने और जोड़ने का आग्रह था। संसार की सभी वस्तुओं के बीच संबंध तलाशने का रुझान इसी समय पैदा हुआ।
धार्मिक आस्थाओं को धक्का लगा मेरे नानाजी के विचारों से। उन्होंने रसायन शास्त्र से एमएससी की थी और अनीश्वरवादी थे। उन्होंने भौतिक दृष्टि से संसार के विकास पर एक पुस्तक भी लिखी थी। दस-ग्यारह साल की उम्र में उसे प़न का मौका मिला और इससे पुरानी आस्थाएं अंध आस्थाएं लगने लगीं। समय के साथ इस दूसरे विचार को ही चारो तरफ से समर्थन मिलता रहा। बाद में मार्क्स के प्रति आकर्षण का यही आधार था।
अनियमित शिक्षा
मेरी नियमित रूप से पढ़ाई- लिखाई नहीं हुई थी। मैंने पहली दफे परीक्षा देकर सातवें वर्ग में उसी स्कूल में दाखिला लिया जिसमें पिताजी थे। हालांकि, इसके साल भर के भीतर ही पिताजी ने पूरा समय स्वतंत्रता आंदेालन में देने के लिए नौकरी छोड़ दी। स्कूल में जाने के बाद से मेरी दिलचस्पी भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारी नेताओं में जगी और उनकी वीरता और आत्मबलिदान से अत्यधिक प्रभावित हुआ। इसी क्रम में मन्मथनाथ गुप्त की ‘‘भारत में सशस्त्र क्रांति चेष्टा का रोमांचकारी इतिहास’’ पढ़ा और कुछ अन्य प्रकाशनों को भी देखने का मौका मिला जो प्राय: गुप्त रूप से छात्रों तक पहुंच ही जाते थे। इसके बाद हिंसक क्रांति के प्रति आकर्षण बढ़ा। ज्यादातर छात्रों का रुझान इसी तरफ था। मुङो गांधी जी और इन क्रांतिकारियों के बीच कोई विरोधाभास नजर नहीं आता था। मुङो जहां तक याद है, एक पुस्तक ‘‘ दो पहलू’’ उन्हीं स्कूली दिनों में पढ़ने का मौका मिला था जिसमें क्रांति के लिए समर्पित दोनों विचारों के लोगों की जीवन गाथा थी। लेखक का नाम याद नहीं। लेकिन मेरी राजनीतिक समझदारी ऐसी नहीं थी कि मैं इन दो दृष्टियों का विश्लेषण कर पाता। गांधीजी के प्रति भक्ति और क्रांतिकारियों के प्रति रुझान- दोनों साथ-साथ थे। लेकिन उम्र और रुचि के कारण सशस्त्र क्रांति की तरफ रुझान ज्यादा गहरा था। उस समय हथियार पाना उतना आसान नहीं था जितना आज, लेकिन यह इच्छा जरूर थी कि हमलोग स्वयं बम आदि बना क्रांतिकारियों की मदद करते। खादी के प्रति कट्टरता जरूर थी और एक एक समय जब खादी के कपड़े मिलना मुश्किल हो गया तो एक या दो फटे धोती-कमीज लगाकर रहता था पर मिल के वस्त्रों को धारण नहीं करता था। इससे सगे-संबंधियों के समारोहों में शामिल होना मुश्किल हो जाता था। इससे समारोहों में शामिल होने में उसी समय से एक झिझक हो गयी थी।
इसी काल में ज़ेपीक़ की जेल से भागने के बाद की चिट्ठियां पढ़ने का मौका मिला और उनके भूमिगत संगठनों के तानाबाना से जुड़ने का। हमलोगों के पास नियमित रूप से पर्चे- पोस्टर आदि आते और हमलोग रात में चुपचाप उन्हें मुजफ्फरपुर शहर के विभिन्न मुहल्लों में दीवारां पर चिपका देते या घरों के दरवाजों पर डाल देते।
विश्वविद्यालय में दाखिला, शिक्षा छोड़ पूर्णकालिक kaaryakarta
मैट्रिक पास कर 1945 में मैं साइंस कॉलेज पटना में पढ़ने गया। वहां छात्र आंदोलन (स्टूडेंट्स कांग्रेस) से पूरी तरह जुड़ गया। 1946 में कुछ समाजवादी कार्यकत्र्ता जेल से छुटने लगे और सोशलिस्ट sangathan को बढ़ाने के प्रयास में लग गये। वे उस सयम ‘‘सोशलिस्ट कांग्रेसमैन एसोसिएशन’’ के नाम से काम करते थे। उसमें पूरी लगन से जुट गया। इसी समय सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ ज़ेपीक़ की अपील पर लगभग एक महीने छात्रों की टीम के साथ पटना और जहानाबाद के इलाके में काम करता रहा।
पार्टी में सक्रियता से पढ़ाई-लिखाई का काम दोयम महतव का बन गया। 1947 में आई़एस़सी़ तो किसी तरह दूसरे दर्जे में पास कर गया लेकिन बी़एस़सीक़ की पढ़ाई बहुत ही बाधिक होने लगी। साइंस कॉलेज में पढ़ाई-लिखाई और प्रैक्टिकल के काम में काफी सख्ती बरती जाती थी। अब स्पष्ट हो गया कि मैं पास नहीं कर सकता। अब मेरी पढ़ाई भी कोर्स के बाहर की पुस्तकों पर केंद्रित होती गयी। इम्तहान पास करने का महत्व भी कम दिखने लगा, क्योंकि इरादा नौकरी से ज्यादा क्रांति करने का बन गया था। इस तरह मैंने तय किया कि अब पढ़ाई छोड़ पूर्णकालिक पार्टी कार्यकर्ता बन जाऊंगा। उस समय बिहार में पाटी्र के लेबर सचिव बसावन बाबू थे। मैंने उनसे इस संबंध में बात की और उन्होंने गाड़ी किराया और एक प़ के साथ अरगडा, हजारीबाग जिला भेज दिया, जहां पार्टी के अत्यंत ही सक्षम और प्रतिबद्घ नेता हरदेव जी (जिन्हें लोग गुरुजी कहते थे) संगठन चलाते थे। यूनियन के अध्यक्ष रामनन्दन मिश्र जी थे और सेक्रेटरी चुनचुन जो मजदूरों में इतना लोकप्रिय थे कि मजदूर (अधिकांश आदिवासी) सभी यूनियन कार्यकर्ताओं को चुनचुन ही कहते थे (छोटा चुनचुन, बड़ा चुनचुन)। इस तरह मैं 1948 के प्रारंभ से लगभग नौ महीने तक वहीं साउथ कर्णपुरा कोला वर्कर्स यूनियन में काम करता रहा। इसी काल में पार्टी के आदेश पर कुछ समय के लिए मूरी में अल्युमिनियम कारखाने को सफल बनाने के लिए (ज़ेपी़ उस समय रेलवेमेंस यूनियन के अध्यक्ष थे) कुछ समय के लिए बरकाकाना रेलवे जंक्शन पर रेल मजदूरों को संगठित करने के लिए गया। इस बीच, हिन्द मजदूर पंचायत के स्थापना सम्मेलन में कोयला मजदूरों के एक प्रतिनिधि के रूप में कलकत्ता गया।
बाद में पार्टी ने मुङो पटना बुला लिया। लेकिन वहां कुछ काल तक रहने के बाद ही मैं मुंबई चला गया। मैं यहां था जब 1949 में पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन पटना में हुआ था।
मुंबई सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ाव
मैं 1949 के मध्य में मुंबई गया था। मुख्य आकर्षण तो वहां के मजदूर आंदोलन की ख्याति थी और उससे जुड़ने का मन था। लेकिन यह भी वहम था कि पत्रकारिता के माध्यम से समाजवादी विचार को तेजी से फैलाया जा सकता है। उन दिनों मुंबई से निकलनेवाली पत्रिका (Blitz) में अशोक मेहता नियमित रूप से लिखते थे और हमलोग उनसे काफी प्रभावित होते। इसलिए बाजाप्ता तो मैं वहां पत्रकारिता सीखने गया था, जिसकी सुविधा अन्यत्र नहीं थी और मुंबई में Honnyman College of Journalism के नाम से एक संस्था थी, जिसके निदेशक P.G. Rao थे। वहां साल भर पढ़ने और डिप्लोमा लेने के बाद यह भ्रम तो खतम हो गया कि पत्रकारिता विचारों के विकास का माध्यम हो सकती है लेकिन सीधा-सीधा कुछ कहने का रुझान बढ़ा। स्वयं P.G. Rao जो हमसे काफी सहानुभूति रखते थ, पत्रकारिता की सीमा समझाते थे। मुंबई में मैं प्रारंभ में माहिम में स्टेशन के बगल में ही रहता था और पार्टी की दादर इकाई से जुड़ गया।
मुंबई की पार्टी के एक गुट ने (पूरी पार्टी आधिकारिक रूप से नहीं) यह फैसला किया कि जब नवम्बर 1949 को गोलवलकर मुंबई आवें तो उनके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हो। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जेल से छूटकर वह पहली बार मुंबई आ रहे थे और आऱएस़एस़ ने शिवाजी पार्क में एक भव्य स्वागत सभा का आयोजन किया था। शिवाजी पार्क दादर इकाई के तहत ही आता था और इस इकाई ने भी विरोध प्रदर्शन के पहल का स्वागत किया था। मैंने भी इसमें हिस्सा लेने का फैसला किया। योजना काले झंडे के प्रदर्शन का था। लगभग ढ़ाई-तीन सौ पार्टी कार्यकर्ता काला झंड ले प्रदर्शन के लिए आयें इन्हें दो हिस्सों में बंटकर शिवाजी पार्क की तरफ जानेवाली दो सड़कों से वहां पहुंचना था। उधर आऱएस़एसक़ के हजारों स्वयंसेवक इसकी भनक मिल जाने के कारण चौकसी बरत रहे थे। उन्होंने एक सड़क से जानेवाले जत्थे को तो बीच में ही रोक कर उनके झंडे छीन लिये और उन्हें तितर-बितर कर दिया। एक जत्था, जिसमें मैं शामिल था, शिवाजी पार्क की चहारदीवारी तक पहुंच गया और चहारदीवारी के ऊपर से (जो अधिक ऊंची नहीं थी) छलांग लगाकर मैदान में पहुंच गया। लेकिन काला झंडा दिखाते-दिखाते हमलोग आऱएस़एसक़ के स्वयंसेवकों द्वारा, जिनकी संख्या हजारों में थी, घेर लिये गये और सबों पर लात और लाठियों से हमला शुरू हुआ। एक दो लोगों को छोड़ बाकी लोगों को इल्की ही चोट आयी। पुलिसवालों से तत्परता दिखा हमलोगों को घेरे में ले लिया और गिरफ्तार कर पुलिस चौकी ले गये। प्रदर्शन तो बड़ा नहीं था लेकिन इसे काफी पब्लिसिटी मिली और मुंबईवासियों का समर्थन भी।
लेकिन मेरे लिए यह घटना अत्यंत ही महत्वपूर्ण साबित हुई। इससे मैं तुरंत मुंबई में तब उभर रहे उस कार्यकर्ता समूह से जुड़ गया जो पार्टी को अधिक क्रांतिकारी नीतियों की ओर जाना चाहता था। इसमें अन्य लोगों के अलावा वोल्शेविक लेनिनिस्ट पार्टी के भी कुछ लोग थे। इसी में प्रभाकर मोरे, लक्ष्मण जाधव, एस़आऱ राव आदि थे। इन लोगों ने बाद में मुंबई में मजदूर आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं बाद में इसी संपर्क से मैं इन्द्रसेन, तुलसी बोड़ा, टी़आऱ राव आदि के संपर्क में आया। टी़आऱ राव को नवीनतम पुस्तकों के संकलन का जुनून था और उनके संकलन का समाजवादी आंदोलन संबंधी मेरी जानकारी बढ़ाने में काफी हाथ था। इन्द्रसेन एक अत्यंत ही सुधरे हुए अर्थशास्त्री थे जो श्रंदंजं के संपादन से जुड़े थे और जिनके लेखों के हमारे समय के समाजवादी मुरीद थे। वे भी बोल्शेविक लेनिनिस्ट पार्टी से आये थे और इतने सज्जन थे कि कभी किसी प्लेटफार्म से अपने को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं करते थे। प्रभाकर मोरे और लक्ष्मण जाधव दोनों ही मजदूर वर्ग से आते थे लेकिन औपचारिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद दुनिया भर की राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी रखते थे और अगर कोई महत्वपूर्ण पुस्तक अंग्रेजी में छपती तो अंग्रेजी जानने वालों से घंटों बैठ उसका अनुवाद कराकर उसकी जानकारी ग्रहण करते थे। एच़आऱएस़ राव एक बहुत ही दक्ष स्टेनोग्राफर थे और अशोक मेहता के भाषणों को टाईप कर उनकी पुस्तक Democratic Socialism का प्रकाशन संभव बनाया था। उनके साथ तनसुख शुक्ल भी थे जिनमें समाजवादी निष्ठा और सरलता का अद्भूद मेल था। इसी संपर्क से मैं गुलाब राव गणाचार्य और बापूराव जगताप जैसे प्रभावी मजदूर नेताओं को जान पाया, जो पहले कम्युनिस्ट पार्टी में थे और 1942 में उनकी आंदोलन विरोधी नीति के कारण सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे। मुंबई पार्टी के संयुक्त मंत्री नारगोलकर जिन्हें इस प्रदर्शन का समर्थन करने के कारण अपने सपद से हटना पड़ा था, को भी जानने का मौका मिला। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि एस़ वेंकटराम को जानना हुई जिनकी बौद्घिक प्रतिभा विलक्षण थी। उनकी एक बात मुङो सदा याद रहती है। वे कहते थे कि ‘‘किसी आदमी के लिए एक अच्छा समाजवादी बनने के लिए एक अच्छा आदमी बनना भी जरूरी है।’’
इस घटना की चर्चा करना जरूरी लगता है क्योंकि इस क्रम में जो लोग संपर्क में आये और इसके बाद पार्टी में जो वैचारिक विवाद हुए उसने बौद्घिक रूप से मुङो जागृत करने में विशेष भूमिका निभाईं
इसी संपर्क से मैं कपड़ा मजदूरों के समाजवादी नेतृत्व में चलनेवाले मिल मजदूर सभा से जुड़ा और उसका पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गया। इसी काल में सवा दो लाख मजदूरों के 62 दिनों की हड़ताल चला। इसके संचालित करने के क्रम में मुङो Preventive Detention Act में गिरफ्तार कर बाईखला जेल में डाल दिया गया, जहां लगभग दो महीना रहने ke बाद, हड़ताल खतम होने पर मुङो छोड़ दिया गया। मिtron की मदद से जेल में किताबें मिलती रहीं और इसी समय मैंने Trang Mehring द्वारा लिखी मार्क्स की जीवनी पढ़ी और Whitehead की ।Adventures of Ideas। इस दूसरी पुस्तक का नाम मेरे ध्यान में था जब मैंने वर्षों बाद मानवाधिकार पर अपनी पुस्तक का नाम ।Adventures of Liberty रखा।
यह काल सोशलिस्ट पार्टी में गहरे वैचारिक विवाद का था और मुङो पार्टी का पूर्णकालिक काम छोड़ना पड़ा। एस़आऱ राव के प्रयास से जो में यूनियन के अधिकारी थे, मुङो खलासी का काम मिल गया और मैं वडाला वर्कशॉप में काम करने लगा। वहां मैंने डेढ़ साल तक मजदूरी की। काम डब्बों की मरम्मत का था, मुख्य रूप से तेल के टैंकरों की देखभाल और मरम्मत का।
1952 के चुनाव में वर्ली-नायगांव क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी और शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की ओर से अशोक मेहता और डॉ़ अंबेडकर लोकसभा के उम्मीदवार हुए। उन दिनों कुछ क्षेत्रों में एक आम और एक आरक्षित उम्मीदवार साथ-साथ खड़ा होते थे और मतदाताओं को दो वोट डालना होता था। उस समय सोशलिस्ट पार्टी और डॉ़ अंबेडकर की पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के बीच चुनावी समझौता हुआ था और दोनों पार्टियां सम्मिलित रूप से लड़ती थी। मेरा कार्यक्षेत्र वर्ली-लोअर पटेल था, जो इस संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था। यहां काफी बड़ी संख्या में महार मतदाता थे। मुङो उनके बीच काम करने का अच्छा मौका मिला और इससे उनके प्रति आदर भी बढ़ा। हमारे दोनों उम्मीदवार हार गये। बाद में किसान मजदूर प्रजा पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी का विलय हुआ जिसका हमने विरोध किया था। (विरोध तो काफी लोगों ने किया था- एक कारण यह भी था कि यह असंवैधानिक था क्योंकि बिना सम्मेलन बुलाये जनरल काउन्सिल के फैसले से विलय हुआ था)। लेकिन, विलय के बाद चूंकि सभी बड़े नेता इसके पक्ष में थे, ज्यादातर लोगों से इसे कबूल किया। लेकिन इस निर्णय में बोल्शेविक पार्टी से आये कुछ लोगों को छोड़ बहुत थोड़े से लोगों ने हमलोगों का साथ दिया। कुछ लोग आऱएस़पी़ में चले गये। कई मजदूर नेता जो कम्युनिस्ट पार्टी से आये थे फिर कम्युनिस्ट पार्टी में चले गये।
जो थोड़े से लोग बच गये थे उनलोगों ने पत्र पत्रिकाओं के द्वारा पार्टी को पुनर्गठित करने का अभियान जारी रखा। लेकिन ये मुट्ठी भर लोग थे। मद्रास से हेक्टर अभय बर्धन, जो बोल्शेविक पार्टी से आए थे, एक पाक्षिक पत्रिका ‘‘सोसलिस्ट अपील’’ निकालने लगे जिसके संपादन मंडल में मेरा भी नाम था। मुङो पटना से एक हिन्दी पाक्षिक ‘‘समतावादी’’ निकालने को कहा गया। इस तरह मैं रेवले की नौकरी छोड़ पटना आ गया। पर यह पत्रिका कुछ महीने तक ही चल पायी और मैं फिर मुंबई चला गया। वहां कुछ दिन डॉक में काम किया और बाद मैं बी़पी़टी़ जनरल वर्कर्स यूनियन (बम्बई पोर्ट ट्रस्ट जनरल वर्कर्स यूनियन) में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगा। इसके अध्यक्ष जी़एचक़ काले थे जो कभी डांगे आदि के साथ भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को शुरू करने वालों में थे और बाद में एम़एऩ राय से जुड़ गये थे। इस यूनियन मे काम करते हुए वह भ्रम दूर हो गया कि ट्रेड यूनियनों को आधार बनाकर क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन चलाया जा सकता है जो अंतत: समाजवादी क्रांति का जनक होगा। विशेषकर संगठित क्षेत्रों के औद्योगिक मजदूरों की स्थिति और व्यवस्था से जुड़ी सुविधाएं भी ऐसी होती हैं कि सशस्त्र व्यापक क्रांति में वे भागीदार नहीं हो सकते। इस तरह मजदूर क्रांति की कल्पना जो हम मार्क्सवादी सिद्घांतों के कारण पाले हुए थे, खतम हो गयी। इसके थोड़े ही दिनों बाद 1955 में मैं पटना आ गया। हमारे बहुत से साथियों ने बोल्शेविक-लेनिनिस्ट पार्टी से आये लोगों ने भी, प्रजा सोसलिस्ट पार्टी को यह मानकर फिर कबूल कर लिया कि कोई विकल्प नहीं है। मैंने कभी इस पार्टी को विश्वसनीय नहीं पाया और न इसका सदस्य बना। इसी बीच आपसी विरोध के कारण डॉ़ लोहिया ने प्रजा सोसलिस्ट पार्टी से बाहर सोसलिस्ट पार्टी का गठन करना शुरू कर किया। हमारे जैसे अनेक लोग जो अलग-थलग पड़ गये थे, इससे जुड़ गये। इसके बाद के घटनाक्रम में सोसलिस्ट पार्टी और प्रजा सोसलिस्ट पार्टी के विलय से संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी का गठन हुआ और गैर कांग्रेसवाद के नारे के तहत एक वैकल्पिक सरकार बनाने का सपना साकार होता दिखाई दिया। लेकिन समाजवाद का लक्ष्य अभी ओझल ही था। यह एक नयी तलाश की शुरुआत थी। इसके बैनर तले 1965-1967 में बड़े आंदोलन हुए और पहली दफे कुछ राज्यों में गैर कांग्रेस और गैर कम्युनिस्ट पार्टियां सत्ता में आईं। हालांकि अब इस गठजोड़ से कम्युनिस्ट भी वर्जित नहीं थे। इसी प्रक्रिया में 1965 में बिहार में एक बड़ा जन आंदोलन हुआ जिसमें नेतृत्व मूलत: संसोपा के हाथ में था पर कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल थीं। मुजफ्फरपुर में नजरबंदी की स्थितियों के खिलाफ मैंने एक आवेदन दिया था, जिसमें व्यक्त विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
समाजवादी सत्ता के समीप तो आये लेकिन सत्ता पाने की जद्दोजहद में समाजवाद का लक्ष्य कहीं लुप्त होता गया। 1967 में ही गैर कांग्रेसवाद को सफलता मिली और इसी साल डॉक्टर लोहिया की मृत्यु हो गयी। अब सत्ता के लक्ष्य और सत्ता में रहने की कुछ शर्तें जो डॉ़ लोहिया गैर-कांग्रेसवाद के साथ जोड़ते थे किसी की chinta के विषय नहीं रहे। पार्टी के भीतर ही राज नारायण और मधु लिमये, जो लोहिया की विरासत को लेकर चल सकते थे, आपसी द्वंद्व में उलझ गये। ऐसा लग रहा था कि समाज की समझ धूमिल हो गयी थी और यह सब वैयक्तिक स्खलन उसी का परिणाम था। कम से कम मुङो ऐसा ही लग रहा था। मुङो ऐसा लग रहा था कि हमें फिर अपने वैचारिक जड़ों को तलाशने की जरूरत है। 1968 से आज तक मै। मूलत: इस उद्देश्य को लेकर चलने का प्रयास करता रहा हूं। लेकिन यह तलाश बिल्कुल वैयक्तिक नहीं हो सकती और इसमें नये और नयी पीढ़ी के सहयोगियों की तलाश जरूरी है। पिछले दिनों मेरी ऐसा ही कोशिश रही है। लिखने का मुख्य उद्देश्य रहा है- अपने अनुभवों को उन सबों को बांटना, जो हमराही हो सकते हैं।
जेल के अधिकारियों के माध्यम से भेजे गये इस आवेदन और इसकी पृष्ठभूमि के संबंध में कुछ जानकारियां देना जरूरी लगता है। 1965 का मध्य काल बिहार में घोर उथल-पुथल का काल था। यह समय बिहार में घोर दमन और शोषण का काल था। इसी समय पाकिस्तान के साथ एक अल्पकालिक युद्घ छिड़ा था। इधर, कांग्रेसी शासन के खिलाफ लोगों में गहरा रोष था। ‘‘पैडी लेवी’’ जैसे किसान विरोधी नीतियों से, जिसके तहत किसानों पर मनमाना धान वसूली का लक्ष्य तय किया जाता और उसकी हैसियत का ख्याल किये वगैर वसूला जाता, देने से इनकार करने पर गिरफ्तारी तथा अन्य तरह की ज्यादतियां की जातीं- किसानों में भीषण असंतोष था। महंगाई और व्यवस्था के खिलाफ अन्य नागरिकों एवं विद्यार्थियों में भी घोर असंतोष था। नतीजा था बिहार में प्रदर्शनों और बंदों का एक सिलसिला। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और बीच में गोलीबारी आम बात हो गयी थी। इसी पृष्ठभूमि में सरकार के खिलाफ संघर्ष चलाने के लिए, संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी की पहल पर एक संयुक्त संघर्ष समिति बनी थी, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी और हाल मे पार्टी से अलग होनेवाले लोगों की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भी शामिल थी। उस समय, बाद में स्वतंत्र अस्तित्व में आनेवाले जिले वैशाली और सीतामढ़ी जिले भी मुजफ्फरपुर जिला के ही हिस्से थे। मुङो इस संघर्ष समिति का संयोजक बनाया गया।
कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन उस समय मुजफ्फरपुर के नगर क्षेत्र और सीतामढ़ी के कुछ हिस्से में काफी चुस्त था। संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी का तो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के काल से ही जिले में विशेषकर सीतामढ़ी और वैशाली वाले इलाके में व्यापक संगठन था। वैशाली क्षेत्र से ही योगेन्द्र शुक्ल सशस्त्र क्रांति व भगत सिंह के समय के क्रांतिकारी आंदोलन के नेता सीताराम सिंह एवं अमीर गुरु (दोनों ही आजाद दस्ता के नेता जिन्होंने ज़ेपी़ लोहिया आदि को नेपाल की जेल से मुक्त कराया था) आते थे। प्रसिद्घ समाजवादी नेता अक्षयवट राय भी इसी जिले से थे। सीतामढ़ी नेपाल की सीमा पर होने के कारण न सिर्फ आजाद दस्ता के कार्यकर्ताओं का क्षेत्र था बल्कि व्यापक किसान आंदोलन का क्षेत्र था और यहीं पर बाबा राम बहादुर लाल के नेतृत्व में भूमि सेना ने सड़क और बांध का निर्माण बड़े पैमाने पर किया था। इन आंदोलनों से जुड़े अनेक कार्यकर्ता जो बीच में निष्क्रिय हो ये इस आंदोलन के क्रम में फिर सक्रिय हो गये। मुजफ्फरपुर का क्षेत्र भी 1942 के आंदोलन के काल से ही राष्ट्रीय आंदोलन और इसके सामजवादी धड़े के प्रभाव का क्षेत्र था। 1965 में ये सारे लोग सक्रिय हो गये और इन्हें समर्थन मिला विश्वविद्यालय और स्कूलों के छात्रों और शिक्षकों से। इससे आंदोलन को व्यापक जन समर्थन मिला। इसी अनुपात में दमन शुरू हुआ। आंदोलन समर्थकों के लिए एक पर्चा निकालना तक कठिन हो गया। प्रेसवाले इतने आतंकित थे कि प्रेस का नाम दे कोई पर्चा निकालने तक से इनकार कर देते। पर्चा बांटनेवाले को गिरफ्तार कर लिया जाता। लेकिन इस दमन के बावजूद और शायद इस दमन के कारण ही लोगों का समर्थन बढ़ता गया। सैकड़ों वैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को जो कभी भी सोसलिस्ट या कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्घ रहे हो उन्हें उनके घरों से पकड़कर जेलों में बन्द कर दिया गया।
मुङो चूंकि इसमें सक्रिय कार्यकर्ताओं से संपर्क बनाये रखना था इसलिए मैंने गिरफ्तार होने से बचने की कोशिश की। पुलिसवालों को, जो मुजफ्फरपुर जिले के आंदोलनों की पृष्ठभूमि से अनभिज्ञ थे, यह भ्रम था कि गिरफ्तारी से बचकर मैं इस आंदेालन में विशेष भूमिका निभा रहा हूं। उन्होंने मुङो गिरफ्तार करने के लिए जगह-जगह छापेमारी की और पहचान के लिए गांव के चौकीदार को जीप पर जहां-तहां घुमाया। लेकिन चूंकि मैं कोई ऐसा जाना-माना नेता नहीं था, जिसे बहुत लोग जानते हों, मेरी पहचान मुश्किल थी। अंत में karpoori ठाकुर की सलाह पर, जो पटना गांधी मैदान की पुलिस द्वारा सामूहिक पिटाई के कारण पुलिस हिरासत में ही पटना अस्पताल में थे और मैं वहीं उनसे मिला था, गिरफ्तार हो गया। काफी दिनों तक गिरफ्तार नहीं कर पाने की चिढ़ और आंदेालन में मेरी भूमिका को बढ़ा-चढ़ा कर देखने के कारण, गिरफ्तार करने के बाद पुलिस प्रशासन मुङो अधिक से अधिक यातनापूर्ण स्थिति में रखना चाहता था और उसका उपाय नजरबन्दी के साथ ैलउइसव श्ब्श् लगाना था, जिससे नजरबन्दी में जो कुछ खाने-पीने, रहने और मुलाकात की सुविधाएं मिलती हैं, उन्हें खतम किया जा सके। वैसे जेल के अधिकारियों को मैं कुछ खास खौफनाक नहीं लगता था और नियमों के बावजूद मुङो बाकी नजरबन्द कैदियों के साथ ही रखा जा रहा था और हम सब अपनी सम्मिलित गाष्ठियां चलाते रहते थे। लेकिन Symbol “C” लगाने के प्रावधान के खिलाफ विरोध प्रकट करना जरूरी था। इसीलिए मैंने आमरण अनशन पर जाने की नोटिस दी थी।पता नहीं अधिकारियों के बीच क्या मंत्रणा हुई। जिस दिन से मेरा अनशन शुरू होना था, उससे एक दिन पहले शाम को मुझे कैद से रिहा कर दिया गया। एक कारण तो शायद यह था कि धीरे-धीरे सैकड़ों की संख्या में बन्द दूसरे नजरबन्द कैदियों को छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया था। कुल मिलाकर इस आंदोलन का यह असर जरूर हुआ कि 1967 के विधानसभा चुनावों में मुजफ्फरपुर जिले संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी 9 स्थानों पर विजयी हुए, जितना पहले कभी नहीं हुए थे।
इसके बाद बिहार में संविद सरकार बनी। पर बिन्देश्वरी मंडल के दल-बदल के कारण यह सरकार गिर गयी और विधानसभा भंग हो गयी। इसके बाद 1969 में फिर चुनाव हुए और संसोपा और इसकी सहयोगी पार्टियां फिर सत्ता में आ गयी। लेकिन धीरे-धीरे समाज परिवर्तन का लक्ष्य गौण हो गया। समाजवादी विचारों को फिर से परीक्षित करने का विचार मेरे ऊपर हावी होने लगा। इसी दबाव में सक्रिय राजनीति से अलग हो 1969 के अक्टूबर में मैं दिल्ली चला गया। अठारह साल तक मैं ज्यादा समय पढ़ने-लिखने में ही लगा रहा। ज़ेपी़ आंदोलन के काल में और फिर आपातकाल में समय-समय पर आंदोलनकारियों से सहयोग भी करता था। लेकिन यह न्यूनतम था। 1980 में समता संगठन खड़ा करने के पहल में जरूर सक्रिय था और इसका नीति-वक्तव्य तैयार करने की जबावदेही मुङो दी गयी। इसके बाद से समाजवादी जन परिषद बनने तक और उसके बाद तक इस संगठन से जुड़ा रहा लेकिन मेरी सक्रियता मुख्य रूप से बौद्घिक क्षेत्र में ही रही। इसके बाद की स्थिति और मेरे लेखन के संबंध में तो आप सब लोग परिचित हैं।
(अपने 80वें जन्मदिन पर 28 मार्च 2009 को मुजफ्फरपुर के लंगट ंिसंह कॉलेज के हॉल में आयोजित ‘‘आधुनिक सभ्यता का संकट और सच्चिदानन्द सिन्हा का लेखन।’’ शीर्षक संगोष्ठी के अवसर वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानन्द सिन्हा का अपने जीवन और कर्म पर संक्षिप्त नोट)
Monday, August 15, 2011
कदम-दर-कदम अस्सी साल, बकलम खुद : सच्चिदानन्द सिन्हा
प्रस्तुतकर्ता
अतुल
पर
12:03 PM
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